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झारखण्ड: संसाधनों से समृद्धि का मार्ग

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Arun Kumar

हमारे सपनों कर झारखण्ड महज जमीन का एक टुकड़ा भर नहीं है, बल्कि प्रकृति ने इसे बहुत नजाकत से संवारा है. झारखंड में जहाँ चारों तरफ हरे-भरे जंगल, पर्वत-पहाड़, नदी-नाला, तालाब और झरने दिखते हैं, वहीं झारखण्ड के गर्भ में भी खनिजो और रत्नों से भरा है, यहां कोयला, लोहा, तांबा, अभ्रक, बॉक्साइट, ग्रेनाइट, अभ्रक और यूरेनियम जैसे खनिज संसाधनों का अकूत भंडार है. पूरे भारत का लगभग 40 फीसदी खनिज संपदा अकेले झारखंड राज्य में है. इसके बावजूद झारखण्ड गठन के बीस साल बाद भी झारखण्ड की गणना गरीब राज्यों में की जाती है.

क्या कारण है कि तमाम दावों के बावजूद आज भी झारखण्ड का विकास नहीं हो पाया है? सबसे पहले बात करते हैं, झारखण्ड की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि की. झारखण्ड की कुल जनसंखया का 76% जनसंख्या गाँव में निवास करती है और 65% ग्रामीण सीधे कृषि कार्य से जुड़े हैं. परंतु, झारखण्ड की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महज 14% है.

वर्तमान में, राज्य के लगभग 38 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से महज 25 हेक्टेयर भूमि पर ही खेती होती है जबकि सिंचाई के अभाव में शेष 13 एकड़ जमीन परती रह जाती है.

अगर सरकार छोटे छोटे तालाब, चेकडैम और नालों के माध्यम से पानी की पर्याप्त व्यवस्था करे, किसानों को सस्ते दर पर आधुनिक कृषि उपकरण उपलब्ध कराये तो कृषि क्षेत्र में जबरदस्त सुधार देखने को मिल सकता है.

कृषि के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन जैसे उद्योग अगले पांच सालों में किसानों की आय वृद्धि में कारगर साबित होंगे.

गाँवों के शेष 10% लोग लौह उपकरण, मिट्टी की बर्तन, बाँस और अन्य लकड़ी के सामान बनाने का परम्परागत व्यवसाय करते हैं. लेकिन, निजी कंपनियों की घुसपैठ और सरकारी उदासीनता की दोहरी मार ने परम्परागत उद्योगों को क्षति पहुंची है.

इन उद्योगों को सरकार द्वारा संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता है, ताकि इनसे जुड़े कारीगरों को रोजगार के अभाव में पलायन करना ना पड़े.

अब बात करते हैँ, खनिज संसाधनों की. देश के कुल खनिज संसाधनों का 40% हिस्सा झारखण्ड में है.

झारखण्ड सरकार को कोयला एवं अन्य खनिज उत्खनन से सालाना 3000 करोड़ का राजस्व प्राप्त होता है. आज सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए कोल ब्लॉकों की नीलामी की बात कर रही है. नीलामी होती है तो राज्य के बाहरी बड़ी-बड़ी कोल कंपनियों को उत्खनन का ठेका मिलेगा.

अगर सरकार नीलामी में ये शर्त जोड़ दे कि नीलामी के पहले से जो स्थानीय लोग उत्खनन कार्य में लगे हैँ, उन्हें संबंचित कंपनियों द्वारा नियमित किया जाएगा. इससे बड़े पैमाने पर स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा. खनन सिर्फ, राजस्व प्राप्ति ही नहीं, उद्योग रोजगार सृजन का भी एक महत्वपुर्ण स्रोत है.

झारखण्ड में खनन क्षेत्र में लगभग 50000 मज़दूरों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है, जिसमे सबसे ज्यादा 10000 मज़दूर कोयला उत्खनन से जुड़े हैं.

अगर अवैध खनन के आंकड़ों को शामिल करें, तो ये संख्या लगभग चार गुनी हो जाती है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि सबसे ज्यादा कोयला झारखण्ड से निकलता है, पर कोल इंडिया का मुख्यालय कोलकाता में हैं. जिसके कारण झारखंडीयों का रोजगार का हक छीनकर बाहरियों को दिया जा रहा है.

झारखण्ड सरकार को कोल इंडिया का मुख्यालय झारखण्ड में शिफ्ट करने की माँग करनी चाहिए. खनन क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने का एक और उपाय है कि जो कंपनियां झारखण्ड से कोयला, लोहा और अन्य खनिज संसाधन दूसरे प्रदेशों में ले जाते हैं, उन्हे रोका जाए. सभी कंपनियों को झारखण्ड में फैक्ट्रियाँ लगाने के लिए बाध्य किया जाए ताकि यहाँ के ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिले.
खनिज संसाधनों के बाद झारखण्ड की प्राकृतिक सम्पदा में दूसरा स्थान है, वनोत्पाद का.

वर्तमान में राज्य के 33.21% क्षेत्र में वन है जो कि राष्ट्रीय औसत से अधिक है। प्रदेश के जंगलों में लाह, तसर, महुआ, करंज, चिरौंजी जैसे वनोपज बहुतायत मिलते हैं जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती के केन्द्र हैं और रोजगार के विकल्प भी. तसर उत्पादन में झारखंड देश में पहले स्थान पर है और विश्व में दूसरे स्थान पर. वर्तमान में, राज्य में हर वर्ष लगभग 3000 मीट्रिक टन तसर का उत्पादन होता है. और लगभग 2.5 लाख लोगों को तसर उद्योग से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिला है.

इसी प्रकार, देश के 60% लाह का उत्पादन सिर्फ झारखण्ड में होता है और 30-40 हज़ार परिवार प्रत्यक्ष रूप से लाह उत्पादन से जुड़े हैं. परंतु, उत्पादन के अनुपात में प्रोसेसिंग यूनिट ना होने के कारण बड़े पैमाने पर कच्चे लाह की बिक्री दूसरे प्रदेशों में की जाती है.

अगर झारखण्ड के हर जिले में में लाह प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की जाए, तो इससे लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार मिलेगा. झारखण्ड सरकार महुआ, करंज, चिरौंजी जैसे वनोत्पाद के उत्पादन और प्रसंस्करण को प्रोत्साहित करे तो ये उत्पाद भी रोजगार और आय वृद्धि के उपयोगी विकल्प बन सकते हैं.

झारखण्ड में रोजगार सृजन और विकास में पर्यटन उद्योग का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
कुदरत ने झारखण्ड को असीम खूबसूरती से नवाजा है. एक तरफ हुँडरु फॉल, दशम फॉल, पंचघाघ, केलाघाघ जैसे प्राकृतिक झरने तो दूसरी तरफ पारसनाथ, नेतरहाट, त्रिकूट जैसे पर्वत- पहाड़। एक तरफ, हजारीबाग, बेतला दलमा और बिरसा जैविक अभ्यारण्य तो दूसरी तरफ जुबली पार्क, नक्षत्र वन, टैगोर हिल, रॉक गार्डन जैसे मानव निर्मित भ्रमणिय स्थल। साथ ही, प्रदेश में बाबा धाम, रामरेखा धाम, पहाड़ी मंदिर, दिउड़ी मंदिर, सूर्य मंदिर, इटखोरी मंदिर, जगन्नाथ मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों की भी भरमार है.

यही कारण है कि झारखण्ड में पर्यटन उद्योग तेजी से विकास कर रहा है। पर्यटन के क्षेत्र में लगभग 75 हज़ार लोगों को रोजगार मिला है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2018-19 में झारखण्ड में लगभग 3.5 लाख पर्यटक आये जिसमे 1.5 लाख विदेशी पर्यटक थे.

पर्यटकों की संख्या में दिनोंदिन इजाफा हो रहा है, परंतु कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश पर्यटन स्थल आज भी सरकारी उपेक्षा के शिकार है. रोड कनेक्टिविटी और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था न होने के कारण पर्यटक सुदूरवर्ती स्थलों में जाने से कतराते हैं.

अगर सरकार इन पर्यटन स्थलों के सौंदर्यीकरण और सुरक्षा पर ध्यान दें, तो पर्यटन उद्योग झारखण्ड के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकता है. कुल मिलाकर देखा जाए तो झारखंड की समृद्धि का द्वार खोलने और विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए राज्य में प्राकृतिक संसाधनों के पर्याप्त भंडार है. जरूरत है तो बस सरकार द्वारा झारखंडी जनता को भरोसे में लेकर ईमानदार प्रयास करने की. आज लॉक डाउन के कारण देश के कोने कोने से मजदूर अपने घर लौट रहे हैं. सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है इन्हे रोजगार उपलब्ध कराने की.

ऐसे समय में सरकार को विदेशी कंपनियों पर निर्भरता छोड़ स्थानीय उद्यमों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि राज्य के संसाधनों का समुचित उपयोग हो सके और झारखंड तथा झारखंडीयों को आत्मनिर्भर बनाया जा सके.

(लेखक अरूण कुमार पत्रकार रहे हैं और यह उनके स्‍वतंत्र विचार हैं)

1 Comment
  1. Arun Mahto says

    धन्यवाद।

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