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कांग्रेस की वापसी में NOTA ने निभाई बड़ी भूमिका

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पांच राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करने पर एक बात शिद्दत से उभरकर आती है कि जनता का जनप्रतिनिधियों से मोहभंग बढ़ा है. मिजोरम को छोड़ दें तो राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में नोटा में मिले वोटों का प्रतिशत उन राजनीतिक दलों से ज्यादा रहा जो ईरान-तुरान की बातें करके राष्ट्रीय राजनीति में धमाचौकड़ी मचाये रहते हैं.

इतना ही नहीं, राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार को हराने का दम भरने वाली कांग्रेस की जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा को पड़े हैं. जाहिर है नोटा का इस्तेमाल करने वाले मतदाताओं का किसी भी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं है कि वे जीतकर कुछ बदलाव ला सकते हैं. कह सकते हैं कि राजस्थान समेत कई राज्यों में कांग्रेस की वापसी में नोटा ने बड़ी भूमिका निभाई है. राजस्थान का उदाहरण लें तो सरकार बनाने वाली कांग्रेस को 39.3 फीसदी वोट मिले, जबकि हारने वाली भाजपा को 38.8 फीसदी वोट.

यानी जीत का अंतर 0.5 फीसदी है. जबकि राजस्थान में नोटा के तहत 1.3 फीसदी वोट पड़े. यानी जहां कांग्रेस को भाजपा से 1.7 लाख वोट ज्यादा मिले, वहीं नोटा के तहत पड़े वोटों का हिस्सा साढ़े चार लाख से अधिक रहा. अन्य राज्यों में भी कमोबेश स्थिति ऐसी ही है.

जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है तो वहां नोटा के तहत पडऩे वाले वोटों का प्रतिशत सबसे ज्यादा 2.1 फीसदी रहा. इतना ही नहीं, नोटा ने कई चर्चित राजनीतिक दलों को उनकी हैसियत भी बता दी. छत्तीसगढ़ के चुनाव में ताल ठोककर कूदी आम आदमी पार्टी को 0.9 फीसदी, समाजवादी पार्टी व राकांपा को 0.2 फीसदी तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 0.3 फीसदी ही वोट मिले. इन सबसे ज्यादा दो फीसदी से अधिक वोट नोटा को डाले गये. मध्य प्रदेश में 1.5 फीसदी वोट नोटा के तहत पड़े. यहां दस सीटों में हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट नोटा के तहत डाले गये जो इन निर्वाचित प्रतिनिधियों के निर्वाचन पर सवाल खड़े करते हैं. यहां सपा को एक फीसदी व आम आदमी पार्टी को 0.7 फीसदी वोट ही मिल सके.

वहीं तेलंगाना में भी भाकपा व माकपा को 0.4 फीसदी व राकांपा को महज 0.2 फीसदी वोट मिले जबकि नोटा को डेढ़ फीसदी वोट मिले. मिजोरम में जरूर जागरूकता के अभाव में महज 0.5 फीसदी वोट ही नोटा के तहत डाले गये. दरअसल, वर्ष 2013 में सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद नोटा का बटन ईवीएम में आखिरी विकल्प के रूप में जोड़ा गया था. गुजरात विधानसभा में इसका प्रयोग पहली बार हुआ था. मतदाता कोई योग्य उम्मीदवार न पाने की स्थिति में इस बटन का प्रयोग करता है.

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