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पर्यावरण संकट से अब भी दूर नहीं हुआ है सारंडा का जनजातीय समाज

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#RANCHI : पूरे विश्व में आज पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है लेकिन एशिया के सबसे घने झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के सारंडा के जंगल में रहने वाले जनजातीय समाज के लोग आज भी पर्यावरण संकट से दूर नहीं हुए हैं.

जनजा‍तीय बच्‍चों के लिए बेशकीमती है खास माला

सारंडा के जंगल में रहने वाले धनु समेत अन्य जनजातीय बच्चों के गले में पड़ी माला भले ही कुछ लोगों के लिए सौंदर्य को प्रदर्शित करने वाली वस्तु हो, लेकिन साधारण से धागे में किसी पौधे की डंडियों को पिरोकर बनायी गयी इस माला की कीमत भले ही कोई समझ नहीं पाये, परंतु धनु के लिए यह बेशकीमती है.

सारंडा का यह इलाका देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. सारंडा के जंगल वासी धनु के इस इलाके में लौह अयस्क (आयरन ओर) की भरमार है. देश की बड़ी बड़ी कंपनियां पिछले कई सालों से पहाड़ खोद खोद कर अरबपति-खरबपति बन चुकी हैं. चाइना समेत दुनिया भर में यहां का आयरन ओर प्रसिद्ध है.

सबसे महंगी लकड़ियां भी यहीं से जाती है. मगर धनु के गले में पीतल की माला भी मयस्सर नहीं है. माला की चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि यह माला धनु जैसे जंगल में रहने वाले सैकड़ों-हजारों लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है.

नहीं मिलता सरकारी योजनाओं का लाभ

साधारण से दिखने वाला यह माला उन्हें कई बीमारियों से बचाता है. सारंडा के घने जंगलों में रहने वाले धनु जैसे सैकड़ों परिवारों ने भले ही बीमारियों से बचने का एक परंपरागत रास्ता ढूंढ़ निकाला हो, लेकिन सच्चाई यह भी है कि खाद्य सुरक्षा कानून, उज्ज्वला योजना, मनरेगा, वृद्धा पेंशन कार्ड और न जाने कई योजनाओं यहां पहुचते पहुचतें दम तोड देता है. यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि इस पूरे इलाके में रहने वाले प्राचीन वासियों की हकीकत भी है. 21वीं सदी के इस युग में भी धनु जैसे दर्जनों घर में आज भी सिर्फ एक वक्त का खाना बनता है.

सारंडा में बाहरी लोग आते हैं, यहां खुदाई करते हैं और इनके लिए छोड़ जाते हैं , चौड़ी- चौड़ी होती हुई घाटियां. जिसमें सिर्फ मिलते हैं मलबे . विकास का मलबा इनके हिस्से आती हैं, सिर्फ गरीबी. जिस जंगल के सहारे इनका जीवन यापन होता रहा वह भी खात्मे के कगार पर है.

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