Take a fresh look at your lifestyle.

महाशिवरात्रि पर जानिए टांगीनाथ धाम भगवान राम और शिव के लिए खास

0 56

Gumla: टांगीनाथ धाम, झारखंड राज्य मे गुमला शहर से करीब 75 km दूर तथा रांची से करीब 150 km दूर घने जंगलों के बीच स्थित है. यह जगह अब अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र मे आती है. इस जगह का परशुराम से गहरा नाता है. यहां पर आज भी भगवान परशुराम का फरसा ज़मीं मे गड़ा हुआ है. झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया. धाम में आज भी भगवान परशुराम के पद चिह्न है.

परशुराम ने यहां पर की थी घोर तपस्या

टांगीनाथ धाम मे भगवान विष्णु के छठवें अवतार परशुराम ने तपस्या कि थी. परशुराम टांगीनाथ कैसे पहुंचे इसकी कथा इस प्रकार है. जब राम, राजा जनक द्वारा सीता के लिए आयोजित स्वयंवर मे भगवान शिव का धनुष तोड़ देते है तो परशुराम बहुत क्रोधित होते हुए वहा पहुंचते हैं और राम को शिव का धनुष तोड़ने के लिए भला–बुरा कहते है. सब कुछ सुनकर भी राम मौन रहते हैं, यह देख कर लक्ष्मण को क्रोध आ जाता है और वो परशुराम से बहस करने लग जाते हैं. इसी बहस के दौरान जब परशुराम को यह ज्ञात होता है कि राम भी भगवान विष्णु के ही अवतार है तो वो बहुत लज्जित होते हैं और वहां से निकलकर पश्चाताप करने के लिए घने जंगलों के बीच आ जाते है. यहां वे भगवान शिव की स्थापना कर और बगल में अपना फरसा गाड़ कर तपस्या करते हैं. वहीं जगह आज का टांगीनाथ धाम है.

यहां पर गड़े लोहे के फरसे कि एक विशेषता यह है कि हज़ारों सालों से खुले मे रहने के बावजूद इस फरसे पर ज़ंग नहीं लगी है. और दूसरी विशेषता यह है कि ये जमीन मे कितना नीचे तक गड़ा है इसकी भी कोई जानकारी नहीं है. एक अनुमान 17 फ़ीट का बताया जाता है.

फरसे से जुडी किवदंती

कहा जाता है कि एक बार क्षेत्र में रहने वाली लोहार जाति के कुछ लोगों ने लोहा प्राप्त करने के लिए फरसे को काटने प्रयास किया था. वो लोग फरसे को तो नहीं काट पाये पर उनकी जाति के लोगों को इस दुस्साहस कि कीमत चुकानी पड़ी और वो अपने आप मरने लगे. इससे डर के लोहार जाति ने वो क्षेत्र छोड़ दिया और आज भी धाम से 15 km की परिधि में लोहार जाति के लोग नहीं बसते है.

शिवजी से भी जोड़ा जाता है टांगीनाथ का सम्बन्ध

कुछ लोग टांगीनाथ धाम मे गड़े फरसे को भगवान शिव का त्रिशुल बताते हुए इसका सम्बन्ध शिवजी से जोड़ते हैं. इसके लिए वो पुराणों कि एक कथा का उल्लेख करते हैं. जिसके अनुसार एक बार भगवान शिव किसी बात से शनि देव पर क्रोधित हो जाते हैं. गुस्से में वो अपने त्रिशूल से शनि देव पर प्रहार करते हैं. शनि देव त्रिशूल के प्रहार से किसी तरह अपने आप को बचा लेते हैं. शिवजी का फेका हुआ त्रिशुल एक पर्वत को चोटी पर जा कर धंस जाता है. वह धंसा हुआ त्रिशुल आज भी यथावत वहीं पड़ा है. चूंकी टांगीनाथ धाम मे गड़े हुए फरसे की उपरी आकृर्ति कुछ-कुछ त्रिशूल से मिलती है इसलिए शिव जी का त्रिशुल भी मानते है.

ऐतिहासिक और पुरातात्विक सम्पदा से परिपूर्ण है टांगीनाथ धाम

हम अपनी ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहरों के प्रति कितने लापरवाह है, टांगीनाथ धाम इसका एक जीता–जागता उदाहरण है. यहां पर सैकड़ों की संख्या में प्राचीन शिवलिंग और मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं. लेकिन, उनके रख रखाव और सुरक्षा का यहा कोइ प्रबन्ध नहीं है. इनकी ऐसी स्तिथि देखकर यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि अब तक कितनी पुरासम्पदा गलत हाथों में जा चुकी होगी. टांगीनाथ में स्थित प्रतिमाएं उत्कल के भुवनेश्वर, मुक्तेश्वर व गौरी केदार में प्राप्त प्रतिमाओं से मेल खाती है.

टांगीनाथ धाम में हुई थी खुदाई, निकले थे सोने और चांदी के आभूषण

1989 में पुरातत्व विभाग ने टांगीनाथ धाम मे खुदाई कि थी. खुदाई में उन्हें सोने चांदी के आभूषण सहित अनेक मूल्यवान वस्तुए मिली थी. लेकिन कुछ कारणों से यहां पर खुदाई बन्द कर दी गई और फिर कभी यहां पर खुदाई नहीं की गई. खुदाई में हीरा जडि़त मुकुट, चांदी का अर्धगोलाकार सिक्का, सोने का कड़ा, कान की सोने की बाली, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थीं. यह सब चीज़े आज भी डुमरी थाना के मालखाना में रखी हुई है. अब संदेह में डालने वाली और आश्चर्य चकित करने वाली बात यह है कि जब वहां से इतनी बहुमूल्य चीजें मिल रही थी तो आखिर क्यों वहा पर ख़ुदाई बन्द कर दी गई? हो सकता है कि वहां पर और खुदाई कि जाती या आज भी कि जाये तो हमे टांगीनाथ के बारे मे कुछ नई जानकारी हो.

हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है

टांगीनाथ धाम के विशाल क्षेत्र मे फैले हुए अनगिनत अवशेष यह बताने के लिए काफी है कि यह क्षेत्र किसी जमाने में हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल रहा होगा लेकिन किसी अज्ञात कारण से यह क्षेत्र खंडहर मे तब्दील हो गया और भक्तों का यहां पहुचना कम हो गया. रही सही कमी वर्तमान समय मे सरकारी उपेक्षा और नक्सलवाद ने कर दी. लेकिन अब लगता है की धाम कि कुछ दशा सुधरने वाली है क्योकि धाम के सुंदरीकरण के लिए झारखंड सरकार के पर्यटन विभाग ने गुमला जिला प्रशासन को 43 लाख रुपए आवंटित किए हैं.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.