कोरोना संकट के बीच देश छोड़कर विदेश में बसने की तैयारी में बड़े उद्योगपति और अमीर

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New Delhi: देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के दौरान पैदा हुए हालात ने देश में रह रहे अमीरों को डरा दिया है. वर्तमान में देश के भीतर स्वास्थ्य सेवाओं के संकट के बीच कई सारे उद्योगपति और अमीर लोग परिवार समेत दूसरे देशों में बसने की योजना बना रहे हैं. यही वजह है कि जब देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के चलते पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ है अच्छी स्वास्थ्य सुविधा वाले देशों में बसने को लेकर बड़ी संख्या में भारतीयों ने पूछताछ की है.

विशेषज्ञों का कहना है कि 2020 में जब पहली बार कोरोना वायरस महामारी सामने आई थी तो बहुत सारे भारतीय मूल के लोग जो विदेशों में रह रहे थे उन्होंने भारत लौटने की इच्छा जताई थी क्योंकि उस समय यूरोप और अमेरिका बुरी तरह से वायरस की चपेट में आए थे.

लेकिन इस बार बहुत सारे लोग जो भारत में रह रहे हैं वे बाहर बसने की योजना बना रहा हैं. इसके पीछे अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा सबसे प्रमुख कारण है.

कौन से देश हैं टॉप पसंद?

ये अमीर भारतीय जिन देशों में बसना चाह रहे हैं उनमें ब्रिटेन, कनाडा, पुर्तगाल, साइप्रस, माल्टा, आस्ट्रेलिया और अमेरिका पहली पसंद के देशों में हैं. ये अमीर लोग इन देशों में बिजनेस सेटअप करने या फिर निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं. खास बात यह है कि इनमें से अधिकांश प्रमुख रूप से अंग्रेजी भाषी देश हैं. लेकिन बहुत सारे भारतीय ऐसे भी हैं जिन्होंने इसके अलावा स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, पोलैण्ड, डेनमार्क और स्वीडन जैसे दूसरे देशों में भी बसने के लिए जानकारी मांगी है.

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अभी तक बसने के लिए ब्रिटेन भारतीयों की पहली पसंद बना हुआ है. दूसरे देशों में बसने में मदद करने वाली एजेंसियों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटेन भारत जैसे देशों से निवेशकों और कुशल प्रोफेशनल्स के लिए कई सारे अवसर मुहैया करा रहा है. एक और प्रमुख वजह यह है कि ब्रिटेन में निवेशकों और वर्क वीजा पर पहुंचने वाले लोगों और उनके परिवारों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच दी जा रही है.

आप्रवासन से जुड़ी एजेंसियों के मुताबिक इस समय उनके पास विदेशों में बसने के लिए पहले के मुकाबले 40% ज्यादा पूछताछ की गई है.

शायद आपको ये जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर में अपनी मातृभूमि से बाहर जाकर बसने वालों में सबसे ज्यादा भारतीय ही हैं. संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों विभाग के जनसंख्या प्रभाग की ‘इंटरनेशनल माइग्रेशन 2020 हाइलाइट्स’ रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में सबसे बड़ी प्रवासी आबादी भारतीयों की है. 2020 में देश के 1.8 करोड़ भारतीय मूल के लोग अपनी मातृभूमि से बाहर रह रहे थे.

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भारत का विशाल प्रवासी परिवार का एक बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात (35 लाख), अमेरिका (27 लाख) और सऊदी अरब (25 लाख) में रहता है। रिपोर्ट के मुताबिक इसके बाद बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कुवैत, ओमान, कतर और ब्रिटेन शामिल हैं.

लंबे समय के लिए योजना बना रहे युवा

विदेशों में बसने के पीछे एक वजह और भी है कि अमीर भारतीयों की नई पीढ़ी मौजूदा कारोबार से हटकर कुछ अलग करना चाहती है. खासतौर पर ऐसे लोग जो मध्यम स्तर के व्यापार से जुड़े हुए हैं.

कई देश व्यवसाय के लिए उत्कृष्ट बुनियादी ढांचे की पेशकश कर रहे हैं और बिजनेस परिवारों की नई पीढ़ी इनका इस्तेमाल करना चाहती हैं.

ऊंची आय वर्ग वाले ये लोग या इनका परिवार की पसंद संपत्ति में निवेश, लंबी अवधि के वीजा के माध्यम से स्थायी निवास या नागरिकता हासिल करना होता है. इन देशों के चयन के पीछे उत्तराधिकार के नियमों, कंपनी या फिर व्यापार के अंतरराष्ट्रीय विस्तार, आसान टैक्स सिस्टम कई बातों का ध्यान रखा जाता है. इसके साथ ही अच्छा जीवन स्तर, जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य प्रमुख रूप से शामिल हैं, बसने की वजह में शामिल होता है.

ब्रिटेन क्यों बन रहा है पसंद?

भारतीयों का ब्रिटेन से रिश्ता ऐतिहासिक रहा है. भारतीय नागरिक और परिवारों के लिए अपने श्रम बाजार और शिक्षा क्षेत्र तक पहुंच के कारण ब्रिटेन पसंदीदा जगह रही है. ब्रेग्जिट से अलग होने के बाद ब्रिटेन भारत के साथ व्यापार बढ़ाने की संभावना तलाश रहा है.

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आप्रवासन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिटेन में बसने की इच्छा के पीछे यहां पर लोगों की अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच है. पहले यह मुद्दा उतना बड़ा नहीं था लेकिन कोविड-19 महामारी के दौर में भारत के स्वास्थ्य सेवाओं के संकट ने इस बारे में सोचने को मजबूर किया है. चूंकि ब्रिटेन में निवेशकों और कुशल कामगारों के वीजा पर एंट्री पाने वालों को भी स्वास्थ्य तक पहुंच हासिल है ऐसे में ब्रिटेन भारतीयों के लिए शीर्ष पसंद बन गया है.

ब्रिटेन के लिए भी अच्छी स्थिति है. उनके बहुराष्ट्रीय ग्राहक स्वास्थ्य सेवा, आईटी और इंजीनियरिंग सेवाओं में भारतीय नागरिकों पर बहुत अधिक निर्भर हैं और कुशल कामगार वीजा के नियमों में ढील के साथ भारत से भर्ती करना आसान हो गया है. ऐसे में इनमें एक बार फिर से वृद्धि देखी जा सकती है.

इन सबके बीच आज भी भारतीय सबसे ज्यादा शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं. ऐसा माना जा रहा है कि एक बार जब लॉकडाउन हटेगा और आवाजाही खुलेगी तब एक बार फिर से पढ़ाई के लिए विदेश जाने के लिए पूछताछ के मामलों में वृद्धि होगी और हम देखेंगे कि और ज्यादा लोग और ज्यादा लोग विदेश जा रहे हैं.

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