क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी, जानिए पूरी कहानी

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भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पूरे भारत में गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है. इस बार गणेश चतुर्थी के त्योहार की शुरुआत 13 सितम्बर से होगी. इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की स्थापना करेंगे.

हम श्री गणेश उत्सव की तैयारी में यह तो विशेष रूप से याद रखते हैं कि किस समय श्री गणेश की स्थापना करें, यानी गणेश स्थापना और पूजन के शुभ मुहूर्त क्या हैं, लेकिन इसके साथ ही कुछ और भी ध्यान रखना चाहिए. यानी मुहूर्त के साथ ही एक और विशेष समय का ध्यान रखना चाहिए वह है चंद्र दर्शन से कैसे बचें.

कौन से विशेष समय घर से बाहर झांकने से बचें ताकि चंद्र का दर्शन न हो. चतुर्थी के चंद्र जीवन में कलंक लगा सकते हैं. भगवान श्री कृष्ण भी इससे नहीं बच सके. उन्हें भी स्यमंतक मणि चुराने का कलंक लग चुका है. यहां प्रस्तुत हैं श्री गणेश स्थापना के शुभ मुहूर्त के साथ वह समय भी जब आपको आकाश में उदित चंद्रमा को देखने से बचना है.

इस बार गणेश चतुर्थी वाले दिन बड़े शुभ संयोग बन रहे हैं. इस साल गणेश चतुर्थी का यह पर्व 13 सिंतबर से शुरू होकर 23 सितंबर तक चलेगा.

गणेश चतुर्थी पूजा का शुभ मुहूर्त

गणेश चतुर्थी 13 सितंबर 2018, गुरुवार को है.

23 सितंबर 2018, रविवार को अनंत चतुर्दशी है जिस दिन गणेश विसर्जन होगा.

मध्याह्न काल में गणेश पूजन का सर्वश्रेष्ठ समय :
11:03 से 13:30 तक.

तीज और गणेश चतुर्थी पर इस समय चंद्र देखने से बचें

12 सितंबर 2018, बुधवार को चंद्र नहीं देखने का समय = 16:07 से 20:33 बजे तक.

13 सितंबर 2018, गुरुवार को चंद्र नहीं देखने का समय = 09:31 से 21:12 बजे तक.

चतुर्थी तिथि आरंभ : 12 सितंबर 2018, बुधवार 16:07 बजे.

चतुर्थी तिथि समाप्त : 13 सितंबर 2018, गुरुवार 14:51 बजे.

भगवान गणेश की पूजा-उपासना के फायदे

वास्तु के अनुसार किये गए हर काम आसानी पूरे हो जाते हैं और इन्हे करने में किसी प्रकार का कोई विघ्न भी नहीं आता हैं. दरअसल जल्द ही भगवान गणेश जी विराजमान होने वाले हैं और उनके स्वागत के लिए लोग खास तरीके से तैयारी में जुटे हुए हैं. ऐसा कहा जाता है कि कोई पूजा वास्तु के मुताबिक़ और विधि अनुसार करें तो वह शुभ मानी जाती हैं और भगवान जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं.

करें ये उपाय:

# गणपति की यह प्रतिमा को वे लोग अपने घर में रखे जिन्हे अभी तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस प्रतिमा की स्थापना से घर जल्द ही बच्चे की किलकारी गूंजती हैं.

# जिनके घर में अधिक झगड़ा होता हैं वे लोग अपने घर में इस चतुर्थी विघ्नहर्ता गणपति की प्रतिमा स्थापना करें. ऐसा करने से कलह, विघ्न, अशांति, क्लेश, तनाव, मानसिक संताप दूर हो जायेंगे.

# अगर बच्चे पढ़ाई में कमजोर होते हैं तो इसके लिए आप अपने घर में विद्या प्रदायक गणपति की प्रतिमा स्थापित करें. इससे बच्चे की बुद्धि बढ़ती हैं और पढाई-लिखाई में भी मन लगता हैं.

भगवान गणेश की कहानी

क्या आपको पता है कि क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी और क्या है पौराणिक कथा. अगर नहीं जानते तो हम आपको इसके बारे में बताने वाले हैं.

एक दिन स्नान करने के लिए भगवान शंकर कैलाश पर्वत से भोगावती जगह पर गए. कहा जाता है कि उनके जाने के बाद मां पार्वती ने घर में स्नान करते समय अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया था. उस पुतले को मां पार्वती ने सतीव कर उसका नाम गणेश रखा. पार्वती जी ने गणेश से मुद्गर लेकर द्वार पर पहरा देने के लिए कहा. पार्वती जी ने कहा था कि जब तक मैं स्नान करके बाहर ना आ जाऊं किसी को भी भीतर मत आने देना.

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव जी वापस घर आए तो वे घर के अंदर जाने लगे लेकिन बाल गणेश ने उन्हें रोक दिया. इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया और घर के अंदर चले गए.

शिवजी जब अंदर पहुंचे वे बहुत क्रोधित थे. पार्वती जी ने सोचा कि भोजन में विलम्ब के कारण महादेव क्रुद्ध हैं. इसलिए उन्होंने तुरंत 2 थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया और भोजन करने का आग्रह किया.

दूसरी थाली देखकर शिवजी ने पार्वती से पूछा, ‘यह दूसरी थाली किसके लिए लगाई है?’ इस पर पार्वती जी ने कहा कि पुत्र गणेश के लिए, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है. यह सुनकर भगवान शिव चौंक गए और उन्होने पार्वती जी को बताया कि, ‘जो बालक बाहर पहरा दे रहा था, मैने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया है.’

यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुखी हुईं और विलाप करने लगीं. उन्होंने भगवान शिव से पुत्र को दोबारा जीवित करने का आग्रह किया. तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर उस बालक के धड़ से जोड़ दिया. पुत्र गणेश को पुन: जीवित पाकर पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं. यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को घटित हुई थी. तब से इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है.

भगवान गणेश को क्‍यों प्रिय है मोदक

जब भी गणेश जी की पूजा अर्चना होती हैं तो उन्हें सबसे पहले मोदक का भोग लगाया जाता हैं. आप ने ये कई बार सूना होगा कि मोदक गणेश जी को बहुत प्रिय होते हैं. उन्हें मोदक का भोग लगाकर आप जल्दी प्रसन्न कर सकते हैं. आप गणेश जी के सामने रसगुल्ला, मालपुआ, रसमलाई जैसे 56 भोग का प्रसाद भी क्यों ना चढ़ा दो लेकिन जब तक उन्हें मोदक ना चढ़ाया जाए वे प्रसन्न नहीं होते हैं. ऐसे में क्या आप ने कभी सोचा हैं कि आखिर वो क्या वजह हो सकती हैं जिसके कारण ये मोदक गणपति बाबा को इतने प्रिय हैं.

इन वजहों से गणेश जी को पसंद हैं मोदक

  1. जैसा कि आप सभी जानते हैं गणेश जी का एक दांत परशुराम के साथ लड़ाई करते वक़्त टूट गया था.ऐसे में उन्हें अन्य चीजों को खाने में बड़ी परेशानी होती हैं, क्योंकि इन्हें ठीक से चबाया नहीं जा सकता हैं. हालाँकि जब बात मोदक की आती हैं तो वो काफी मुलायम होता हैं. मोदक मुंह में जाते ही घुल जाता हैं और इसे ठीक से चबाना भी नहीं पड़ता हैं. इसके अलावा इसका मीठा स्वाद पुरे मन को प्रसन्न और आनंदित कर देता हैं.
  2. मोदक एक ऐसा मिष्ठान हैं जिसे खाने के बाद दिल प्रसन्न हो जाता हैं. इसके नाम में ही इसकी खूबी का जिक्र देखने को मिलता हैं. यदि आप मोदक शब्द पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि यहाँ ‘मोद’ का अर्थ हर्ष मतलब कि ख़ुशी होता हैं. इसके अलावा शास्त्रों की बात करे तो उनका वर्णन मंगलकारी एवं सदैव प्रसन्न रहने वाले देवता के रूप में किया गया हैं. वे कभी कोई चिंता नहीं लेते हैं. शायद यही कारण हैं कि गणेश जी को मोदक पसंद हैं क्योंकि इसे खाकर वे हमेशा प्रसन्न रहते हैं.
  3. पद्म पुराण के सृष्टि खंड में भी गणेश जी को मोदक पसंद होने के पीछे एक दिलचस्प कहानी का जिक्र हैं. इस पुराण के अनुसार मोदक की उत्पत्ति अमृत से हुई हैं. देवताओं ने अमृत रूपी ये मोदक पार्वती को भी दिया था. ऐसे में जब गणेशजी ने माँ पार्वती के मुंह से मोदक के गुणों के बारे में सूना तो उनकी मोदक खाने की इच्छा और भी बढ़ गई. इसके बाद अपनी बुद्धि से गणेश जी ने पार्वती से वो मोदक हासिल भी कर लिया. इस मोदक को मुंह में रखते हुए गणेश जी को अद्भुत आनंद की प्राप्ति हुई. तभी से ये मोदक उनके प्रिय बन गए. इसलिए गणपत्यथर्वशीर्ष में लिखा है, ‘यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वांछितफलमवाप्नोति.’ इसका मतलब होता हैं कि गणेश जी को मोदक चढ़ाने के बाद वो प्रसन्न हो जाते हैं और आपकी मनोकामना पूर्ण कर देते हैं.
  4. यजुर्वेद में गणेश जी का वर्णन परब्रह्म रूप में किया गया हैं. ऐसे में यदि आप मोदक को देखेंगे तो उसकी आकृति भी ब्रह्माण्ड जैसी होती हैं. गणेश जी की कई आकृतियों में वे हाथ में मोदक धारण किए हुए हैं. ये बात दर्शाती हैं कि उन्होंने अपने हाथ में ब्रह्माण्ड धारण किया हुआ हैं.

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