Take a fresh look at your lifestyle.

रांची लोकसभा चुनाव 2019: सुबोध कांत सहाय को फिर गच्चा दिया गांधी परिवार, संजय सेठ के लिए इंतहां बाकी

0 9

Pushkar Mahto

Ranchi: भाजपा-आजसू पार्टी गठबंधन के प्रत्याषी संजय सेठ के लिए रांची लोकसभा के लिए बढ़त बनाना लोहे का चना चबाने के बराबर है. इस लोकसभा सीट पर संजय सेठ आजसू पार्टी से मिलकर मेहनत तो कर ही रहे हैं. साथ ही हिन्दू नामधारी संगठनें भी पूरी सक्रियता के साथ ग्रासरुट में जा-जाकर काम रहे हैं. महिलाएं भी दमखम से जुटी हुई है. हर स्तर पर मैदान-ए-जंग के लिए जमीन तैयार किया जा रहा है. इसके बावजूद संजय सेठ के लिए बातौर प्रत्याषी कांटों से भरा पग है.

इस रास्‍ते पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय अपनी पैनी नजर जमाये बैठे है. साल 2014 में श्री सहाय कांग्रेस के आलाकमान के उपेक्षा का शिकार हुए थे. उनकी दुआ व सलाम का जवाब कांग्रेस हाईकमान तक नहीं दिया था. नजरें फेर लिये थे. इसबार ऐसी कोई बात नहीं है. लेकिन, रांची लोकसभा का चुनाव की तिथि 6 मई तय हैं.

ऐसे में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी हो या फिर पूर्व अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी व महासचिव प्रियंका गांधी का अब तक नहीं आना इशारों ही इशारों में कई बातों की ओर संकेत दे रहे है. लोगों के जुबां पर चढ़ने लगा है कि क्या इस बार भी सुबोध कांत सहाय कांग्रेस हाई कमान की उपेक्षा का शिकार होगें.

गांधी परिवार यानी श्रीमती सोनिया गांधी,राहुल गांधी या फिर प्रियंका गांधी श्री सहाय के समर्थन में खुलकर अभी तक नहीं आये. इनका नहीं आना सुबोध कांत सहाय की मुसीबतें घटने के बजाय बढ़ सकती है.

आज सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति राजनीति गेम प्लान का खेल बनाने व बिगाड़ने में महारत रखता हैं, यू कहें कि लोग मास्टर मांइड बनकर घूम रहें हैं. सामाजिक व राजनीतिक अंकेक्षण कर रहे हैं. सड़क से लेकर संसद तक,बार्डर से लेकर गांव-गांव तक नजरें सबकी चौकनी हैं.

सुबोध कांत सहाय पूर्व में हुए हाईकमान की उपेक्षा का दंष झेल चुके हैं. इसकी पुर्नावृति हुई तो उनकी राजनीतिक करियर का ग्राफ काफी नीचे चला जाएगा. वैसे श्री सहाय अपनी ओर से हर संभव जीत की कोशिस में लगे हैं. छोटी-बड़ी बातों पर ध्यान देते रहे हैं. दोस्त और दुष्मन को सामन रुप से पाटने की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है.

वहीं, संजय सेठ पर हाईकमान से लेकर ग्रासरुट तक प्रत्येक स्थिति व परिस्थिति सबकी नजरें टकी है. राजधानी जीतने की. केन्द्र में एक बार फिर सरकार बनाने की. इस खेल में किसकी जीत या हार होती है वक्त ही बताएगा.

(लेखक पत्रकार हैं और उनके ये अपने विचार)

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.