झारखंड आंदोलनकारियों का सम्मान के बिना अबुआ राज अधूरा

Pushkar Mahto

झारखंड (Jharkhand History) अत्यंत ही गौरवशाली इतिहास का स्वर्णिम खंड है इसके मिट्टी में कंगन शोषण विहीन समतामूलक समाज की स्थापना का संदेश भरा है. कला-संस्कृति अनमोल सामूहिकता का धरोहर है. जल, जंगल, जमीन- सुखदा, समृद्धि व शांति का अमूल्य प्रतिक है.

झारखंड के गौरवशाली इतिहास सामूहिक ताकि धरोहर को शांति के प्रतीक को मिटाने के लिए बाधाएं उत्पन्न किए दिखाने अर्थात बाहरी ताकतों ने व्यक्त किया झारखंड जाने अपनी पहचान वह अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष होम उलगुलान किया अपने परंपरागत हथियारों तीर धनुष, कुल्हाड़ी, हसुआ लेकर लाखों लोग बंदूकों व तोपों का सामना किया, वीरगति को प्राप्त हुए. लेकिन, अपने आत्मसम्मान के साथ कोई गलत या अप्राकृतिक समझौता नहीं किया. फलाफल आजादी से पूर्व व आजादी के बाद भी झारखंडी ताकतें अनेकानेक कुर्बानियां देकर अपने झारखंड को भारत के नक्शे पर स्थापित कर अपने स्वाभिमान का परिचय दिया.

वर्तमान परिपेक्ष में झारखंड अलग राज्य को स्थापित करने वाले स्वाभिमानी झारखंड आंदोलनकारी हाशिए पर है. अलग राज्य के सपने कोरे हैं. भाषा व संस्कृति दम तोड़ती दिख रही है. वह उसे बांटने का साजिश व षड्यंत्र किया जा रहा है. जबकि भाषा-संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन की दिशा में नीतिगत रूप से ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है. पलायन आज भी बदस्तूर जारी है, जिसके कारण हमारे पवित्र अखाड़ों में घास उग जा रहे हैं. सामाजिक व्यवस्था खंडित हो रहे हैं. खान खजनी में आम झारखंड का मौलिक लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है.

अलग राज्य के राजनीतिक मुद्दे वहीं के वहीं हैं व्यापक मंथन होना चाहिए शिक्षक बहाली पुलिस बहाली स्थानीय स्तर पर नहीं होने से झारखंड का गुणवत्तापूर्ण व समता मूलक समाज आधारित विकास नहीं हो पा रहा है बीडीओ, सी ओ, शिक्षक, पुलिस के पदों वगैरह मे बाहरी ताकतों का कब्जा होता जा रहा है.

तृतीय एवं चतुर्थ वर्गीय पदों पर भी आम झारखंडी को उनके मौलिक व संविधानिक अधिकारों से षड्यंत्र के तहत वंचित किया जा रहा है. सचिवालय में गैर झारखंडी पदाधिकारियों का अब भी दबदबा होना एक गंभीर सवाल झारखंडी समाज के अंतिम वर्ग का है.

झारखंड में मूल्य आधारित राजनीति करने की नितांत आवश्यकता है जल जंगल जमीन से एसटी एससी ओबीसी को किसी भी कीमत पर बेदखल ना होने दें. अन्यथा, झारखंड की पहचान आन-बान-शान व स्वाभिमान मिट जाएगा. भाषा संस्कृति वह पहचान मिट जाएगी. हमारे अस्तित्व समाप्त हो जाएंगे. हाशिए पर जीने के लिए लोग मजबूर हो जाएंगे.

विडंबना है कि आज भी जमीन का मालिक मालिक झारखंडी एसटी, एससी, ओबीसी भीख मांगने मांगते हुए दिखाई देने लगे हैं. समाज टूटने बाद बिखरने लगा है. राजनीतिक पकड़ की वह ताकत कमजोर पड़ने लगी हैं. सीटें आरक्षित ना हो तो हम मुश्किल से ही कुछ ही सीटें निकाल पाएंगे और अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाते रहेंगे.

इस मिट्टी के कर्ज को चुकाने के लिए निम्नलिखित मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए –

झारखंड आंदोलनकारियों को मान-सम्मान दिलाना ही होगा.

रोजी-रोटी-रोजगार में स्थानीय मूल्य के झारखंडियों को चिन्हित कर के तमाम नौकरियों-चाकरिओ व ठेका- पट्टा में स्थापित करना ही चाहिए.

खान-खनिज में झारखंडियों को समता जजमेंट के तहत लाभ देना ही चाहिए.

वनोपज का लाभ मिलना ही चाहिए.

हर खेत में सिंचाई की सुविधाएं सुलभ होनी चाहिए.

जल स्रोतों का संरक्षण व संवर्द्धन आवश्यक है.

सीएनटी-एसपीटी एक्ट का पालन व्यापक स्तर पर झारखंडी हितार्थ अक्षरशः पालन होना चाहिए. बदलाव थाना के स्थान पर जिला हो सकता है.

झारखंड के पर्यटक स्थलों का विकास नीतिगत तरीके से होना चाहिए.

मानव संसाधन को कुशल व हुनरमंद बनाना ही होगा. तकनीकी रूप से बौद्धिक रूप से हमें अपने युवा शक्ति को क्षमतावान बनाना होगा.

झारखंड आंदोलनकारियों को समान रूप से मान-सम्मान व पहचान देते हुए जेल जाने की बाध्यता को समाप्त करना होगा.

झारखंड आंदोलनकारियों के आश्रितों को नौकरी में प्राथमिकता देना होगा.

भाषा-संस्कृति-साहित्य के रचनाकारों के पांडुलिपियों के प्रकाशन की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए.

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