नहीं रहे बीके चांद, कई यादें, अनुभव, सीख और समझ छोड़ गए

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सुदेश कुमार महतो

क्षेत्र में कई जगह पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक और चर्चा के बाद देर से आवास लौटा था. बुधवार अहले सुबह खबर मिली कि बीके चांद साहब नहीं रहे. सहसा विश्वास नहीं हो रहा था. फिर आंखों में नींद नहीं आई. बोझिल कदमों से मुक्ति धाम पहुंचा था. मन घबराया हुआ था. उनका नमन किया. खुद से पूछा- हमारे चांद साहब अब लौट कर आएंगे क्या, पार्टी को उनकी जरूरत जो ठहरी.

इससे पहले सुबह में बुद्धिजीवी मंच के पदाधिकारियों और पार्टी के कई नेताओं का फोन आता रहा. कुछ ही दिनों पहले हमारी स्वराज स्वाभिमान यात्रा को लेकर उन्होंने चर्चा की थी. इसके साथ ही कई विषयों पर वे ध्यान दिला रहे थे “तब मैंने कहा भी था कि पहले आप जल्दी स्वस्थ जाएं. साथ बैठकर खाका खींचते हैं. हालांकि इसका अंदेशा नहीं था कि चांद साहब हमलोग के बीच से दूर चले जाएंगे. और हमेशा के लिए. मृत्यु शाश्वत सत्य है, लेकिन उनके निधन से आजसू पार्टी ने एक नजदीकी और सच्चा अभिवावक खो दिया है” .

नब्बे के दशक में अलग राज्य आंदोलन जोरों पर था. एकीकृत बिहार में झारखंड स्वायत परिषद का गठन हुआ. तब ये जानने- सुनने का मौका मिला कि एक सुलझे प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर बीके चांद जी इस परिषद में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे है. बाद में भी वे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे.

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AJSU Party

नौकरी से रियाटर करने के बाद वे सार्वजनिक जीवन में आए और इसके लिए उन्होंने आजसू पार्टी को चुना. आजसू पार्टी में उनके सामिल होने की इच्छा पर मैंने कहा था कि आप जैसे लोगों की झारखंड को जरूरत है.

सालों से वे पार्टी में बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्क्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. और इस दौरान पार्टी को अपने विचारों तथा अनुभवों से उन्होंने दिशा देने की कोशिशें की. उनमें झारखंडी विषयों और जनमानस की बारीक समझ थी.

साथ ही संगठन के कार्यक्रमों को लेकर रूपरेखा तय करने में भी अहम भूमिका निभाते थे. पार्टी के संकल्प पत्र तैयार करने के साथ सरकारी कामकाज से जुड़े विषयों पर भी उनकी प्रतिक्रिया और रायशुमारी पार्टी के लिए मायने रखता था.

बाद में बुद्धिजीवी मंच में कई रिटायर अधिकारी, शिक्षक और प्रबुद्ध लोग जुड़ते गए. इस मंच की किसी बैठक या विमर्श करने के मौके मुझे भी अनुभव देते रहे. क्योंकि हम उनकी बातों को सुनने में विश्वास रखता रहा. चुनावों में हार- जीत और पार्टी में उतार- चढ़ाव जैसे मामलों में वे तार्किक ढंग से बातें करते और इन बातों पर जोर देते कि बहुत कुछ साथ रहने- चलने के बाद भी जिंदगी में कुछ मौके आते हैं जब विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है.

कई मौके पर बुद्धिजीवी मंच के पदाधिकारियों के बीच किसी विषय पर बहस छिड़ जाने पर चांद साहब सहजता से कहते कि अब केंद्रीय अध्यक्ष का विचार ले लिया जाए, तो अच्छा होगा.

सरज, सरल कुशल व्यवहार और अनुसासन के धनी बीके चांद को पार्टी में चांद सर के नाम सी ही जाना जाता रहा. उनसे जितना बना उन्होंने आजसू पार्टी को दिया.

इस दुख की घड़ी में ईश्वर से हम उनकी आत्मा को शांति देने तथा परिवार के लोगों को दुख सहने की ताकत देने की कामना करते हैं. इसके साथ ही वादा भी कि चांद साहब के शोक संतप्त परिवार के साथ पार्टी हर मौके पर खड़ी रहेगी.

(लेखक आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री हैं)

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