Take a fresh look at your lifestyle.

अयोध्या पर मध्यस्थता के मामले में SC का फैसला सुरक्षित

निर्मोही अखाड़े को छोड़कर हिंदू पक्ष ने मध्यस्थता का विरोध किया, मुस्लिम पक्षकार राजी

0

New Delhi: अयोध्या मामले में मध्यस्थता के मामले पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से मध्यस्थता का विरोध किया गया. हिंदू पक्ष की ओर से कहा गया कि हिंदू इस मामले को भावनात्मक और धार्मिक आधार पर देखते हैं. जबकि मुस्लिम पक्ष ने मध्यस्थता का समर्थन किया.

हिंदू पक्ष के वकील ने बाबर द्वारा मंदिर को गिराने का जिक्र किया. इस पर जस्टिस एसए बोब्डे ने कहा कि इतिहास हमने भी पढ़ा है. इतिहास पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है. हम जो भी कर सकते हैं वो वर्तमान के बारे में कर सकते हैं. हिंदू पक्ष में केवल निर्मोही अखाड़े ने मध्यस्थता का समर्थन किया. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सुझाव दिया कि मध्यस्थता की कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग नहीं की जाए. तब मुस्लिम पक्ष की ओर से वकील राजीव धवन ने कहा कि अगर मध्यस्थता की मीडिया रिपोर्टिंग की जाए तो उस पर अवमानना का मामला चलाया जाए. पिछले 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने 8 सुनवाई 8 हफ़्ते के लिए टाल दी थी. कोर्ट ने सभी पक्षों को दस्तावेजों का अनुवाद देखने के लिए 6 हफ्ते का वक्त दिया था.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की रिपोर्ट में बताया गया था कि अभी भी कोर्ट के ऑफिसियल ट्रांसलेटर द्वारा हजारों पेज का अनुवाद किया जाना बाकी है. इस पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सभी पक्षकारों से पूछा था कि क्या वो उत्तरप्रदेश सरकार और दूसरे पक्षकारों की ओर से जमा कराई गई ट्रांसलेटेड कॉपी को स्वीकारने के लिए तैयार है?

चीफ जस्टिस ने कहा था कि जब सब पक्षकार दस्तावेजों के सही अनुवाद को लेकर निश्चिंत हो जाएंगे, तब हम सुनवाई शुरू कर सकते हैं. एक बार जब हम अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू कर देंगे, हम नहीं चाहते कि बाद में कोई भी पक्षकार अनुवाद में खामी का हवाला देकर सुनवाई टालने की मांग करे. मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा था कि हम उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से दी गई ट्रांसलेटेड कॉपी का क्रास चेक करना चाहते हैं. रामलला की ओर से वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा था कि इसके लिए अवसर पहले ही दिया गया था उस समय कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई गई थी. अब उसकी समय सीमा खत्म हो चुकी है. तब चीफ जस्टिस ने कहा था कि यही तो हम कहना चाह रहे हैं. अगर पक्षकार सहमत हैं तो हम आगे की सुनवाई शुरू कर सकते हैं. चीफ जस्टिस ने मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश वकील राजीव धवन से पूछा था कि दस्तावेजों के अनुवाद को परखने में कितना वक्त लेंगे. तब राजीव धवन ने कहा कि 8 से 12 हफ्ते का वक्त लगेगा.

सुनवाई के दौरान जस्टिस बोब्डे ने मध्यस्थ बनने का ऑफर दिया था. उन्होंने कहा कि ये कोई निजी संपत्ति को लेकर विवाद नहीं है, मामला पूजा-अर्चना के अधिकार से जुड़ा है. अगर समझौते के जरिए 1 फीसदी भी इस मामले के सुलझने का चांस हो, तो इसकी कोशिश होनी चाहिए. इस संविधान बेंच में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एस ए बोब्डे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

अयोध्या मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर अविवादित जमीन से यथास्थिति का आदेश वापस लेने की मांग की है. केंद्र सरकार ने 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था और सिर्फ 0.313 एकड़ जमीन पर विवाद है. बाकी जमीन को रिलीज करने के लिए याचिका दायर की गई है. इस्माइल फारुकी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि जो जमीन बचेगी उसे उसके सही मालिक को वापस करने के लिए केंद्र सरकार बाध्य है. इसमें 40 एकड़ जमीन राम जन्मभूमि न्यास की है. हम चाहते हैं कि इसे उन्हें वापस कर दी जाए साथ ही वापस करते समय यह देखा जा सकता है कि विवादित भूमि तक पहुंच का रास्ता बना रहे. उसके अलावा जमीन वापस कर दी जाए. केंद्र सरकार ने कहा है कि जमीन वापस करते समय यह देखा जा सकता है कि विवादित भूमि तक पहुंच का रास्ता बना रहे. उसके अलावा जमीन वापस कर दी जाए . केंद्र सरकार ने याचिका में कहा है कि 2003 में जब सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर में शिलापूजन की अनुमति नहीं दी थी तो विवादित भूमि और अधिगृहित की गई 67 एकड़ की जमीन पर यथास्थिति बहाल रखने का आदेश दिया था.

केंद्र सरकार ने 1993 में इस जमीन का अधिग्रहण किया था. इस्माइल फारुकी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा है कि जो जमीन बचेगी उसे उसके सही मालिक को वापस करने के लिए केंद्र सरकार बाध्य है. इसमें 40 एकड़ जमीन राम जन्मभूमि न्यास की है. भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली अखिल भारतीय हिन्दू महासभा और 7 रामभक्तों की याचिकाओं पर भी सुप्रीम कोर्ट 26 फरवरी को ही सुनवाई करेगा. 27 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत के फैसले से अयोध्या मसले पर फैसला सुनाते हुए कहा था कि इस्माइल फारुकी का मस्जिद संबंधी जजमेंट अधिग्रहण से जुड़ा हुआ था. इसलिए इस मसले को बड़ी बेंच को नहीं भेजा जाएगा. जस्टिस अशोक भूषण ने फैसला सुनाया था जो उनके और चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का फैसला था. जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने अपने फैसले में कहा कि इस्माईल फारुकी के फैसले पर पुनर्विचार के लिए बड़ी बेंच को भेजा जाए.

सभी पक्षों की क्या है राय है?

निर्मोही अखाड़ा

निर्मोही अखाड़ा एक मात्र ऐसा हिंदू पक्ष है, जो इस मामले को सुलझाने के लिए बातचीत करने को तैयार है. निर्मोही अखाड़ा के वकील का कहना है कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं.

मुस्लिम पक्ष

26 फरवरी को मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन और दुष्यंत दवे ने कहा था कि वो बातचीत के लिए तैयार है. लेकिन बातचीत की रिकॉर्डिंग हो और गोपनीय हो.

रामलला विराजमान

रामलला विराजमान के वकील सी एस वैधनाथन ने कोर्ट से बाहर इस मामले की सुलझाने के लिए तैयार नहीं हैं. 26 फरवरी को सुनवाई के दौरान रामलला विराजमान की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील सी एस वैधनाथन ने कहा था कि इस मसले को अदालत के बाहर आपसी सहमति से सुलझाने की कई बार कोशिश की गई, लेकिन सहमति नही बन पाई. ऐसे में कोर्ट इस मामले की अंतिम सुनवाई शुरू करे.

अखिल भारत हिन्दू महासभा

अखिल भारत हिन्दू महासभा के वकील हरि शंकर जैन के कहा कि इस मसले का बातचीत से हल नहीं निकल सकता. क्योंकि इससे पहले भी कई बार बातचीत से इस विवाद को हल करने की कोशिश की गई है. अयोध्या राम जन्मभूमि में एक टुकड़ा भी मुस्लिम पक्ष को नहीं दिया जा सकता.

 

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More