नजीर अहमद वानी को मिलेगा आशोक चक्र सम्‍मान, आतंक का रास्‍ता छोड़ सेना में हुए थे शामिल

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New Delhi: आतंक की राह छोड़ सेना में शामिल होने वाले नजीर अहमद वानी को अशोक चक्र से सम्मानित किया जाएगा. वे भारतीय सेना में लांस नायक के पद पर तैनात थे. शांति काल में किसी सैनिक को उसकी बहादुरी के लिए दिया जाने वाला यह सर्वोच्च सम्मान है.

कश्मीर के शोपियां में  पिछले साल 25 नवंबर को आतंकवाद रोधी अभियान के दौरान भीषण मुठभेड़ के दौरान वे शहीद हो गए थे.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेना अधिकारियों ने गुरुवार को बताया कि 38 वर्षीय वानी कुलगाम के अशमूजी के रहने वाले थे.

वे पहले एक आतंकी संगठन के सदस्य हुआ करते थे. लेकिन उन्होंने जल्द ही यह रास्ता छोड़ दिया और मुख्य धारा में लौट आए. वे 2004 में सेना में भर्ती हो गए. पहले उन्हें प्रादेशिक सेना में भर्ती किया गया. बाद में राष्ट्रीय राइफल्स की 34 वीं इन्फेंट्री बटालियन में वे शामिल कर लिए गए.

जिस एनकाउंटर में वानी शहीद हुए थे, उसमें सुरक्षाबलों ने छह आतंकियों को मार गिराया था. आतंक छोड़कर आत्मसमर्पण करके भारतीय सेना को ज्वाइन करने वाले वानी को साल 2007 में वीरता के लिए सेना का मेडल भी दिया जा चुका है.

बता दें कि  अशोक चक्र भारत का शांति के समय दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है. शहीद लांसनायक को आतंकियों के खिलाफ वीरता से लड़ने के लिए दो बार सैन्‍य पदक भी मिल चुका है. इस साल शांति काल में दिए जाने वाले भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र के लिए चुना गया है. यह खबर ऐसे समय में आई है जब बारामूला को घाटी का पहला आतंक मुक्त जिला घोषित किया गया है.

महामहिम राष्ट्रपति के सेक्रटरी की ओर से जारी प्रेस विज्ञापित्त के अनुसार , ‘लांस नायक वानी ने दो आतंकियों को मारने और अपने घायल साथी को बचाते हुए सबसे बड़ा बलिदान दिया. खतरा देखते हुए आतंकियों ने तेज गोलीबारी शुरू कर दी और ग्रेनेड भी फेंकने लगे.

कैसे वीरगति को प्राप्‍त हुए नजीर अहमद वानी

ऐसे अकुलाहट भरे वक्त में वानी ने एक आतंकी को करीब से गोली मारकर खत्म कर दिया.’ 26 नवंबर को अंतिम संस्कार से पहले वानी को उनके गांव में 21 तोपों की सलामी दी गई थी. वह अपने पीछे पत्नी और दो बच्चे छोड़ गए. वानी को मरणोपरांत अशोक चक्र से नवाज़ा जा रहा है, जो भारत का शांति के समय में दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है. अशोक चक्र के बाद कीर्ति चक्र और शौर्य चक्र का नंबर आता है. वानी की बहादुरी का अंदाज़ा आप इससे भी लगा सकते हैं कि वह दो बार सेना मेडल भी जीत चुके हैं.

नज़ीर वानी इसलिए याद रखे जाने चाहिए क्योंकि वह कश्मीर में एक उम्मीद जगाते हैं. वानी खुद एक नज़ीर हैं कि बंदूक के रास्ते किसी मंज़िल तक नहीं पहुंचा जा सकता. फिर वह लड़ाई चाहे किसी कौम के लिए हो, विचारधारा के लिए हो या किसी मुल्क के लिए ही क्यों न हो. जम्मू-कश्मीर की कुलगाम तहसील के अश्मूजी गांव के रहने वाले नज़ीर एक समय खुद आतंकवादी थे. वानी जैसों के लिए कश्मीर में ‘इख्वान’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है. बंदूक थामकर वह जाने किस-किससे किस-किस चीज़ का बदला लेने निकले थे. पर कुछ वक्त बाद ही उन्हें गलती का अहसास हो गया और वह आतंकवाद छोड़कर सेना में भर्ती हो गए.

शुरू में आतंकी रहे वानी बाद में हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौट आए थे. वह 2004 में सेना में शामिल हुए थे. अधिकारियों ने बताया कि वानी दक्षिण कश्मीर में कई आतंकवाद रोधी अभियानों में शामिल रहे. जिस मुठभेड़ में वह शहीद हुए, उस समय वह 34 राष्‍ट्रीय रायफल्‍स का हिस्‍सा थे. इसके अलावा वह जम्‍मू और कश्‍मीर लाइट इंफैंट्री रेजीमेंट में भी रहे थे.

बीते साल 23 नवंबर 2018 को जब वानी 34 राष्ट्रीय रायफल्स के साथियों के साथ ड्यूटी पर थे, तब इंटेलिजेंस से शोपियां के बटागुंड गांव में हिज्बुल और लश्कर के 6 आतंकी होने की खबर मिली. इनपुट थे कि आतंकियों के पास भारी तादाद में हथियार हैं। वानी और उनकी टीम को आतंकियों के भागने का रास्ता रोकने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. अधिकारियों के अनुसार 38 वर्षीय वानी कुलगाम के अश्मुजी के रहने वाले थे. वह 25 नवंबर को भीषण मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे.

जम्‍मू-कश्‍मीर के चेकी अश्‍मुजी गांव के रहने वाले शहीद लांसनायक नजीर वानी के परिवार में पत्‍नी और दो बच्‍चे हैं. नवंबर के आखिर में शोपियां में हुई मुठभेड़ में वह शहीद हुए थे. उनके सुपुर्द-ए-खाक के समय सेना के बड़े अफसर भी शामिल हुए थे. शहीद के पिता इस दौरान अत्‍यधिक दुखी थे. बेटे को खो देने का दुख उनकी आंखों से आंसू के रूप में बाहर आ रहा था.

एक सैन्‍य अफसर ने उनके पास पहुंचकर उन्‍हें गले लगा लिया था. उन्‍हें सांत्‍वना दी और ढांढस बंधाया था. उनको गले लगाने की तस्‍वीर सेना ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर की थी, जो काफी भावुक कर रही थी. इसमें सेना ने शहीद के पिता को ढांढस बंधाते हुए लिखा ‘आप अकेले नहीं है.’ वानी के सुपुर्द-ए-खाक में 500 से 600 ग्रामीण मौजूद थे. वानी को 21 तोपों की सलामी भी दी गई थी.

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