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बच्‍चों में लड़कियों से ज्‍यादा लड़के हो रहे यौन शोषण के शिकार

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Ranchi: बच्‍चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में विभिन्‍न प्रयासों के जरिये सरकारी आंकड़ों में सुधार तो देखे जाते हैं, पर इसकी जमीनी हालात में वह सुधार देखने को मिलती है. नतीजा यह की सब इसके लिए निश्चिंत होते जा रहे हैं और स्थिति गंभीर होती जा रही है. बाल अधिकारों के हनन के मामले बढ़ रहे हैं. चिंता का विषय यह है कि अब ऐसे मामलों की सही मीडिया रिपोर्टिंग भी नहीं हो पाती है.

मामले की गंभीरता को देखते हुए बच्‍चों के लिए काम करने वाली संस्‍था सेव द चिल्‍ड्रन और वर्ल्‍ड विजन इंडिया ने रांची में मीडिया कर्मियों के लिए एक वर्कशॉप का आयो‍जन किया. इस वर्कशॉप में संस्‍था के प्रतिनिधियों के द्वारा झारखंड में बच्‍चों के शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य के साथ-साथ उनके अधिकारों के हनन से जुड़े गंभीर विषय वस्‍तु पेश किये गये.

वर्ल्ड विजन के स्टेट कैंपेन आफिसर डॉ अनंगदेव सिंह ने कहा कि हमारा सामाजिक ढांचा ऐसा है कि हम सेक्स और सेक्सुअल एब्यूज पर बात नहीं करना चाहते. जबकि आंकड़े चौंकाने वाले हैं. आंकड़ों की मानें तो देश में यौन हिंसा का शिकार हो रहे बच्चों में लड़कों की संख्या अप्रत्याशित तरीके से बढ़ी है. यौन शोषण के कुल मामलों में 53 फीसदी लड़के और 47 लड़कियों का है. लड़कियां तो यौन हिंसा की शिकार शुरू से होती आयी हैं. गौर करने वाली बात यह है कि बच्चे अपने परिचितों के द्वारा ही उत्पीड़ित होते हैं.

बच्‍चों को नहीं मिल रहा कानून का लाभ

उन्‍होंने कहा कि कानून तो कई हैं लेकिन क्या बच्चे इन कानूनों का लाभ उठा पा रहे हैं, क्या वे इतने समर्थ हैं कि वे यह बता सकें कि उनके फलां रिश्तेदार या परिचित ने उसका यौन शोषण किया है? यह मुद्दा बहुत अहम है. साथ ही इसपर उन्हें एजुकेट करने की भी जरूरत है, जो हमारी संस्था कर रही है और मीडिया से सहयोग अपेक्षित है.

सेव द चिल्ड्रेन के मीडिया मैनेजर देवेंद्र सिंह टॉक ने कहा कि यह अफसोस कि बात है कि हमारी संस्था सौ सालों से काम कर रही है, बावजूद इसके हमें बाल अधिकार सुरक्षित करने के लिए काम करना पड़ रहा है. मीडिया बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए जो काम हो रहा है उसे हाईलाइट करने की बजाय निगेटिव खबरों को ज्यादा हाईलाइट कर रहा है. जबकि पोजिटिव खबरों को भी जगह देने से बाल अधिकार सुरक्षित होंगे.

सरकारी आंकड़ों और वास्तविकता में अंतर

सेव द चिल्ड्रेन के असिस्‍टेंट प्रोग्राम मैनेजर संजय कुमार ने कहा कि सरकारी आंकड़ों और वास्तविकता में अंतर है. ऐसा मैं गांव की स्थिति को देखते हुए कह रहा हूं. मीडिया का यह दायित्व बनता है कि वह यह पता करे कि ऐसा सही में है या नहीं. खासकर स्वास्थ्य के मुद्दों को देखें, तो यह बात ज्यादा सही प्रतीत होती है. आंगनबाड़ी की स्थिति ग्रामीण इलाकों में अच्छी नहीं है, फिर भी आंकड़े कुछ और कहते हैं. मातृ और शिशु मृत्युदर में भी अचानक से कमी आयी है आंकड़ों के अनुसार, तो मीडिया को इन बातों पर भी गौर करना चाहिए.

मीडिया की अहम भूमिका

कार्यक्रम में मौजूद रांची के वरिष्‍ठ पत्रकार मधुकर ने कहा कि बाल अधिकारों के हनन का सबसे बड़ा कारण है जागरूकता का अभाव. अगर लोग यह जानें कि किस तरह बच्चों को उनका सुरक्षित और स्वस्थ बचपन दिया जा सकता है. तो बचपन सुरक्षित हो जाये, इस काम में मीडिया की अहम भूमिका हो सकती है.

सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर पाल ने कहा कि झारखंड में विश्वसनीय आंकड़ों की कमी है. योजनाएं आंकड़ों के आधार पर बनती हैं. लेकिन, आंकड़े अगर गलत हो तो योजनाएं कैसे सही बनेंगी. यह एक बड़ा मुद्दा है.

उनहोंने कहा कि बाल अधिकारों का हनन क्यों होता है इसपर प्रारंभ से रिपोर्ट नहीं की जाती है,  व्यवस्था की खामियों को उजागर तब किया जाता है जब शेल्टर होम जैसा केस सामने आता है. बाल अधिकार के मुद्दे को हम बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं.

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