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सूचना का अधिकार देश की जनता के लिए बहुत बड़ी ताकत

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Anad Kishor Panda

लेखक: आनंद किशोर पंडा

अक्टूबर 2005 से पहले हमारे पास सरकारी/गैरसरकारी विभागों से जानकारी हासिल करने की कोई क्रियाविधि नहीं थी. जिसका परिणामस्वरूप न्यायालयों में मुकदमों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती गई. सूचना का आदान – प्रदान से वाकई में न्यायालय में मुकदमों की संख्या में कुछ कमी भी हुई है.

12 अक्टूबर 2005 को हमारी सरकार ने हमें यह अधिकार दिया है जो अधिकांश सरकारी निर्माण रिकॉर्ड्स और जानकारियों तक बिना रोक-टोक हमारी पहुंच को संभव बनाता है. यह अधिकार हमें सरकारी निर्माण कार्यों और दफ्तरों की जाँच करने की अनुमति भी देता है. इसके द्वारा नागरिकों को रिकाडर्स की जांच करने, कागजातों की प्रमाणित नकल लेने और सामग्री के नमूने हासिल करने का अधिकार भी दिया गया है.

सूचना का अधिकार शुल्‍क

आम नागरिक आवेदन-पत्र के साथ केवल 10 रूपये की फीस (नकद, बैंक ड्राफ्ट, आई॰पी॰ओ॰ चालान, नन जुडिसियल स्टांप) देकर ढेर सारी जानकारियाँ ले सकता है. सरकारी/गैरसरकारी संगठनों के रिकॉर्ड्स की जांच कर सकता है और खूद ही जमीनी सच्चाईयों का पता लगा सकता है. यह सब संसद द्वारा अधिनियमित सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के द्वारा संभव हुआ है.

सरकारी प्रचार-प्रसार नहीं होने के कारण जानकारी के अभाव में भले ही लोग इसका फायदा नहीं उठा रहे हैं, जबकि यह भारतीय संविधान का मूल अधिकार ही नहीं सर्वोच्च भी है, क्योंकि सरकारी विभागों एवं एजेंसियों के प्रत्येक नागरिकों का नाता चोली-दामन जैसा है. एक साधारण जन्म प्रमाण-पत्र से लेकर मृत्यु प्रमाण-पत्र पाने तक हम इन पर आश्रित है.

सूचना का अधिकार आवेदन फॉर्म (Right to Information form)

भारतीय प्रत्येक नागरिक एक करदाता है, बी॰पी॰एल॰ धारी व्यक्ति भी सरकार को टैक्स देता है और सरकार चलती है नागरिकों के द्वारा दिये गये टैक्स से संभवतः लोग सरकारी विभागों एवं एजेंसियों द्वारा की जा रही कारवाई की जानकारी चाहते है, जिनका आम आदमी के जीवन पर असर पड़ता है. प्रश्न करना हमारा कर्तव्य ही नहीं अधिकार है, सभी प्रगतिशील जनतंत्रों में सूचना का अधिकार नागरिकों को दिया गया है, जिससे लोग सरकारी रिकार्ड एवं सूचना प्राप्त कर सरकार से प्रश्न पूछ सके.

सूचना के उपलब्धता से लोगों में सरकार द्वारा लिये गये फैसले की जानकारी बढ़ती है, और जानकारी से होती है विवेचना, जो एक आधुनिक एवं प्रगतिशील समाज के लिये बेहद जरूरी है. सही समय पर प्राप्त सूचना से भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन तथा सरकारी/गैरसरकारी तंत्र के दुरूप्रयोग पर अंकुश लगाया जा सकता है.

सारी दुनिया में सरकारें अपने नागरिकों को अपने कार्य-कलापों की ज्यादा से ज्यादा जानकारी उपलब्ध करा रही है. दुनिया के 50 से ज्यादा देशों ने संस्थाओं द्वारा रखे गये रिकॉर्ड तक लोगों की पहुँच सुगम बनाने के लिए सूचना के आजादी अधिनियमों या सूचना की अधिनियमों की व्यापक रूप से अपना लिया है.

अंतराष्ट्रीय दबाव, आधुनिकीकरण, भ्रष्टाचार और लोकनिंदा सूचना के अधिकार की एक मानवाधिकार के रूप में पहचान आदि कई कारण इस बदलाव के लिये जिम्मेदार है. हमारा भारत देश भी इस क्षेत्र में सक्रिय रहा है, भारत सरकार ने सूचना का अधिकार कानून को अधिनियमित कर पूरे भारतवर्ष के सार्वजनिक प्राधिकरण में हलचल पैदा कर दी है. सूचना रोकने, छिपानेवाले अधिकारी इस आरटीआई कानून के आने से डरे-सहमें रहते हैं.

हमारे देश के अधिनियमित होनेवाले कानूनों में सूचना का अधिकार कानून सबसे महत्वपूर्ण कानूनों में से एक है. यह लोगों के सूचना के अधिकारों को मान्यता देता है, जो बहुत से अदालती फैसलों में हमारे संविधान में दिये गये मौलिक अधिकारों में से एक के रूप में घोषित किया जा चुका है.

इस अधिनियम की परिधि में केन्द्र व राज्य सरकारों के अलावा ग्रासरूट प्रजातांत्रिक संस्थानों और ऐसी संस्थाओं जिन्हें सरकारी अनुदान मिलता है को शामिल किये जाने से यह एक व्यापक पहुंच वाला कानून बन गया है. सूचना का अधिकार कानून शासन में पारदर्शिता, जबावदेही और सुशासन सुनिश्चित करने के लिये नागरिकों को सूचना हासिल करने का अधिकार देता है.

इससे भारत का प्रजातंत्र और मजबूत बनेगा तथा हमारे जीवन के लिये अधिक प्रासंगिक बनेगा. सूचना के अधिकार संबंधी सभी कानूनों का मूल लक्षण है कि ये लोगों को सार्वजनिक प्राधिकरणों और अन्य सरकारी संस्थानों से सूचना लेने के लिये सशक्त करते हैं.

सूचना का अधिकार अधिनियम खुलापन, पारदर्शिता व जवाबदेही का एक नया युग लानेवाला एक शक्तिशाली यंत्र हैं. यह लोगों को सरकारी/गैरसरकारी संगठनों से जानकारी हासिल करने और उनसे सवाल पूछने में हमें सक्षम बनाता है. जैसा कि हमारे चुने हुये प्रतिनिधि विधानमंडल या संसद सत्र के दौरान करते हैं.

नागरिक सरकार की नीतियों और क्रिया-कलापों, विभिन्न कार्यों पर किये गये खर्चे, उनसे मिलनेवाले लाभ, सुविधाओं, सेवाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी या अनुपलब्धता आदि प्रश्न पूछ सकते हैं. ऐसी कोई भी सूचना जो संसद/राज्य विधानमंडल को नहीं नकारी जाती है.

इस कानून की अधीन हासिल की गयी सूचनाओं को कोई उद्देश्यों के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनमें से एक जमीनी सच्चाईयों का सत्यापन करता है. इस तरह से हासिल की गयी सूचनाएं मुद्दों के विवेचनात्मक विश्लेषण व दबाई हुई सूचनाओं व सच्चाई को उगलवाले में भी हमारी मदद करती है. कहां क्या हो रहा है. ये जानने में भी ये मददगार होती है.

इस तरह ये हमें मिलनेवाली सेवाओं और विभिन्न संगठनों के कागजात की कमियों को जानने व कमी के लिये जिम्मेदार लोगों को पहचानने में भी सहायक सिद्ध होती है.

हम सरकारी एजेंसियों द्वारा हाथ में लिये गये विभिन्न निर्माण कार्यों का भी जायजा ले सकते हैं. तथा कोई कार्य स्वीकृत योजनाओं के अनुसार और निश्चित समयावधि में हो रहा है या नहीं यह खुद देख सकते हैं. हम यह भी देख सकते हैं कि जो साम्रगी इस्तेमाल की जा रही है वह निर्धारित विनिर्देशों के अनुसार है या नहीं, ऐसे मामलों में साम्रगी के नमूने भी लिये जा सकते हैं और प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में उसका विश्लेषण कराया जा सकता है.

समाज द्वारा कराये गये इस तरह के अंकेक्षण को ’’सामाजिक अंकेक्षण’’ की संज्ञा दी गयी है, यदि सामाजिक अंकेक्षण में इस बात की पुष्टि होती है कि गलत कार्य किया गया है तो उनके विरूद्ध आवाज उठायी जा सकती है और दोषी पदाधिकारियों को सजा दिलवाया जा सकता है.

सूचना का अधिकार की मुख्य विशेषताएं है:-

–              सूचना के अधिकार कानून जम्मू काश्मीर राज्य को छोड़कर पूरे भारत देश में लागू है,

–              यह कानून कार्यपालिका, न्यायपालिका च विधायिका तीनों पर समान रूप से लागू है, कोई भी व्यक्ति इनके कार्य व गतिविधियों से संबंधित सूचना मांग सकता है.

–              एक ग्राम पंचायत से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय इसके दायरे में आते हैं तथा इसके अंतर्गत ऐसे गैर सरकारी संगठन आते हैं जो सरकार से अंडर सोसाईटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत हैं और समय-समय पर सरकार से आर्थिक सहायता/अनुदान प्राप्त करते हैं,

–              इसका प्रमुख उद्देश्य सरकारी/गैरसरकारी संस्थाओं के कागजात में खुलापन व पारदर्शिता लाना है,

–              यह नागरिकों को किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण, जिनमें सभी सरकारी/गैरसरकारी संस्थाएं, विभाग, स्थानीय निकाय, उपक्रम, संस्थान, बोर्ड, बैंक, कंपनियों समेत भारत का सर्वोच्च न्यायालय, संसद, राज्य विधानसभाएं आदि शामिल हैं से जानकारी हासिल करने का महत्वपूर्ण अधिकार देता है,

–              सूचना अधिकार की परिभाषा के अंतर्गत नागरिक निर्माण कार्यों, कागजात, अभिलेखों की जांच और नोट्स उद्धरण, कागजात की प्रमाणिक प्रतियां, सामग्री की नमूने और इलेक्ट्रॉनिक रूप से उपलब्ध जानकारियों समेत अन्य जानकारी ले सकते हैं,

–              सूचना की यह परिभाषा नागरिकों के लिये लगभग सभी रिकॉडर्स उपलब्ध करवाने का मार्ग खोल देती है. इसका अर्थ है कि नागरिक सरकारी/गैरसरकारी संस्थाओं के पास उपलब्ध किसी भी रूप में कोई भी सामग्री जैसे रिकॉडर्स, डॉक्यूमेन्टस, ज्ञापन, ई॰मेल, अधिनियम, परामर्श, प्रेस, रिलीज, सरकुलर्स, आदेश, लॉग बुक्स, कन्ट्रैक्टस, रिपोर्ट्स, कागजात, नमूनें, मॉडल, इलेक्ट्रॉनिक रूप से रखे गये डाटा, मटेरियल और निजी संस्थानों से संबंधित जो किसी अन्य कानून के तहत किसी सरकारी/गैरसरकारी अधिकारी के पास हो, कुछ अपवादों को छोड़कर उपलबध कर सकता है,

–              अधिनियम और उसके अधीन अब तक बनाये गये नियमों व केन्दीय/राज्य सूचना आयोग द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण निर्णयों के अनुसार ’’फाईल नोटिग्स’’ को देने से इंकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि वे छूट प्राप्त मदों से संबंधित न हो,

–              इस अधिनियम में कुछ क्षेत्रों में सूचनाएं रोक लेने का भी प्रावधान है, जैसे भारत की सुरक्षा और अखण्डता से संबंधित, संसद/राज्य विधानमंडलो के विशेषाधिकार, विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय या ऐसी सूचना जो किसी व्यक्ति की निजता पर अकारण हमला करती हो, अदालत द्वारा प्रतिबंधित जानकारी, मंत्रीमंडल के कागजात, कॉपीराईट का उल्लंघन आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सूचना रोकी जा सकती है, लेकिन जो सूचना संसद या राज्य विधानमंडल को देने से इंकार नहीं किया जा सकता, किसी सामान्य नागरिक को भी सूचना के अधिकार के तहत सूचना उपलबध कराने का प्रावधान है, किन्तु सूचना रोकने पर जवाबदेही लोक प्राधिकारी के पदाधिकारियों द्वारा सूचना रोक के कारणों को स्पष्ट करना होता है,

–              अनपढ़ तथा गरीब व्यक्ति के लिये यह कानून सामान्य रूप से उसी प्रकार लागू है, अनपढ़ यदि कोई सूचना मांगेगा तो संबंधित लोक प्राधिकारी के सूचना पदाधिकारियों द्वारा मौखिक सूचना उपलबध करवाने का इस कानून में प्रावधान है या फिर उसके द्वारा मांगी गयी सूचना तथा जवाब को लिखित करते हुये उसे पढ़कर सुनाने का भी प्रावधान है, गरीब बी.पी.एल. धारियों के लिये कार्ड दिखाने पर निःशुल्क सूचना उपलब्ध कराने का प्रावधान है,

–              इस कानून के अधिकार अधिनियम को सुचारू रूप से लागू करने के लिये वरिष्ठ अधिकारी केन्दीय/राज्य सूचना अधिकारी के रूप में मनोनित किये गये हैं, जो इस कानून के अधीन मिलनेवाले आवेदनों का निपटारा के लिये जिम्मेदार होंगे और नागरिकों को सूचना उपलब्ध करायेंगे, ऐसे आवेदनों के निपटारे से संबंध अन्य अधिकारी डिम्ड केन्दीय/राज्य सार्वजनिक सूचना अधिकारी होंगे और वे अपने कार्यों/निष्क्रियता के लिये उत्तरदायी होंगे,

–              कोई भी नागरिक पंचायत, तहसील, अनुमंडल, जिला, राज्य तथा देश के किसी भी विभागों से सूचना प्राप्त करना है तो अपना सूचना आवेदन संबंधित केन्द्र/राज्य लोक-जनसूचना पदाधिकारी को या सहायक जनसूचना पदाधिकारी को अपना आवेदन जमा कर सकता है या फिर डाक विभाग से भेज सकता है,

–              सूचना आवेदन और अपील के लिये कागजात जमा करवाने हेतू नागरिकों को दूर तक की यात्रा न करनी पड़े इसके लिये सहायक सूचना अधिकारी का मनोनयन का प्रावधान है जो उपसंभागीय/उपजिला कार्यालय में उपलब्ध होंगे,

–              प्रार्थना-पत्र लिखने और जमा करने में नागरिकों की सहायता की व्यवस्था इस अधिनियम में की गयी है, नहीं होने पर सरकार या शासन के खिलाफ आवाज उठायी जा सकती है,

–              केन्द्रीय/राज्य सूचना अधिकारी आवेदकों से सूचना मांगने का कारण नहीं पूछ सकता है, न ही वे आवेदक की अधिकारिता पर सवाल उठा सकता है,

–              आवेदक द्वारा मांगी गयी सूचना संबंधित लोक सूचना पदाधिकारी के द्वारा 30 से 35 दिनों के अंदर देने का प्रावधान है ऐसा न होने पर आवेदन उसी विभाग के प्रथम अपीलीय प्राधिकार या उससे ऊपर पदाधिकारी के समक्ष अपील दायर कर सकता है, जिन्हें किसी भी हालत में 30 से 40 दिनों में सूचना उपलब्ध करानी है, अस्वीकृति की दशा में विस्तृत ब्योरा के साथ आवेदक को सूचित इस अधिनियम के तहत करना बाध्यकारी है, ऐसा नहीं करने पर आवेदन सीधे राज्य/केन्द्र सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त के पास अपनी द्वितीय अपील या शिकायत दायर कर सकता है,

–              गलत या भ्रामक सूचना देने पर भी अपील करने का प्रावधान है,

–              जीवन और आजादी के मामले से संबंधित सूचना 48 घण्टे के अंदर देना अनिवार्य है,

–              निर्धारित समय-सीमा के अंदर जानकारी देने में विफलता को अस्वीकृति तुल्य मानते हुये आवेदक अपील कर सकता है,

–              इस कानून में प्रत्येक लोक प्राधिकारियों के सूचना अधिकारियों द्वारा अपने-अपने कार्य व गतिविधियों की जानकारी बिना मांगे सार्वजनिक करना जरूरी है, समाचार-पत्र, वेबसाइट या जिस रीति से प्रकाशन हो,

–              केन्द्रीय सरकार द्वारा स्थापित कुछ गुप्तचर व सुरक्षा संगठनों को अधिनियम के प्रावधानों से मुक्त रखा गया है, फिर भी उनके अपने मामलों में भ्रष्टाचार व मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से संबंधित जानकारी छूट के दायरे में नहीं है, मांगने पर ऐसी जानकारी केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोगों की स्वीकृति के साथ 45 दिनों के अंदर दी जाती है,

–              सूचना का अधिकार अधिनियम तीसरे पक्ष द्वारा उपलब्ध करायी गयी जानकारी की रक्षा करता है, यदि तीसरे पक्ष द्वारा सरकारी एजेंसी/विभाग को दी गयी जानकारी उनके द्वारा गोपनीय बतायी जाती है तो ऐसी जानकारी सक्षम पदाधिकारी या सूचना आयोग की अनुशंसा के बाद दी जाती है,

–              सूचना नहीं मिलने पर प्रथम विभागीय अपील का प्रावधान है, कोई व्यक्ति को सूचना नहीं मिलने पर सीधे सूचना आयोग नहीं जा सकता,

–              प्रथम विभागीय अपील के सूचना आने का इंतजार करने के बाद या गलत भ्रामक सूचना आने पर उस विभाग के विरूद्ध केन्द्रीय/राज्य सूचना आयोग में अपील/शिकायत दायर कर दोषी पदाधिकारियों के विरूद्ध अर्थदण्ड अधिरोपित करने, अपने द्वारा हुई हानि या नुकसान की भरपाई करवाने तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिये आयोग से मांग की जा सकती है,

–              सूचना कानून को सुदृढ़ व न्याय दिलाने के लिये सभी राज्य सरकार द्वारा राज्य सूचना आयोग तथा एक केन्द्रीय सूचना आयोग गठन किया जा चुका है,

–              प्रत्येक सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा 10 सूचना आयुक्त रहते हैं, जिनका दर्जा भारत में मुख्य निर्वाचन आयुक्त या राज्य निर्वाचन आयुक्त के बराबर तथा सूचना आयुक्त मुख्य सचिव के बराबर होता है,

–              सूचना आयोग में मामला जाने पर स्वयं या किसी प्रतिनिधि के माध्यम से आयोग में उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकते हैं, वकील की कोई जरूरत नहीं है,

–              नागरिकों द्वारा दाखिल की गयी शिकायतों/अपीलों आदि की सुनवाई के लिये राज्य/केन्द्र सूचना आयोग की गठन हुई है और उनके पास विस्तृत शक्तियां है:-

                                             –              प्रतिवादी पदाधिकारियों को बुलाना, नोटिस करना,

                                             –              आयोग में उपस्थित करवाना,

                                             –              स्पष्टीकरण लेना,

                                             –              लिखित साक्ष्य लेना,

                                             –              कागजातों/अभिलेखों की छानबीन करना,

–              कार्यालय की जांच करना तथा कार्यालय में रखी गयी फाईल/रिकॉडर्स को सुदृढ़ करने का आदेश देना, नोटिस-बोर्ड लगाने का आदेश देना, सूचना अधिकारियों की नियुक्ति का आदेश देना,

–              शपथ-पत्र लेना,

–              किसी भी न्यायालय/कार्यालय से अभिलेख मंगाकर जांच करना,

–              अपीलकर्ता या शिकायतकर्ता को हर्जाना दिलवाना,

–              सूचना रोकनेवाले दोषी पदाधिकारियों को अर्थदण्ड लगाना,

–              सूचना रोकनेवाले या गलत भ्रामक सूचना देनेवाले उन दोषी पदाधिकारियों पर सेवा नियम के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा करना,

–              अपीलकर्ता को स्वच्छ व विधिवत सूचना उपलब्ध करवाना,

–              सूचना कानून व भारतीय संविधान के मान-मर्यादाओं की रक्षा करना आदि.

सूचना का अधिकार का सरकार द्वारा किसी तरह का कोई प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है जिसके कारण कुछ खास लोगों द्वारा ही सूचना का अधिकार का प्रयोग किया जा रहा है और देश के ग्रामीण क्षत्रों की जनता विशेषकर इस सूचना का अधिकार से मुखातिब नहीं हो पा रहे हैं.

ट्रॉसपेन्सी इंटरनेशन इंडिया के एक सर्वे के अनुसार, देश की 0.1 प्रतिशत जनता इस सूचना का अधिकार का प्रयोग कर रही है वहीं कॉमनवेल्क ह्यूमन राईटस् के एक अध्ययन के अनुसार रोजाना अड़तालीस सौ लोग सूचना का अधिकार के तहत जानकारियाँ मांग रहे हैं.

हालांकी देश के भ्रष्ट अधिकारियों एवं सरकारी महकमें द्वारा सूचनाधिकार को पंगू बनाने की कोशिशें भी जारी है. जो हो, अन्य कानूनों के अंदर इस अधिनियम के प्रावधानों को प्राथमिकता देने से यह और भी शक्तिशाली बन गया है, इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो सूचना राज्य विधानमंडल/संसद को दी जा सकती है वह सूचना किसी सामान्य नागरिक की मांग पर भी दी जा सकती है, यहां यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सूचना का अधिकार भारत के प्रत्येक नागरिकों को विधानसभा/लोकसभा के समतुल्य बना दिया है. जरूरत है सरकार जनता के हित में इस सूचना का अधिकार का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार करें. सूचना आयोगों में रिक्त पड़े सूचनायुक्तों एवं मुख्य सूचनायुक्तों की बहाली करें.

अतः सूचना का अधिकार लागू होने से भ्रष्टाचार का खात्मा धीरे-धीरे छिन तो जरूर होगा बशर्ते सूचना के अधिकार के तहत आनेवाले प्रत्येक लोक प्राधिकारी के पदाधिकारियों के दिलों-दिमाग में सूचना उपलब्ध करवाने की मनसा सही हो, सूचना अधिकारियों/प्रथम अपीलीय प्राधिकार के द्वारा नागरिकों के मांग पर ससमय और सही तथा स्पष्ट सूचना उपलब्ध करवायी जानी चाहिये.

भारत में इस नया कानून के लागू होने पर बहुत से सरकारी/गैरसरकारी संस्थान के सूचना अधिकारियों द्वारा सूचना रोकने तथा छिपाने का प्रयास किया जा रहा है वो इसलिये कि हो सके मामला छानबीन के दायरे में न पहुंच जाये, परन्तु सूचना रोकना भी अपराध व भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना है, ऐसे कई मामले में केन्द्र/राज्य सूचना आयोग ने दोषी जन/लोक सूचना पदाधिकारियों को दण्डित किया है तथा कितने ही कर्तव्यहीन व लापरवाह सूचना पदाधिकारी सूचना आयोग की अनुशंसा पर पदच्यूत तथा निलंबित भी हुये है.

बहरहाल, पिछले 14 वर्षों में सूचना का अधिकार नागरिकों के लिये खर्रा तथा अफसरों के लिये जवाबदारी एवं सरकार के लिये गले की हड्डी बन गई है. अतः उम्मीद की जाती है कि सरकार से जानकारियाँ लेने के नागरिकों के अधिकार से उन बुराईयों को दूर करने में मदद मिलेगी जो हमारे समाज को अभी भी जकड़े हुये हैं.

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