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गैर कांग्रेस-गैर बीजेपी, 2019 चुनाव के लिए तीसरे मोर्चे की कसरत

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हाल तक ऐसा लग रहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर के दो राजनीतिक मोर्चों के बीच आमने-सामने की टक्कर होगी. विपक्षी नेता कई मौकों पर साथ खड़े दिखाई दिए और अलग-अलग मौकों पर सबने कहा कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी को सत्ता से हटाने की है.

संकेत साफ था कि समूचा विपक्ष एकजुट होकर मोदी सरकार को चुनौती देने का मन बना चुका है और इसके लिए एक बीजेपी विरोधी महागठबंधन का बनना निश्चित है. पर कुछ क्षेत्रीय पार्टियों की हालिया गतिविधियों से जाहिर है कि सारा अपोजिशन एक तरह नहीं सोच रहा.

गैर कांग्रेस-गैर बीजेपी मोर्चा बनाने की अवधारणा अब नए सिरे से जोर पकड़ रही है. इसे जमीन पर उतारने के लिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के मुखिया के. चंद्रशेखर राव ने ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी से मुलाकात की.

के. चंद्रशेखर राव का कहना कि 2019 के चुनावों से पहले देश को बीजेपी और कांग्रेस का विकल्प देने के लिए क्षेत्रीय दलों को एकजुट होना होगा. वह विपक्ष के और भी कई नेताओं से मिलने जा रहे हैं. इससे ऐसा लगता है कि अगले चुनाव का स्वरूप दो-ध्रुवीय हो पाना लगभग असंभव है. तीन मोर्चे तो अभी ही दिख रहे हैं. क्या पता, कल कोई चौथा फ्रंट भी सामने आ जाए.

मोर्चे की चौथी कसरत

ऐसा हुआ तो इस आम चुनाव की शक्ल भी 2019 के जनरल इलेक्शन जैसी ही होगी, जिसमें मायावती और वामपंथ की साझेदारी वाला एक मोर्चा भी मैदान में था. इस बार वाम दलों का रुख अब तक साफ नहीं है, लेकिन यूपी में बन रहे गैर कांग्रेस-गैर बीजेपी मोर्चे के साथ मिलकर वे मोर्चे की चौथी कसरत को अंजाम दे सकते हैं.

कहा जा रहा है, यूपी में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अजित सिंह की राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) ने कांग्रेस को दरकिनार कर आपस में एक समझौता कर लिया है. अखिलेश यादव प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी की उम्मीदवारी से खुलकर अपनी असहमति जता चुके हैं. पिछले आम चुनाव में समाजवादी पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस के साथ और बीएसपी ने वाम दलों के साथ मिलकर चुनाव प्रचार किया था.

इस बार यूपी में गठबंधन बना रहे तीनों विपक्षी दल राष्ट्रीय स्तर पर जिस मोर्चे में शामिल होने का फैसला करेंगे, उसका वजन अपने आप बढ़ जाएगा. तीसरे मोर्चे के पैरोकार चंद्रशेखर राव ने अभी तक यह नहीं कहा है कि मोदी सरकार से उनका नीतिगत विरोध क्या है, लिहाजा चुनाव बाद इस मोर्चे के रुख को लेकर भी दुविधा बनी हुई है. अलबत्ता उनकी कोशिशों से इतना जरूर हुआ है कि विपक्ष का जो मूमेंटम पिछले कुछ दिनों में बनता दिखा था, गैर-कांग्रेस गैर-बीजेपी गोलबंदी से वह अचानक ठंडा पडऩे लगा है.

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