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एक बार फिर मॉब लिंचिंग का शिकार बनी UP पुलिस

तस्कर ज़ब्बार को पकड़ने गये पुलिस बल पर उन्मादियों का कश्मीरी अंदाज में पथराव

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इस बार उन्मादी भीड़ का निशाना पुनः उत्तर प्रदेश की पुलिस बनी है. खबर के मुताबिक़, बनारस के गंगापुर में वार्ड नंबर तीन निवासी हेरोइन तस्कर मोहम्मद जब्बार खान के घर पर मौजूद होने की सूचना पर मंगलवार को गंगापुर चौकी प्रभारी राजबहादुर सिंह ने पुलिस टीम के साथ छापामारी की.

पुलिस की कार्रवाई के विरोध में जब्बार, उसके दो बेटों, बहुओं, बेटियों सहित अन्य करीबियों ने पथराव शुरू कर दिया. पथराव में चौकी इंचार्ज घायल हो गए। सूचना पाकर रोहनिया, लोहता और जंसा थाने की फोर्स के साथ पीएसी मौके पर पहुंची और लाठियां भांज कर पथराव कर रहे लोगों को मौके से खदेड़ा.

पुलिस ने मौके से पथराव कर रही तीन महिलाओं और दो पुरुषों को हिरासत में लिया है. मामले को लेकर रोहनिया थाने में पुलिस की ओर से जब्बार सहित उसके परिवार के छह लोगों के खिलाफ नामजद और छह अज्ञात के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है.

खबर के मुताबिक़, गंगापुर चौकी प्रभारी को सूचना मिली थी कि हेरोइन तस्करी के मामले में वांछित जब्बार अपने घर पर मौजूद है और जुआं खेल रहा है. इस सूचना पर चौकी प्रभारी गंगापुर ने पुलिस टीम के साथ छापामारी कर जब्बार को पकड़ लिया. आरोप है कि कार्रवाई के विरोध में जब्बार, उसके परिवार के लोगों और करीबियों ने पथराव शुरू कर दिया. पथराव में चौकी प्रभारी गंगापुर के सिर और शरीर के अन्य हिस्सों पर चोट आईं. पथराव के कारण थोड़ी देर के लिए मौके पर अफरातफरी की स्थिति पैदा हो गई.

इस संबंध में सीओ सदर अंकिता सिंह ने बताया कि उपचार के बाद चौकी प्रभारी को डॉक्टरों ने छुट्टी दे दी है. गांव में एहतियातन फोर्स तैनात की गई है. पथराव करने वाले कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है. जब्बार सहित अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तीन टीमें छापामारी कर रही हैं.

आपको बता दें कि 1 महीने से भी कम समय के अंदर बनारस पुलिस तीन बार मॉब लिंचिंग का शिकार बन चुकी है. 25 जुलाई को लोहता थाना के कन्हईसराय चौक गांव में छापामारी करने गई पुलिस टीम को बंधक बनाकर पिटाई की गई थी. 26 जुलाई की रात सारनाथ थाना क्षेत्र के नान्हूपुर गांव में मारपीट की सूचना पर पहुंची यूपी 100 के पीआरवी के पुलिसकर्मियों पर हमला करने की कोशिश की गई.

पूरा देश देख रहा कि किस तरह अभी हाल ही मॉब लिंचिंग को लेकर पूरे देश की राजनीति गरमाई हुई थी तथा इसे लेकर राजनेता से लेकर तथाकथित बुद्धिजीवी, समाजसेवियों से लेकर तमाम अभिनेता-अभिनेत्री बिलख रहे थे. भीड़ की हिंसा को लेकर आसमान सर पर उठाने वाले लोग तब क्यों नहीं बोलते जब समाज की रक्षक पुलिस मॉब लिंचिंग का शिकार होती है तथा उन्मादी आक्रान्ता जनता की सच्ची सेवक पुलिस पर इसलिए हमला करते हैं क्योंकि पुलिस अपराधीकरण के खिलाफ कार्यवाई कर रही होती है? आखिर मॉब लिंचिंग को लेकर ये सेलेक्टिव रवैया क्यों? आखिर क्यों पुलिस वालों के दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया जाता?

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