#MothersDay: मैं मेरी मां जैसी, मां भी कभी बेटी थी

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वैसे तो मां अपने हर बच्चे से समान प्यार करती है. चाहे बेटा हो या बेटी जैसे दो आंखें समान होती हैं वैसे तेरे लिए मैं और भइया दोनों समान थे मां. पर शायद जब खुद मां बनने का अहसास हुआ मुझे तब से तुम्हारे और भी करीब आ गयी थी, ऐसा लगता है मां.

जब खुद मां बनने वाली थी तब ये अहसास होता कि जब तुम्हें पहली बार मेरा तुम्हारी कोख़ में होने का अहसास हुआ होगा तो ख़ुशी से रो पड़ी होंगी. मुझे महसूस करके मेरे आने का बेसब्री से इंतज़ार किया होगा तुमने और पापा ने.

नौ महीनों के पहले दिन से तुम और मैं एक-दूजे के अहसास को समझते, तू परेशान होती तो मैं भी तुम्हारी कोख़ में करवट बदलती रहती, और कभी तुम मेरे लिए अपनी तकलीफें भूल जातीं ताकि मैं तुममें सुरक्षित महसूस करूं.

जब पहली बार तुमने मुझे गोद में लिए होगा तो मेरी ही कितनी बलाएं ली होंगी, मुझे सैकड़ों दफा चूमा भी होगा, नौ महीनें की तकलीफ का फल अपने हाथों में पाकर तुम्हारा सारा दुःख आंसुओं के रूप में बह गया होगा न मां.

पहली बार मैंने “मां” शब्द बोला होगा तो तुम्हें तो जैसे पूरा संसार ही अपने क़दमों में आ गया हो ऐसा ही लगा होगा, जब पहली बार तुतलाते हुए कुछ कहने की कोशिश की होगी तो तुम मेरी मासूमियत पर मुस्कुराई होगी न, और मुझे गले से लगा लिया होगा तुमने.

चलना बहुत देरी से सीखा था तो तुम घबराई होगी न. बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी मैं तुम्हारी नातिन के लिए घबराई हुई थी, और जब चलना सीखा तो तुमने भगवान को ढेरों शुक्रिया अदा किये होंगे. जब भी बीमार हुई तो तुम और पापा मेरे सिरहाने बैठ मेरे सर पर नमक-पानी की गीली पट्टियां रखते थे.

ना जाने कितनी अनगिनत रातें तुमने मेरे नाम कर दी होंगी, वैसे ही जब तुम्हारी नातिन नुकसानदेह चीज मांगती थी या कोई ऐसी जिद करती जो मैं पूरी न कर पाऊं तो अहसास होता था कि‍ मैंने भी कितनी बार तुम्हें यूं ही सताया होगा हर दिन नयी फरमाइशें, हर दिन नई शरारतें फिर भी खुद की जरूरतें मार मेरी ईच्छाएं पूरी करते तुम और पापा, मेरे सारी शरारतों को सर आंखों पर पनाह देतें.

कितनी ही बार मेरी शरारतों के किस्से मोहल्ले वालों ने आकर सुनाये होंगे तुम्हें पर तुम उनसे माफ़ी मांग मुझे समझातीं, कभी झल्लाई नहीं मुझ पर याद है मां, मैंने एक बार पड़ोसी की छत पर जाकर उनकी गेहूं की बोरी जला दी थी और तुम्हें मेरे लिए बहुत कुछ सुनना पड़ा था, न जाने कितनी ऐसी शरारतें मेरे बचपन में समायी होंगी.

मुझे खाना खिलाने के लिए भूत वाले बाबा की कहानी सुना देतीं कि वो आएगा और मुझे ले जायेगा. मुझे सुलाने के लिए न जाने कितनी लोरियां तुमने खुद बनायी होंगी. सर्दी में तुम ठंड से बचाती मुझे, गर्मी में लू से बचातीं.

जब धीरे-धीरे बड़ी होती गयी तो मैंने भी घर के कामों में तुम्हारा हाथ बंटाना शुरू किया, तुम कभी-कभी खीझ जातीं पर हमेशा यह ध्यान रखतीं कि सब ने खाना ठीक से खाया या नहीं. लेकिन, मैं भी तुम्हारी मां थी शायद सबको खाना खिलाकर अंत में खाने वाली मेरी मां कभी भूखे पेट न सोये, हर रोज पूछती की मां तुमने खाना खाया और अगर तुम भूखी रहतीं तो मैं भी अगले दिन कुछ नहीं खाती थी जब तक तुम न खा लो.

याद है मां मैं जब छोटी थी जब भी मैं और तुम कहीं बाहर जाते तो तुम मुझे साईड में चलने को कहती ताकि किसी वाहन से मैं टकरा न जाऊं. जब बड़ी हुई मैं तुम्हें साईड में रखती ताकि तुम सुरक्षित रहो. जब भी पापा या कोई घर का सदस्य तुम्हें कुछ कहता तो मैं आ जाती थी तुम्हारे बचाव में, तुम्हें जब भी स्कूल से कोई तोहफ़ा मिलता या कोई मेरी पसंद की चीज तुम्हें कोई देकर जाता तो तुम मेरे लिए रखतीं.

जब मैं बड़ी हुई तो तुम्हारे लिए रखती मैं. और आज तुम्हारी वही बेटी अपनी बेटी के लिए करती है, जब भी पढ़ते हुए सो जाती तो मेरे कमरे की लाइट बंद कर मेरे माथे को चूमकर, ज़रा सा मुस्कुराकर जाती पर नींद में वही तुम्हारी आहट महसूस हो जाती थी मुझे मां.

जब भी तुम स्कूल से आतीं तुम तो तुम्हारे आने से पहले ही मैं सारा काम जो मेरे हिस्से में आता करके रखती ताकि तुम्हें थोड़ा आराम मिले. याद है मां सुबह-सुबह एक्स्ट्रा क्लास जाने से पहले भी अपने हिस्से का काम करके जाती ताकि तुम्हें स्कूल पहुंचने में देरी न हो. याद है मां जब मैंने पहली बार रोटी बनाई थी तो कुत्ते की जीभ जैसी और बेढंगी रोटी बनाई थी पर फिर भी तुमने हंसते-हंसते खाई और कहा की बहुत स्वाद है रोटी में पर मैं नहीं समझ पाई थी तब की ये तुम्हारे और मेरे रिश्ते का स्वाद था उस रोटी में.

पर जब खुद मां बनी तो समझ गयी, आज जब तुम्हारी ही उम्र में पहुंच गयी हूं तब भी तुम्हारे हाथों का स्वाद नहीं भूली, सब कुछ बनाना आ गया समय के साथ. पर तुम्हारे हाथों का स्वाद बड़े-बड़े होटलों और ढाबों पर भी नहीं मिला मां.

अगर स्कूल से आने में या खेलकर आने में कभी देरी भी हुई तो तुम्हारी फ़िक्र आज मैं महसूस कर पा रही हूं. जब आज तुम्हारी नातिन को डोली में बिठाकर अनजान लोगों के घर भेज रही हूं, जैसे तुमने मुझे भेजा था कभी, मां इतिहास खुद को दोहरा रहा है.

तुम हमेशा मुझे भविष्य की चुनौती से निपट सकूं इसलिए कहतीं “ससुराल जाकर क्या करेगी, अभी ये हाल है तो” भगवान की कृपा और तुम्हारे आशीर्वाद से मुझे ससुराल भी मायके सा मिला पर आज जब दूसरी लड़कियों की दुदर्शा देखती हूं तो अहसास होता है कि मैं जीवन मैं कभी कमजोर न हो जाऊं, हर परिस्थिति से दो-चार हो सकूं इसलिए तुम मेरे ऐसे इम्तिहान लेती रहतीं जो सिर्फ तुम्हीं जानती भी थीं.

मैं हमेशा जब तुमसे रूठ जाती तो कहतीं कि “तुमने जैसे सख्ती की, मैं नहीं करूंगी अपनी बच्ची पर” पर सच कहूं मां तुमने जैसे मेरी परवरिश की. तुमने जैसे मुझे आत्मनिर्भर बनाया, हर स्थिति से लड़ने के लिए शुरू से तैयार किया, वैसी कोशिश जरूर की है मैंने भी तुम्हारी नातिन के लिए.

जब भी तुम परेशान हुईं तो भले चाहे कितनी भी दूर थी मैंने तुम्हें महसूस कर लिया हमेशा, जब भी मैं मन से तुम्हें पुकारती हमेशा तुम्हारा कॉल आ जाता की “मां को याद कर रही थी न, बेटा.” आज जब तुम्हारी नातिन को विदा करने की बारी आयी है समझ आता है कि किस तरह अपने कलेजे के टुकड़े को तूने खुद से दूर किया होगा मां.

हमेशा मेरे दिल में क्या चल रहा है तुम समझ जातीं ठीक वैसे ही आज भी समझ जाओ न मां, बहुत याद आ रही है तुम्हारी, एक बार आ जाओ न मां, तुम्हारी नातिन की शादी की पत्रिका रिवाज तो है की सबसे पहले भगवान के सामने रखी जाये पर मैं तुम्हारे और भगवान दोनों के सामने एक साथ रख रही हूं ताकि तुम आओ अपनी बेटी से मिलने, अपनी नातिन को उसके नए जीवन की शुरुआत पर आशीर्वाद देने.

तुम्हारे इंतज़ार में तुम्हारी बेटी.

आपकी ” अंजलि ”

(ब्‍लॉग से साभार)

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