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खूंटी में तीन जवानों को तलाशने के लिए चला सबसे बड़ा सर्च ऑपरेशन

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#Ranchi :तीन दिन की कवायद और हजारों जवानों द्वारा चलाए गए सर्च ऑपरेशन में खूंटी के भाजपा सांसद कड़िया मुंडा के आवास से अगवा तीन सुरक्षाकर्मियों समेत चार जवानों को शुक्रवार तड़के रिहा करा लिया गया है. इसके बाद जिले के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक ने एक उच्चस्तरीय बैठक की, जिसमें पत्थलगड़ी समर्थकों पर नए सिरे से कार्रवाई की रणनीति बनाई गई. दरअसल, इन दिनों घाटी में पत्थरबाजी तो झारखंड में पत्थलगड़ी से पुलिस प्रशासन की नींद उड़ी हुई है.

तीन की जगह चार जवान हुए रिहा

दरअसल, खूंटी में पत्थलगड़ी समर्थकों के द्वारा अगवा तीन जवानों को रिहा कराने के लिए झारखंड पुलिस के जवान बीते तीन दिनों से जंगलों की खाक छान रहे थे इन्हें खूंटी के पास साइको इलाके के पुटीगढ़ा गांव के पास छोड़ा गया. जो स्थानीय थाने से चार किलोमीटर की दूरी पर है लेकिन लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब तीन की जगह चार जवानों को मुक्त किया गया. पुलिस की मानें तो चौथा जवान छुट्टी पर था और पुलिस को उसके अगवा होने की कोई जानकारी नहीं थी.

जवानों का सुराग देने वाले को 50 हजार का इनाम

इस ऑपरेशन में तीन हजार से अधिक जवान शामिल थे. जिसमें 8 DSP, 387 प्रशिक्षु दरोगा, जैप की 10 कंपनी और रैपिड एक्शन फॉर्स के दस्ते शामिल थे. सुराग देने वाले को 50 हजार इनाम की घोषणा भी की गई थी. अभियान का नेतृत्व आईजी लेवल के अधिकारी कर रहे थे. सांसद के घर से जवानों के अगवा होने की घटना से झारखंड पुलिस पर काफी दबाब बढ़ गया था और उन्हें छुड़ाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी लोगों से अपील की थी कि जिन्होंने जवानों को अगवा किया है वे बिना शर्त अपहृत जवानों को छोड़ दें. अन्यथा सरकार उन्हें पाताल से भी ढूंढ निकालेगी. इस पूरे मामले में पुलिस का ख़ुफ़िया तंत्र पूरी तरह से विफल नजर आया जो घाघरा और आस-पास के गावों में बन रही विस्फोटक स्तिथि को भांपने में असफल रहा.

सदियों से चली आ रही प्रथा है पत्थलगड़ी

झारखंड में पत्थलगड़ी मुद्दे पर सरकार और आदिवासी समाज आमने सामने खड़े हैं. जिसकी वजह से आदिवासियों के प्राचीन परंपरा के तौर पर मशहूर पत्थलगड़ी अब विवादों में घिर गया है. पत्थलगड़ी को आज जिस रूप में सामने लाने की कोशिश की जा रही है वो वास्तविकता से विपरीत है. पत्थलगड़ी दरअसल सदियों से चली आ रही एक प्रथा है. जिसमें गांव के बाहर पत्थर लगाकर गांव का सीमांकन किया जाता था. पत्थलगड़ी मुख्य रूप से आदिवासियों का धार्मिक-सांस्कृतिक, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक-प्रशासनिक इतिहास, अभिलेख, संविधान और पट्टा है, जो उनके समाज को आदिवासियत के सामूहिक, सामुदायिक व सहजीवी उसूलों पर कायम रहने के लिए दिशानिर्देशित और अनुशासित करता है. पत्थलगड़ी उनके पुरखों की स्मृतियों को जीवित रखने और रहनेवाले जगहों पर पारंपरिक अधिकारों को बहाल रखने की ऐतिहासिक सोच को दर्शाता है. लेकिन अब इसका इस्तेमाल सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिए किया जा रहा है.

पत्थलगड़ी पर राजनीति

झारखंड के कई इलाकों में हो रही पत्थलगड़ी की घटनाओं ने राजनीति को भी जन्म दे दिया है. एक ओर बीजेपी की अगुवाई वाला सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन इसे राजनीतिक साजिश बताने में तुला है, वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष इसके लिए सरकार की आदिवासियों विरोधी नीतियों को जिम्मेदार बता रहा है. जिसकी वजह से आदिवासी समुदाय सरकार के खिलाफ अपने जंगल और जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहा है. पत्थलगड़ी की वजह से खूंटी जिला सबसे अधिक प्रभावित नजर आ रहा है. पत्थलगड़ी ने शांत आदिवासी समुदाय में अशांति जरूर पैदा कर दी है. वहीं विपक्ष बीजेपी की नीतियों को आदिवासियों के खिलाफ बताने पर तुला है. उसका कहना है कि जमीन अधिग्रहण, धर्म परिवर्तन निषेध जैसे क़ानून और आदिवासियों की समस्याओं से मुंह मोड़ने की वजह से ऐसी स्तिथि पैदा हुई है.

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