लालू प्रसाद यादव को फिर नहीं मिली बेल, जानें राजद सुप्रीमो के वकील कपिल सिब्बल ने कैसी की बहस

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Ranchi: राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) अभी जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे. उनकी जमानत याचिका (Lalu Yadav Bail) झारखंड हाई कोर्ट (Jharkhand High Court) ने शुक्रवार को सुनवाई के बाद खारिज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ वकील कपिल सिब्‍बल (Kapil Sibal) ने लालू की बेल पिटीशन पर बहस की. लालू ने चारा घोटाले (Chara Ghotala, Fodder Scam) के दुमका कोषागार मामले में जमानत याचिका दाखिल की थी. वे निचली अदालत से दी गई सात साल की सजा (Lalu Yadav Jail) में आधी सजा काटने का हवाला देते हुए कोर्ट से बेल की मांग कर रहे हैं. हालांकि कोर्ट ने कहा कि उनकी आधी सजा पूरी होने में अभी 2 माह का समय बचा है. ऐसे में उनकी जमानत याचिका खारिज की जा रही है.

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत से लालू की जमानत पर सुनवाई के लिए दो माह बाद की तिथि निर्धारित करने की मांग की. लेकिन सीबीआइ ने इसका जोरदार विरोध करते हुए कहा कि उन्हें पहले ही समय की मांग करनी चाहिए थी. अब जब बहस पूरी होने के बाद अदालत फैसला सुनाने जा रही है, तो ऐसा नहीं किया जा सकता है. इसके बाद अदालत ने लालू की जमानत याचिका को खारिज कर दिया. इधर, लालू के अधिवक्ता देवर्षि मंडल ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल नहीं की जाएगी.

शुक्रवार को सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद और सीबीआइ की ओर से उनकी कस्टडी से संबंधित निचली अदालत के सत्यापित आदेश की प्रति कोर्ट में जमा की गई. लालू की ओर से सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कपिल सिब्बल व अधिवक्ता देवर्षि मंडल ने अदालत को बताया कि उनके अनुसार लालू प्रसाद ने अब तक 42 माह 11 दिन जेल में बिताएं है, जो सजा की आधी अवधि से ज्यादा है.

ऐसे में आधी सजा पूरी करने, बढ़ती उम्र और कई तरह की बीमारियों को देखते हुए लालू प्रसाद को जमानत की सुविधा मिलनी चाहिए. कपिल सिब्बल की ओर से यह भी कहा गया कि इससे पहले हाई कोर्ट ने आरके राणा, जगदीश शर्मा, दयानंद कश्यप और सुनील गांधी को आधी सजा पूरी नहीं करने पर भी जमानत दी है. इसलिए लालू के मामले में भी अदालत को जमानत देने पर विचार करना चाहिए. 

सीबीआइ के अधिवक्ता राजीव सिन्हा की ओर से इसका विरोध किया गया. उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद की ओर से जिस अवधि को जेल रहने का दावा किया जा रहा है. निचली अदालत के आदेश में दुमका कोषागार मामले में जेल भेजे जाने का कोई जिक्र नहीं है. इसलिए उक्त अवधि की गणना नहीं की जा सकती है. उनके अनुसार दुमका वाले मामले में लालू प्रसाद ने अब तक 37 माह 19 दिन ही जेल में बिताएं है ऐसे में उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती है.

दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि कोर्ट ने सारी परिस्थितियों को देखते हुए आरके राणा, जगदीश शर्मा, दयानंद कश्यप और सुनील गांधी को आधी सजा पूरी नहीं होने के बाद भी जमानत दी है. कोर्ट की गणना के अनुसार लालू प्रसाद ने दुमका कोषागार मामले में अब तक 40 माह ही जेल में गुजारे हैं, जो कि आधी सजा से दो माह कम है. इसलिए लालू को जमानत नहीं दी जा सकती है.

रांची हाईकोर्ट (Ranchi High Court) में शुक्रवार को उनकी जमानत पर सुनवाई हुई. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव (Leader of Opposition Tejashwi Yadav) ने लालू की जमानत की उम्मीद जताई थी, लेकिन नाउम्‍मीदी हाथ लगी. यह लालू परिवार (Lalu Family) और आरजेडी को बड़ा झटका है.

लालू को जमानत नहीं मिलने से राजद खेमे में घोर निराशा है. तेजस्‍वी यादव, तेज प्रताप यादव समेत लालू परिवार अदालत के इस तगड़े झटके से सन्‍न है. शुक्रवार को हाई कोर्ट ने लालू की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि उनकी आधी सजा पूरी नहीं हुई है, लिहाजा उन्हें ऐसे हालात में बेल नहीं दी जा सकती. लालू प्रसाद ने चारा घोटाले के दुमका कोषागार मामले में उच्‍च न्‍यायालय से जमानत मांगी थी. अदालत ने लालू यादव को दो महीने बाद नई जमानत याचिका दायर करने को कहा है. लालू को चारा घोटाले के तीन मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी है.

लालू से जुड़े दो मामलों पर पर भी हुई सुनवाई

कोर्ट में आज लालू की जमानत याचिका के साथ ही उनके खिलाफ दर्ज जेल मैनुअल के उल्‍लंघन मामले में भी सुनवाई हुई है. उनके खिलाफ जेल में रहते हुए फोन का इस्‍तेमाल कर बिहार की नीतीश सरकार को अस्थिर करने की साजिश रचने का भी आरोप है.

लालू विरोध की राजनीति के बल पर एनडीए को मिली सत्‍ता

लालू की गैर मौजूदगी में आरजेडी की कमान फिलहाल नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के कंधों पर है. हालांकि, उनके नेतृत्‍व में हुए पहले चुनाव में आरजेडी को करारी शिकस्‍त मिली थी. साल 2019 में हुए लोकसभा के उस चुनाव (Lok Sabha Election 2019) में लालू की उनके तीन दशक की राजनीति में सबसे बड़ी हार हुई. न केवल आरजेडी शून्‍य पर आउट हो गई, बल्कि विपक्षी महागठबंधन (Grand Alliance) में आरजेडी के सहयोगी दलों की भी ऐसी ही स्थिति रही. महागठबंधन में एकमात्र सीट जीतकर कांग्रेस (Congress) ने जैसे-तैसे अपनी प्रतिष्ठा बचाई. यह बिहार की लालू विरोध की राजनीति की सफलता थी, जिसके कंघे पर चढ़कर राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने अपना परचम लहराया.

बड़े कद-पद के नेताओं के बीच बनाई जगह

लालू प्रसाद यादव पहली बार तीन दशक पहले 1990 में बिहार का जब मुख्यमंत्री बने तो शुरू के कुछ दिनों में माना जाने लगा कि वे ज्यादा दिनों तक हैसियत में नहीं रह पाएंगे. इसकी वजह थी कि तब बिहार में जगन्नाथ मिश्रा, सत्येंद्र नारायण सिंह, भागवत झा आजाद और रामाश्रय प्रसाद सिंह सरीखे कांग्रेस के बड़े कद-पद के नेताओं का बोलबाला था. इन सबके सामने लालू की हैसियत बहुत छोटी थी. किंतु समय के साथ लालू ने खुद को निखारा और अपनी राजनीति को सत्ता के उस शीर्ष पर ले गए, जहां से उनके आसपास भी कोई नहीं दिखने लगा.

2005 में हारे तो रेल मंत्री बने और छा गए

साल 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में जब नई सरकार का गठन हुआ तो लालू की करिश्माई राजनीति को थोड़े समय के लिए ग्रहण जरूर लगता दिखा, लेकिन तब लालू ने बिहार के बदले दिल्ली को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और वहां भी रेल मंत्री के रूप में खासे चर्चित होने लगे. घाटे में चल रहे रेलवे का पहली बार मुनाफे का बजट बनाया और छा गए.

आज भी बने हुए हैं विपक्ष की धुरी

बिहार के एक बड़े वोटबैंक पर कब्जे के साथ राजनीति में लालू प्रसाद यादव का मुकाबला आज भी नहीं है. नीतीश कुमार के सापेक्ष अगर राजनीति में किसी की तुलना होती है तो वह लालू हैं. वे संपूर्ण विपक्ष की धुरी बने हुए हैं. यही कारण है कि सत्ता से हटने के बाद भी कांग्रेस, भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी व मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी समेत तमाम दलों की राजनीति लालू की कृपा पर ही टिकी रहती है.

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