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शहीद निर्मल महतो की जीवनी (Nirmal Mahto Biography in Hindi)

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Arun banuar

शहीद निर्मल महतो की जीवनी (Nirmal Mahto Biography in Hindi): निर्मल महतो एक अच्छे संगठन कर्ता थे. उनमें अनंत आत्मविश्वास था. वे किसी भी गलत आचरण के खिलाफ आवाज़ उठाने से डरते नहीं थे. वे आजीवन गरीबों के लिए लड़े, गरीब किसानों और मजदूरों के लिए लड़े, झारखंडियों का आत्मविश्वास और आत्मसम्मान प्रदान करने के लिए आखिरी दम तक लड़े. वे शहीद हुए, मगर अपने जीवन में ना कभी प्रलोभित हुए और ना ही किसी तरह का कोई समझौता किया. शोषित, पीड़ितों एवं ग़रीबों के साथी निर्मल महतो का एक ही सपना था, कि अपना अलग झारखण्ड प्रान्त हो, ताकि झारखण्ड क्षेत्र में रहने वाले लोगों को शोषण, उत्पीड़न, अत्याचार और भ्रष्‍टाचार से मुक्ति दिलाई जा सके. ये उनके अथक प्रयास का ही परिणाम था कि 15 नवंबर 2000 को झारखण्ड अलग राज्य बना.

शहीद निर्मल महतो की जीवनी (Nirmal Mahto Biography in Hindi)

झारखण्ड अलग राज्य के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले और अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान देने वाले झारखण्ड के सच्चे और वीर सपूत निर्मल महतो का जन्म(तत्कालीन बिहार) के पूर्वी सिंहभूम जिलान्तर्गत उलियान नामक गांव में 25 दिसंबर 1950 को हुआ था. इनके पिता का नाम श्री जगबंधु महतो और माता का नाम श्रीमती प्रिया महतो था. जगबंधु महतो के आठ पुत्र और एक पुत्री में निर्मल महतो द्वितीय पुत्र थे.

निर्मल महतो की शिक्षा (Nirmal Mahto Education)

निर्मल महतो ने जमशेदपुर टाटा वर्कर्स यूनियन हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की थी. उन्‍होंने जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की थी. निर्मल महतो बहुत तीक्ष्ण बुद्धि के थे.  वह अपनी पढ़ाई तो करते ही थे, साथ ही साथ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे और घर की आमदनी में योगदान देते थे. उनकी रूचि खेल-कूद और रंगोली बनाने में भी थी.

सदा हंसमुख चेहरा वाले कर्मठ निर्मल, कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी नहीं घबराते थे. शांति पूर्वक तत्काल निर्णय लेना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी. उनमें कुछ कर गुजरने की ललक हमेशा रहती थी.

छात्र जीवन से राजीतिक जीवन का सफर

निर्मल महतो छात्र जीवन से ही राजनीति में रूचि लेने लगे थे. उनमे बचपन से नेतृत्वकारी गुण थे. 1975 में कुछ असामाजिक तत्वों से उन्हें मुठभेड़ भी करनी पड़ी और अपनी पढ़ाई उन्हें अधूरी ही छोड़ देनी पड़ी. इसके बाद छात्र आंदोलन का नेतृत्व करते हुए वे झारखण्ड आंदोलन में कूद पड़े.

अपना राजनीतिक जीवन उन्होंने झारखण्ड पार्टी से शुरू किया और एक जुझारू नेता के रूप में अपने आप को स्थापित किया. झारखण्ड पार्टी में सन् 1980 तक रहते हुए वे लगातार गरीब लोगों के लिए काम करते रहे. वे 1980 के बिहार विधान सभा के चुनाव में लड़े, लेकिन विजयी नहीं हुए.

आगे चलकर झारखण्ड पार्टी में आयी हुई पतनशीलता को देखते हुए एवं शैलेन्द्र महतो की प्रेरणा से वे 15 दिसंबर 1980 को झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में विधिवत रूप से शामिल हो गए. 18 जुलाई 1981 को जमशेदपुर  में झामुमो का जिला सम्मलेन आयोजित किया गया, जिसमें निर्मल महतो को मोर्चा का जिला उपाध्यक्ष निर्वाचित किया गया.

झामुमो के अध्‍यक्ष बने

1 और 2 जनवरी 1983 को धनबाद में झामुमो का प्रथम केन्द्रीय महाधिवेशन हुआ और निर्मल महतो को उनकी कर्मठता एवं कार्यशैली से प्रभावित होकर उसी समय केंद्रीय कार्यकारिणी समिती का सदस्य चुन लिया गया. 06 अप्रैल 1984 को बोकारो में झामुमो की केन्द्रीय समिति की बैठक हुई, जिसमें सर्वसम्मति से निर्मल महतो को अध्यक्ष चुना गया.

इस प्रकार निर्मल महतो को उनकी कर्मठता, लगनशीलता और पार्टी के प्रति वफादारी के कारण अल्प समय में ही पार्टी का सर्वोच्च पद का सम्मान दिया गया. 1984 ई० में वे रांची लोकसभा क्षेत्र और 1985 में ईचागढ़ क्षेत्र से लड़े, किन्तु दोनों में विजयी नहीं हो सके. 28 अप्रैल 1986 के झामुमो के द्वितीय केंद्रीय महाधिवेशन में दूसरी बार भी उनको पार्टी का अध्यक्ष चुना गया. वे जीवन के अंत तक मोर्चा के अध्यक्ष बने रहे.

निर्मल महतो जब झामुमो में शामिल हुए, उस समय झारखण्ड अलग राज्य आन्दोलन चरम पर था. तभी एक ऐसी दुर्घटना घटी जिसने आन्दोलन का रूख ही मोड़ दिया. 1982 में छोटानागपुर क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा. लोगों के समक्ष भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी.  

निर्मल महतो के आंदोलन में पुलिस गोलीकांड के शिकार हुए दो युवक

दूसरी तरफ, जमाखोरों और कालाबाजारियों ने प्रशासन से सांठगांठ कर अनाज को गोदामों में भर लिया. प्रशासन के इस दमनकारी रवैये के खिलाफ झामुमो ने सभी प्रखंड मुख्यालयों में धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया. इसी क्रम में 21 अक्टूबर 1982 को अकाल राहत, सुवर्ण रेखा डैम (चांडिल) से विस्थापित परिवारों को पुनर्वास एवं नौकरी समेत 21 सूत्री मांगों को लेकर क्रांतिकारी छात्र युवा मोर्चा द्वारा तिरुलडीह स्थित ईचागढ़ प्रखंड कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया जा रहा था, तब पुलिस ने आवेश में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी शुरू कर दी. उस गोलीकांड में चांडिल कॉलेज के दो छात्र अजीत महतो और धनञ्जय महतो शहीद हो गये. इस गोलीकांड ने झारखण्ड आन्दोलन की आग में घी डालने का काम किया और निर्मल महतो के नेतृत्व में आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया.

आजसू के गठन में निर्मल महतो का योगदान

झारखण्ड आन्दोलन में ज्यादा से ज्यादा युवाओं को जोड़ने और आन्दोलन को धार देने के लिए 1 जून 1986 को झामुमो के केंद्रीय समिति की बैठक में उन्होंने ऑल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) का गठन किया और 19, 20 और 21 अक्टूबर 1986 को जमशेदपुर अखिल झारखण्ड छात्र एवं बुद्धिजीवी सम्मलेन का आयोजन कराकर आजसू को थोड़े ही दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा कर दिया.

उन्होंने झारखण्ड अलग प्रान्त आंदोलन को गति प्रदान की और झारखण्ड के स्कूल और कॉलेज के छात्रों को सुसंगठित कर उन्हें इस आंदोलन में भाग लेने का आवाहन किया. उन्होंने छात्रों और नवयुवकों को विश्वास में लिया और बताया, कि “केवल नवयुवक की शक्ति से ही अलग राज्य का सपना साकार हो सकता है”.

निर्मल महतो ने सूर्य सिंह बेसरा को आजसू का जनरल सेक्रेटरी बनाया और इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने का आवाहन किया. जब यह आंदोलन अपने चरम पर था, तभी दुर्भाग्यवश निर्मल दा झारखण्ड आन्दोलन के दुश्मनों और कुछ गद्दारों के षड्यंत्र का शिकार बन गये.

निर्मल महतो की शहादत पुलिस फाइल में रहस्‍य

08 अगस्त 1987 की सुबह निर्मल दा, सूरज मंडल एवं मोर्चे के कार्यकर्ताओं के साथ जमशेदपुर के चमरिया, बिस्टुपुर स्थित टिस्को गेस्ट हाउस से बाहर निकल रहे थे. उसी समय एक अम्बेस्डर कार से पांच व्यक्ति उतरे. सूरज मंडल को कुछ शंका हुई तो उन्होंने निर्मल महतो से अतिथिशाला के अंदर जाने को कहा. इसी बीच एक हमलावर ने निर्मल महतो का कालर पकड़ लिया, जिसे छुड़ाने के लिए सूरज मंडल लपके. सूरज मंडल ने छुड़ा भी लिया और पुनः अंदर जाने को कहा. इसी बीच सोनारी वासी वीरेंदर सिंह नामक एक व्यक्ति ने निर्मल महतो पर तीन गोलियां चला दी. एक गोली उनके मुँह पर, दूसरी गोली पीठ पर तथा तीसरी गोली उनके सीने में लगी, जिससे घटना स्थल पर ही उनकी मृत्यु हो गयी. इसके साथ ही झारखण्ड आन्दोलन का सबसे चमकता हुआ सितारा बादलों के बीच गुम हो गया.

उनकी हत्या एक राजनितिक षडयंत्र के तहत की गयी, पर बिहार सरकार ने इसे महज व्यवसायिक प्रतिद्वंदिता का नाम देकर केस बंद कर दिया. झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद भी किसी सरकार ने उनकी हत्या के पीछे की साज़िश का पर्दाफाश करने में रुचि नहीं दिखाई. क्योंकि इससे बहुत से सफेदपोशों के चेहरे से नकाब उतर सकता था और उनका राजनितिक जीवन ख़त्म हो जाता. आज भी उनकी हत्या का रहस्य बरकरार है.

लेकिन एक सवाल, जो आज हर झारखंडी के मन में है, कि “क्या वाकई निर्मल दा के सपनों का झारखण्ड बन पाया..????”

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