टुसु फेस्टिवल इन झारखण्ड: जानिए टुसू पर्व की कहानी

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मकर संक्रांति के दिन झारखंड और बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में टुसू पर्व मनाया जाता है. टुसू पर्व झारखंडी संस्कृति की धरोहर है. यह पर्व झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, मिदनापुर व बांकुड़ा जिलों के साथ-साथ ओड़िशा के क्योंझर, मयूरभंज, बारीपदा जिलों में भी मनाया जाता है. टुसू को लेकर गांव-कस्बों में उत्सव का माहौल है.

कुरमाली भाषा परिषद के अध्यक्ष राजा राम महतो कहते हैं कि अगहन संक्रांति के दिन गांव की कुंवारी कन्याएं टुसू की मूर्ति बनाती हैं. इसी मूर्ति के चारों ओर सजावट करती हैं और फिर धूप, दीप के साथ टुसू की पूजा करती हैं.

टुसू पर्व को नारी सम्मान के रूप में भी मनाया जाता है. लगभग एक माह तक चलने वाले इस पर्व के दौरान कुंवारी कन्‍याओं की भूमिका सबसे अधिक होती है. कुंवारी कन्याएं टुसू की मूर्ति बनाती हैं और उसकी सेवा-भावना, प्रेम-भावना, शालीनता के साथ पूजा करती हैं. पूजा के दौरान लड़कियां विभिन्न प्रकार के टुसू गीत भी गाती हैं. इसमें कुंवारी लड़कियों की मां, चाची, फुआ, मौसी आदि सहयोग करती हैं.

टुसु फेस्टिवल इन झारखण्ड

मकर संक्रांति के दिन टुसू पर्व मानाया जाता है और फिर उसके अगले दिन इसे नदी में प्रवाहित किया जाता है. मकर संक्रांति के एक दिन पहले पुरुषों द्वारा बिना बाजी का मुर्गोत्सव मनाया जाता है जिसे बाउड़ी कहा जाता है. इस उत्सव से लौटने के उपरांत सारी रात लोग गाते- बजाते हैं. सुबह सभी ग्रामीण मकर स्नान के लिए नदी पहुंचते हैं. स्नान के दौरान गंगा माई का नाम लेकर मिठाई भी बहाते हैं. उत्‍सव और मेले का आनंद लेने के बाद टुसू का विसर्जन गाजे-बाजे के साथ कर दिया जाता है.

टुसू पर्व की कहानी

टुसू पर्व को धूमधाम से मनाने के पीछे कई कई कहानियां प्रचलित हैं. राजा राम महतो ने बताय, टुसू एक गरीब कुरमी किसान की अत्यंत सुंदर कन्या थी. धीरे-धीरे संपूर्ण राज्य में उसकी सुंदरता का बखान होने लगा. एक क्रूर राजा के दरबार में भी खबर फैल गयी. राजा को लोभ हो गया और कन्या को प्राप्त करने के लिए उसने षड्यंत्र रचना प्रारंभ कर दिया. उस वर्ष राज्य में भीषण अकाल पड़ा था. किसान लगान देने की स्थिति में नहीं थे. इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए राजा ने कृषि कर दोगुना कर दिया. गरीब किसानों से जबरन कर वसूली का राज्यादेश दे दिया गया. पूरे राज्य में हाहाकार मच गया. टुसू ने किसान समुदाय से एक संगठन खड़ा कर राजा के आदेश का विरोध करने का आह्वान किया.

राजा के सैनिकों और किसानों के बीच भीषण युद्ध हुआ. हजारों किसान मारे गये. टुसू भी सैनिकों की गिरफ्त में आने वाली थी. उसने राजा के आगे घुटने टेकने के बजाय जल-समाधि लेकर शहीद हो जाने का फैसला किया और उफनती नदी में कूद गयी. टुसू की इस कुरबानी की याद में ही टुसू पर्व मनाया जाता है और टुसू की प्रतिमा बनाकर नदी में विसर्जित कर श्रद्धांजलि अर्पित किया जाता है. टुसू कुंवारी कन्‍या थी इसलिए इस पर्व में कुंवारी लड़कियों की ही भूमिका अधिक होती है.

गुड़ का पीठा और अन्य खास व्यंजन बनते हैं

टुसू पर्व पर ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने घरों में गुड़ पीठा, मांस पीठा, मूढ़ी लड्डू, चूड़ा लड्डू और तिल के लड्डू जैसे खास व्यंजन बनाते हैं. इसमें गुड़ का पीठा सबसे खास होता है. गुड़ पीठा के बगैर टुसू का त्योहार मानो अधूरा रह जाता है. व्यंजनों में विशेष रूप से नारियल को शामिल किया जाता है. जगह-जगह मुर्गा लड़ाई प्रतियोगिता और मेला का आयोजन किया जाता है.

नारी सम्मान का पर्व टुसू

टुसू पर्व को नारी सम्मान के पर्व के रूप में भी मनाया जाता है. इस पर्व के दौरान कुंवारी कन्‍याओं की भूमिका सबसे अहम होती है. कुंवारी कन्याएं टुसू की मूर्ति बनाती हैं. उसकी सेवा-भावना, प्रेम-भावना, शालीनता के साथ पूजा करती हैं. पूजा के दौरान लड़कियां विभिन्न प्रकार के टुसू गीत भी गाती हैं. इसमें कुंवारी लड़कियों की मां, चाची, फुआ, मौसी सहयोग करती हैं.

मकर पर्व पर नहीं हुई घाटों की साफ-सफाई

सरायकेला-खरसावां जिला में मकर संक्रांति के दौरान अहले सुबह नदी व जलाशयों में स्नान करने का रिवाज है. नदी में स्नान को पवित्र माना जाता है, लेकिन इन दिनों खरसावां, सरायकेला, कुचाई, सीनी, बड़ाबांबो के विभिन्न घाटों के पास गंदगी का अंबार लगा है. प्रशासनिक स्तर पर नदी घाटों की सफाई नहीं की गयी. इन घाटों को साफ करने के लिए कोई सामाजिक संगठन भी सामने नहीं आया. प्रशासन ने नदी घाटों पर बिजली की भी व्यवस्था नहीं की है. मालूम हो कि दो दिन बाद ही मकर पर्व शुरू हो जायेगा.

टुसू पर्व पर गाये जाते हैं बांग्ला टुसू गीत

टुसू पर्व पर विशेष तौर पर टुसू गीत गाये जाते हैं. टुसू गीत मुख्य रूप से बांग्ला भाषा में होते हैं. टुसू प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए नदी में ले जाते समय टुसूमनी की याद में टुसू गीत गाये जाते हैं. ढोल व मांदर की ताल पर महिलाएं थिरकती हैं. टुसू पर गाये जानेवाले गीतों में जीवन के हर सुख-दुख के साथ सभी पहलुओं को समाहित किया जाता है. ये गीत मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाने वाली बांग्ला भाषा में होती है.

– टुसू गीत –

अगहन सांकराइत कर शुभ दिने

टुसुक थापना करोब गीत गाने।।

बांसेक टुपलाय यापना करी- साजाय हेतेइक फुल माहने,

नित-नित सांझेक बेराय- संझा दिहोक खुश मने।।

आगहन सांकराइत कर शुभ दिने

टुसुक थापना करोब गीत गाने।।

टुसूके नित भोग देबिहोक – बेश बेश आर मिष्ठाने,

मास भइर टुसु कर पूजा- खुशी सउब जने-जने।।

आगहन सांकराइत कर शुभ दिने

टुसुक थापना करोब गीत गाने।।

टुसुकर गुणोगान टा-मने पड़ेइक जीवने

सारा दिनो टुसू गीते- मातल आहे देवेने।।

आगहन सांकराइत कर शुभ दिने

टुसुक थापना करोब गीत गाने।।

 

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