‘सावनी फुहार’ में भीगता स्त्री मन

by
Indu Singh

सुबह से घर में पसरे काम को समेटते-समेटते ऊब सी होने लगी थी. थक हार कर कुछ देर लेटने का मन हुआ पर बादलों की गड़गड़ाहट से मन सिहर उठा. पर्दा हटाकर खिड़की से ऊपर आसमान में नजर दौड़ाई तो काले-काले, ढेरों पानी से लदे घने बादल दिखाई पड़े. झटपट मन और पैर दोनों छत पर पसारे हुए कपड़ों की ओर दौड़ पड़े. एक तरफ हाथ लबालब कपड़ों को समेटे जा रहा था, वहीं मन एकदम से जाकर उमड़ते काले-काले बादल और आसपास की फैली हरियाली में जा बसा. पैर थम गए लेकिन मन कालिदास के ‘मेघदूत’ की तरह मां के आंगन और वहां दादी, बुआ, बहनों और आसपास कि हम उमर सहेलियों की यादों से भर उठा. आंखें नम हुई और मन आत्मीय प्रेम और प्रकृति की खूबसूरती को शास्त्रीय दृष्टि से नहीं बल्कि देसी लोक स्वाद से बरबस ही चखने लगा.

लोक साहित्य अथवा लोकगीतों में स्त्रीमन और स्त्री की संवेदनाओं का बेजोड़ चित्रण समूचे भारतीय वांग्यमय में मिलती है,  फिर चाहे अब्दुल रहमान का ‘संदेशरासक’ हो या फिर कालिदास के शिष्ट साहित्य ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ में चित्रित खेत खलियान और लोक स्वर में धान रोपते स्त्रियों के लोकगीतों में. स्त्रियां लोक की सबसे सशक्त संवाहिका होती है. स्त्री जीवन और मन के तमाम उधेड़-बुन, राग-विराग, सुख-दुख,  पीड़ा-वेदना मानो कई निःशब्द अनुभूतियां और तकलीफें दबे जुबान से ही सटी किंतु लोक गीतों के माध्यम से शब्दबद्ध होती है.

स्‍त्री और पृथ्वी दोनों सावन मास में श्रृंगार और सौंदर्य का पर्याय है. हरियाली सौंदर्य से सजी समूची वसुधा की तरह ही औरतें हरी साड़ी, हरी चूड़ियां, हरी-हरी मेहंदी लगाकर देवी पार्वती के आराध्य भगवान शिव से अपने पति और कुटुंब की मंगल कामना के लिए पूजा-अर्चना और व्रत-उपवास रखती है.

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सावन महीने में उपवास रखने और मंदिर जाकर बेलपत्र चढ़ाने, फूल चुनने जैसे रस्मों-रिवाजों को पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाएं संजोती और सिखाती है. लोकगीत स्त्रीमन की अनुभूतियों का बेबाक दर्पण है, लोकगीतों और सावनी फुहारों में भीगी नहलायी धरती और स्त्री के सौंदर्य पर कितने ही महाकाव्य और रचनाएं लिखे गए हैं लोक गीतों में कजरी का अपना खास महत्व है कजरी मूलतः उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के आस-पास गाए जाने वाली लोकगीत है. आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु ने भी कजरी और सावनी लोकगीतों जो चौमासा- आषाढ़, सावन, भादो और आश्विन महीने में गाई जाती है, इससे मेरा पहला साक्षात्कार घर के आंगन में दादी और फिर मां से हुआ. लोक गीतों में संवाद शैली, प्रश्नोत्तरी शैली, किस्सा-गोई तोता-मैना शैली से शुरू होती लोक गीतों में दांपत्य जीवन के नोक-झोंक राग-विराग मिलन-बिछोह, संतान की प्राप्ति, सास-ननद की कड़वी बातें सभी का समाहार समाविष्ट होता है. कम शब्दों में कहूं तो स्त्रीमन और स्त्री जीवन को अगर समझना है तो लोकगीतों को एक बार ध्यान से सुन लें –

” हम तो खेलन जैबे सावन में कजरिया,  बदरिया घिरे आए ननदी”

” तू तो जात बाड़ू अकेले, कोई संगे न सहेली, कोई छेक लिहै, तोहरी डगरिया कजरिया कैसे खेले भौजी”

एक तरफ झूला-झूल कर सावन को अपने भीतर समेट लेने की चाहत है तो घर के कामकाज से कुछ देर बेफिक्री के कुछ पल जी लेने की आकांक्षा है. रोज-रोज के चौका-बाषण से गंदे हुए हाथों और फीकी पड़ चुकी चूड़ियों की चमक को उतारकर एक नई नवेली साड़ी और हरी चूड़ियों को भर-भर हाथ पहन लेने, मेहंदी रचा कर सिंगार करने की अदम्य लालसा है.

वहीं ननद द्वारा भाभी को लोक-लाज का भय दिखाकर पैर वापस घर की ओर मोड़ लेने की सलाह है इस गीत में नोकझोंक के साथ नंनद-भौजाई के आपसी रिश्ते की नरमाहट भी है. लेकिन हमारी सामाजिक परंपरा में स्त्री की बंदिशों और लोक-लाज की काफी ऊंची दीवार भी खड़ी नजर आती है.

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समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखे तो औरतों के पूरे जीवन का ताना-बाना एक अलग प्रकार के नियम और संविधान से निर्मित होता है. जहां आत्मिक चाह और स्वयं की इच्छा के जगह सामाजिक,  पारिवारिक और दांपत्य जीवन के रिश्तों की इतनी उलझी हुई बनावट होती है, कि उस उलझे रिश्ते को सुलझा कर ठीक करते करते ही समय बीत जाता है. शायद इसीलिए स्त्रियों को पूज्य भी माना जाता है और भारतीय परंपरा में गृहिणी को लक्ष्मी के पर्याय के रूप में चित्रित किया जाता है.

आधी आबादी वाले इस वर्ग को ताकत को समझना है तो अपने लोग जीवन में पसरी तमाम रीति-रिवाजों, तीज, त्योहारों, व्रत-उपवास, खान-पान को समझने की आवश्यकता है. हमारी दादी,  नानी, बुआ, चाची ने भले ही कोई परंपरागत शास्त्रीय शिक्षा या बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल ना की हो लेकिन रिश्तों की नरमाहट संबंधों की बुनाई, अपनत्व का ताना-बाना, संस्कृति और संस्कारों का बेहद सुंदर संरक्षण और पोषण किया है और भावी पीढ़ियों को उसे सौंपा है.

आज विश्व, देश, समाज, परिवार सभी तेजी से बदल चुके हैं. उत्तर आधुनिकतावाद दौर मैं हम महिलाएं पुरुषों से कदम से कदम मिलाकर चल रही है. शिक्षा, व्यवसाय, विज्ञान, तकनीकी, राष्ट्रीय सुरक्षा, के क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है. बेटियां नई उमंग के साथ पूरी स्वतंत्रता से अपने सपनों को पंख दे रही है. आधुनिकीकरण और पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति की दस्तक हमारे घर के रसोई तक पहुंच चुकी है. ऐसे गंभीर वक्त में हम स्त्रियों अपनी लोग की विरासत और संस्कृति को बाजार के गिरफ्त में जाने से रोकने की जरूरत है. हमारे रीति-रिवाज, लोक-परंपराएं और आस्था पश्चिमी जीवनशैली की चकाचौंध और बाजारीकरण को शोरगुल वाली दुनिया में खाते जा रहे हैं.

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समकालीन समय में जब कोरोना का भय विश्व व्यापी स्तर पर मंडरा रहा है ऐसे वक्त में हम स्त्रियां क्यों ना अपने-अपने घरों में रिश्तों को प्रेम और अपनेपन की गर्माहट से बुनें?

कोरोना ने हमारे रिश्तों को अकेलापन नहीं बल्कि एकांत दिया है. एकांतता ‘सर्जनात्मक’ होती है. आज के यांत्रिक जीवन से दूर हम रिश्तों की दुनिया में जी रहे हैं, ‘किचन’ अब फिर से ‘रसोई’ में बदल गई है,  जिसमें हमारे लोक पकवानों की सुगंध भर गई है और साथ बैठकर खाने से थाली में खाने के साथ प्रेम की मिठास भी घुल गई है.

आइए, इस समय में घर के दरवाजे को बंद करके दिल के दरवाजे, को खोलें लोक के देसी स्वाद और लोकगीतों से एक बार फिर अपनी बेटियों और बहुओं को रूबरू कराएं. अब तक सहेज कर रखी गई लोक-विरासत और संस्कृति को आज की भावी पीढ़ी को सौपें. सावन महीने में सश्‍य,  श्यामला,  वत्सला, धरती मां और स्त्री के श्रृंगार और रूप के अनुपम संयोग से जीवन के प्रति राग और जिजीविषा को पुनः अपने भीतर जगाए.

जेठ की तपती दुपहरी में संतप्त वसुधा को पुनः सावनी फुहारों से नहलाते इस सावन माह से हम स्त्रियां यह सीखें की जीवन के तमाम संघर्षों के बावजूद भी यह प्रकृति हमें नई उमंग, उल्लास,प्रेम, सौंदर्य व साहस से उठकर हरे-भरे अर्थात खुशहाल जीवन जीने की प्रेरणा देती है.

(लेखिका सरस्‍वती शिशु मंदिर, धुर्वा की ‘आचार्या’ हैं)

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