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आखिर क्यों शोर-शराबे के बीच गुम होते जा रहे हैं जनजातीय परब?

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Arun

सबसे पहले आप सभी भाईयों और बहनों को प्रकृति परब की हार्दिक शुभकामनायें. ये जगजाहिर है कि झारखंड एक जनजातीय प्रदेश है. इसलिए यहां के सभी प्रमुख परब प्रकृति की शक्ति से जुड़े हुए हैं, जैसे सरहुल, करम, जीतिया, टुसू आदि. लेकिन आज झारखंड में सभी जनजातीय परब अपनी पहचान खोते जा रहे हैं. लोगों में जनजातीय परब को लेकर पहले जैसा उत्साह देखने को नहीं मिलता है. यही वजह भी है कि जनजातीय परब मनाने के दौरान भी अब लोगों की भेंड़चाल देखने मिलती है. परब में भक्ति से ज्यादा दिखावा ही देखने को मिल रहा है. लोगों की उदासीनता की वजह से अब जनजातीय परब कहानियों में ही सिमटती जा रही है.

सबसे पहले बात करते हैं जनजातीय परब के स्वरुप और उद्देश्य पर. झारखंड में जितने भी जनजातीय परब मनाये जाते हैं, सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रकृति से ही जुड़े हुए हैं. जैसे, करम परब जहां भाई बहन के प्यार का परब तो है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा इस पर्व में प्रकृति के प्रति प्रेम और उसके संरक्षण की भावना नजर आती है. सावन और भादो मास में धरती पर हरियाली नजर आती है. खेत सब लहलहा उठते हैं और उसमें लगे फसल भी हवा के साथ मिलकर झूमते नजर आते हैं. पेड़ और पौधों में शक्ति का नया संचार होता है.

प्रकृति से जो हमें आशीर्वाद मिलता है, उसी का धन्यवाद देने के लिए हम करम परब मनाते हैं. साथ ही इस परब में भाई और बहन के प्रेम की भी अभिव्यक्ति होती है. लेकिन करम परब के साथ धर्मा और कर्मा की काल्पनिक कहानी जोड़ दी गई, जिसमें कहीं भी प्रकृति के वरदान या भाई बहन के प्रेम का जिक्र तक नहीं है.
करम के ठीक एक पक्ष बाद जितिया का परब मनाया जाता है. जितिया वास्तव में प्रकृति के सृजन शक्ति का परब है. जितिया के नौ दिनों के परब में धान की बालियों में बीजों का प्रस्फुटन होता है. जिसके उपलक्ष में जितिया परब मनाया जाता है. लेकिन इस परब का दूसरा पक्ष भी है, जिस धरती रूपी माएं अपने बच्चों की खुशहाली के लिए ये परब मनाती हैं. बच्चों की कामना के लिए उपवास रखती हैं. लेकिन इस परब के साथ भी जितावाहन की काल्पनिक कहानी जोड़ दी गयी है.
उसी तरह, अगहन मास में किसान धन रूपी धान से परिपूर्ण होता है. उसके घर में समृद्धि आती है. जिसके उत्साह में वो टुसू परब मनाता है. लेकिन इसके साथ भी तुसुमनी की काल्पनिक कहानी जोड़ी गयी है, जो बेहद लोकप्रिय है. इसके कारण जनजातीय परबों के वास्तविक स्वरूप और उद्देश्यों को क्षति पहुंची और जनजातीय परब महज नाच-गाने तक सीमित रह गये.

जैसे-जैसे जनजातीय परब अपने मूल स्वरुप को खोते गये तो इसमें दिखावा भी बढ़ता गया. जनजातीय परबों की खासियत होती है कि ये बाजार पर निर्भर नहीं होते हैं. प्रकृति से जो भी संपदा हमें प्राप्त होती है, उसी से माध्यम से हम प्रकृति का अभिनंदन करते हैं. पर, आज दुर्गा पूजा, छठ जैसे त्योहारों की देखादेखी करम जैसे परब में भी बड़े-बड़े पंडाल बनाये जाते हैं, डीजे का इंतजाम किया जाता है और शोर- शराबे के बीच लोग सिर्फ नाचते नजर आते हैं. जिससे इस दिखावे की वजह से करम का मूल उद्देश्य गुम होता जा रहा है.

जनजातीय परबों के हाशिये पर जाने का एक महत्वपूर्ण कारण इनके प्रति सरकारी उदासीनता भी है. झारखंड में सभी उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों जनजातीय परबों को लेकर कोई जागरुकता अभियान नहीं चलाते. लोगों में जिस तरह से प्रकृति प्रेम के प्रति उदासीनता नजर आ रही है, उसे फिर से जगाने के लिए जागरुकता अभियान चलाये जाने की जरूरत है.

पेड़-पौधे अगर हमारे आस-पास बचे रहेंगे, तब ही हमें एक स्वच्छ वातावरण भी मिलेगा. तभी हम अपने बच्चों में प्रकृति प्रेम जगा पायेंगे और जनजातीय परब का महत्व भी उन्हें समझा पायेंगे. इसके लिए लोगों को खुद ही जागरूक होना होगा.

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