खुशी का पैगाम और दर्दनाम दोनों को महत्व देते हैं डाक कर्मचारी

by
Dr Om Prakash

बदलते परिवेश में भी डाक व डाक विभाग के कर्मचारीयों का महत्व और भी बढ़ता गया है. जहां हम अपनी भावनाओं,संवेदनाओं को समझते- समझाते थक हार जाते हैं, वही अपने हाथों से लिखा हुआ चिट्ठी जिसमें सिर्फ और सिर्फ सकारात्मक भावनाएं होती हैं और जब वह डाक विभाग के कर्मचारियों के माध्यम से आपके पास पहुंचता है तो सुकून देता है.

सन 1766 में लॉर्ड क्लाइव द्वारा पहली डाक व्यवस्था की स्थापना और फिर 1854 में डाक विभाग की स्थापना का होना संपूर्ण मानव जीवन के लिए एक वरदान साबित हुआ.

वर्तमान समय में तो ईमेल, फेसबुक व्हाट्सएप, टि्वटर, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम इत्यादि माध्यम, आधुनिक तकनीक जिससे हम तुरंत जुड़ते हैं और तुरंत टूटते भी हैं. क्षणे रूष्टा, क्षणे तुष्टा, रूष्टा तुष्टा क्षणें-क्षणें.  लेकिन आज भी कहा जाता है और आवश्यकता भी है, ई-मेल ऊ-मेल से नहीं ताल-मेल से जीने की.

Read Also  शिव संगीत में ताण्‍डव तो कल्‍याण के लिए नीलकंठ का सावन में महत्‍व

1 जुलाई 1977 से डाक विभाग में जुड़े कर्मचारियों को सम्मान देने के लिए राष्ट्रीय डाक कर्मचारी दिवस के रुप में मनाया जाना व सम्मानित करना श्रेयस्कर है.

सन 1977 में ही निर्मित फिल्म ‘पलकों की छांव’ का वह गीत याद कीजिए,

डाकिया डाक लाया, डाक लाया, खुशी का पैगाम कहीं, कहीं दर्दनाम लाया…

कोविड-19 के समय तो पूरा देश डाकिया की भूमिका में आ गया पूरा तंत्र मानो डाक विभाग के कर्मचारियों की तरह काम करने लगा और अभी भी कर रहा है. चाहे वह चिकित्सा विभाग हो, शिक्षा विभाग हो, पुलिसिया तंत्र हो, चाहे गैर सरकारी महकमा हो या सरकारी महकमा सब दवा से लेकर दुआ तक पहुंचा रहे हैं. जन्म से लेकर मृत्यु तक के लिए पूरी व्यवस्था पहुंचा रहे हैं. इन सब में डाक कर्मचारी भी पूर्ण समर्पण भाव से चलते रहे, रुके नहीं चाहे कैसी भी परिस्थिति हो.

Read Also  शिव संगीत में ताण्‍डव तो कल्‍याण के लिए नीलकंठ का सावन में महत्‍व

तो आईये! हम सभी जरूरी चीजों को डाक के माध्यम से भेजते हैं डाकियो  को बख्शीश देने की परंपरा में ही डाक कर्मचारियों का पता लेकर उन्हें भी धन्यवाद पत्र लिखेंगे तो एक छोटा सा पहल उनके जीवन में नई ऊर्जा का संचार करेगा.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.