PM Narendra Modi के नाम पत्र लिख कर आजसू प्रमुख Sudesh Mahto ने जातीय जनगणना कराने का आग्रह किया

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Ranchi: आजसू पार्टी केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है. इस पत्र के जरिए सुदेश महतो ने जातीय जनगणना कराऐ जाने का अनुरोध किया है. बता दें कि केंद्र की मोदी सरकार के गठबंधन का आजसू पार्टी समर्थक है और गिरिडीह के सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी हैं.

आजसू पार्टी के केंद्रीय प्रवक्‍ता डॉ देवशरण भगत ने आजसू प्रमुख सुदेश महतो के पीएम मोदी के लिखे पत्र की जानकारी साझा की है. सुदेश महतो ने अपने पत्र में पीएम से कहा है कि आपकी तमाम व्यस्तताओं के बीच बड़ी आबादी और लोकहित से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय-जातीय जनगणना की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं.

उन्‍होंने लिखा है कि केंद्र सरकार ने नीतिगत मामले के तौर पर फैसला किया है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा कोई जातीय जनगणनना नहीं होगी. हाल ही में इस बाबत लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यह जानकारी भी दी है.

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जबकि देश के हर व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक स्थित का आंकलन जनगणना में होता है. जनगणना, नीतियां बनाने का एक प्रमुख आधार भी है. साथ ही जातीय आंकड़े आरक्षण की सीमाएं तय करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. अलग-अलग जगहों पर आरक्षण की मांग भी जातीय आबादी के दावे के साथ उठती रही हैं.

सुदेश महतो से पीएम मोदी से आग्रह करते हुए लिखा है कि हमारा विनम्र आग्रह है कि केंद्र सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार करे. दरअसल, जातीय जनगणना वक्त और सभी तबके के समेकित विकास तथा हिस्सेदारी के लिए मौजूदा जरूरत है. साथ ही यह सामाजिक-राजनीतिक बहस के केंद्र में भी है.

उन्‍होंने कहा कि महोदय, कई राज्यों ने जनगणना में जातीय विवरण जुटाने का केंद्र सरकार से अनुरोध किया है. अलबत्ता बिहार विधानसभा ने इसके लिए साल 2019 और 2020 में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा है. हम यह गौर करते रहे हैं कि झारखंड में पिछड़ा वर्ग की अपेक्षाएं भी इससे जुड़ी है. ओबीसी झारखंड राज्य समेत देश की जनसंख्या का बड़ा समूह है. अलग-अलग राज्यों में पिछड़ा वर्ग आयोग गठित हैं, जो कई मामलों में रिपोर्ट करती रही है.

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उन्‍होंने पत्र में लिखा है कि आदरणीय प्रधानमंत्री जी, आपके नेतृत्व में चल रही सरकार पिछड़े, दलितों, आदिवासियों के हितों को लेकर हमेशा गंभीर रही है.  

जातीय जनगणना को लेकर कई तर्क दिए जाते हैं और इसके न कराने के पीछे सामाजिक तानाबाना बिगड़ने के जोखिम को भी देखा-समझा जाता रहा है. लेकिन मैं समझता हूं कि जातीय जनगणना होने से तमाम आशंकाएं निर्मूल साबित होंगी.

सुदेश ने पीएम को लिखा है कि सामाजिक तानाबाना पहले से जाति, उपजाति, धर्म, गोत्र के आधार पर टिका है. जातीय संस्थाएं और संगठन भी मौजूद हैं. हालांकि परिस्थितियां पहले से बहुत बदली हैं. लिहाजा तह तक देखे जाने के साथ यह विचार जरूर किया जाना चाहिए कि जब जातियां मौजूद हैं, तो गिनती भी कराई जा सकती है. इसलिए जरूरी है कि 2021 की जनगणना जातीय आधारित हो. इससे वास्तविक जरूरतमंदों को सरकारी योजना और कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ भी ज्यादा मिल सकता है.

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