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वित्‍तीय आपात की ओर बढ़ता झारखंड, खजाने की चाबी सीएम हेमंत सोरेन के पास

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Ranchi: झारखंड के सरकारी कोषागार पिछले एक महीने से बंद हैं. सरकारी कर्मचारियों के सैलरी के अलावे किसी दूसरे मद के लिए पैसों की निकासी रूकी हुई है. इसे लेकर लोगों के बीच मीडिया के जरिए कई तरह की चर्चाएं गर्म हैं. मीडिया की खबरों में बताया गया कि पिछली भाजपा सरकार ने झारखंड का खजाना खाली कर दिया.

इन सबके बीच झारखंड के ट्रेजरी बंद होने की वजह खजाना खाली होना नहीं है. दरअसल इसकी चाबी हेमंत सोरेन के पास है. जब वह चाहेंगे तभी यहां के ट्रेजरी को अनलॉक किया जा सकेगा.

डेवलपमेंट प्रोजेक्‍ट रफ्तार पर लगा ब्रेक

झारखंड में ट्रेजरी फ्रीज किये जाने के बाद करोड़ों रुपए के डेवलमेंट प्रोजेक्ट की रफ्तार पर ब्रेक लगा हुआ है. इन प्रोजेक्‍ट पर काम करने वाली कंपनियों के पेमेंट रोक दिए गए हैं. साथ ही सरकार ने नए टेंडर निकालने और चल रही टेंडर की प्रक्रिया पर रोक लगा रखी है. एक अनुमान के मुताबिक झारखंड में अभी 5000 करोड़ रुपए से अधिक के टेंडर अटके पड़े हैं.

पांच हजार करोड़ से अधिक के टेंडर लंबित

एक अनुमान के मुताबिक राज्य के विभिन्न कार्य विभागों में सरकार के इस निर्णय से लगभग पांच हजार करोड़ रुपए से अधिक के विकास कार्यों के टेंडर पर ब्रेक लग गया है.

जानकारी के अनुसार, फिलहाल भवन निर्माण विभाग में दो हजार करोड़, ग्रामीण विकास में एक हजार करोड़, पथ निर्माण में एक हजार करोड़, वहीं अन्य विभागों में लगभग एक हजार करोड़ रुपए के टेंडर निकालने की प्रक्रिया स्थगित हो गई है.

प्रोजेक्ट में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा हर माह लगभग 60 करोड़ के बालू, 50 करोड़ के चिप्स और लगभग 100 करोड़ के ईंट की सप्लाई की जाती है. इसका आधार 4:3:1 (चार कड़ाही बालू. तीन कड़ाही चिप्स और एक कड़ाही सीमेंट) माना गया है.

दूसरी वजह यह भी है कि बार-बार प्रोजेक्ट के डिजाइन और डीपीआर में बदलाव होने के कारण प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ जाता है. ठेकेदार को समय पर पैसा नहीं मिलने के कारण आपूर्तिकर्ताओं का भी भुगतान लंबित हो जाता है. प्रदेश में आपूर्तिकर्ताओं का लगभग 1000 करोड़ रुपये से भी अधिक का भुगतान लंबित है.

सरकार गठन नहीं होना सबसे बड़ी वजह

मुख्य सचिव स्तर से सभी विभागों को जारी पत्र में कहा गया है कि जो पहले टेंडर निकले हैं और डाले जा चुके हैं उन्हें भी फाइनल नहीं करें. मुख्य सचिव ने 24 दिसंबर 2019 और 10 जनवरी 2020 को सभी विभागों को पत्र लिखकर सरकार के पूर्ण गठन तक नई योजनाओं को स्वीकृत नहीं करने और राशि जारी नहीं करने का आदेश दिया था. इस आदेश के बाद से विकास कार्यों की गति तत्काल रूक गई है.

इस पत्र में साफ तौर पर कहा गया कि सभी स्‍तरों पर किसी भी प्रकार की नई योजना अथवा कार्य की स्‍वीकृति नहीं दी जाए तथा सभी प्रकार के सिविल निर्माण कार्यों से संबंधित किसी भी अग्रिम अथवा अन्‍य प्रकार का भुगतान तब तक न किया जाए जब तक कि नई सरकार का विधिवत गठन नहीं हो जाता है.

हेमंत सरकार का गठन हुए करीब एक माह बीतने को हैं. मंत्रिमंडल का पूर्ण विस्तार अब तक नहीं हो पाया है. इसमें कोई न कोई पेंच फंसता नजर आ रहा है. मंत्रिमंडल में पार्टी का कोटा और विभाग को लेकर अब तक स्थिति साफ नहीं हो पायी है. हेमंत के साथ कांग्रेस के डॉ रामेश्वर उरांव और आलमगीर आलम एवं राजद के सत्याानंद भोक्ता ने शपथ ली थी. अब भी हेमंत के लि‍ए मंत्रिमंडल की उलझन को सुलझाना बड़ी चुनौती है.

मंत्रिमंडल का पूरी तरह से गठन नहीं होने से कामकाज प्रभावित हो रहा है. अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें. कोई भी नहीं योजना शुरू करने पर मुख्य सचिव द्वारा रोक लगाई जा चुकी है. चल रही योजना में पेमेंट नहीं करने का आदेश हो चुका है.

नहीं सुलझ रहा मंत्रिमंडल विस्‍तार का पेंच

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कांग्रेस के आलाकमान से इन मुद्दों पर चर्चा कर चुके हैं. इसके बाद भी पेंच नहीं सुलझ पाया है. मंत्रियों की संख्या और विभागों के बंटवारे को लेकर अब भी जिच कायम है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोनिया गांधी, आरपीएन सिंह और उमंग सिंघार से मिलकर मंत्रियों की संख्या एवं विभागों के बंटवारे पर आम सहमति बनाने में लगे हुए हैं. हालांकि उन्हें अब तक सफलता नहीं मिल पाई है.

कांग्रेस को चाहिए अहम विभाग

जानकारी के अनुसार कांग्रेस की नजर कई अहम विभाग पर है. पार्टी स्कूली शिक्षा, उच्च व तकनीकी शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, नगर विकास, ग्रामीण विकास, गृह, वित्त और कार्मिक अपने कोटे में रखना चाहती है. ऐसे में हेमंत सोरेन के लिए पार्टी की मांगों को मानना चुनौती बन गई है. उन्हें अपनी ही पार्टी के विधायकों का विरोध होने की आशंका सता रही है. वे दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहते हैं.

सरकार गठन के पहले दिन से ही कांग्रेस हेमंत पर हावी है. इसकी झलक शपथ ग्रहण के दिन देखने को मिली. इसमें कांग्रेस के दो और राजद के एक विधायक ने मंत्री के तौर पर शपथ ली थी. शपथ ग्रहण से पहले चर्चा थी कि झामुमो कोटे से भी दो विधायकों को शपथ दिलाई जाएगी. हालांकि 29 दिसंबर के शपथ ग्रहण में परिदृश्य पूरी तरह बदला दिखा.

कोटे से अधिक पद चाहिए

कांग्रेस को निर्धारित कोटे से अधिक पद चाहिए. बताया जाता है कि चार विधायकों में एक मंत्री पद का डील हुई थी. इस हिसाब से कांग्रेस के कोटे से चार मंत्री होना है. हालांकि कांग्रेस पांच मंत्री पद पर दावा कर रही है. इससे समीकरण बिगड़ रहा है. कांग्रेस राजद विधायक को मंत्री की जगह बोर्ड या निगम में जगह देने की वकालत भी कर रही थी. हालांकि अंतिम समय में सत्यानंद भोक्ता को मंत्री की शपथ दिलाई गई.

हर विधायक रेस में

कांग्रेस का हर विधायक मंत्री बनने की रेस में है. जामताड़ा विधायक इरफान तो खुद को उप मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग तक कर चुके हैं. हालांकि उनकी मांग खारिज की जा चुकी है. जानकारी हो कि 17 जनवरी को दिल्ली में कांग्रेस के 16 विधायक सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मिल भी चुके हैं.

वित्‍तीय आपात से पूरा सिस्‍टम प्रभावित

झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्‍ता दीपेश कुमार निराला का कहना है कि झारखंड की इस वित्‍तीय स्थिति पर पता नहीं हेमंत जी के पास ऐसी क्या मजबूरी है कि वह इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाला समय झारखंड के विकास को पूर्ण रूप से रोक देगा. पूरे राज्य में हाहाकार मच जाएगा और विकास योजना और इनके निर्माण कार्य से जुड़े लोगों का परिवार रास्ते में आने को मजबूर हो जाएगा.

उन्‍होंने कहा है कि राज्य का पूरा सिस्टम प्रभावित होगा और फिर से राज्य की विधि व्यवस्था प्रभावित होगी. क्योंकि बिना अर्थ के अर्थात रुपए के आवागमन के कोई भी सरकार नहीं चल सकती. अगर ऐसा ही रहा तो झारखंड की स्थिति कहीं वित्तीय आपात की ओर ना बढ़ जाए.

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