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निर्मल दा के इस बड़े निर्णय से तेज हुआ था झारखंड आंदोलन

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Pradeep

Ranchi: झारखंड बने 18 साल बीत चुके हैं यानि हमारा झारखंड (Jharkhand) युवा और जवां हो चुका है. लेकिन युवा झारखंड के निर्माण के लिए हजारों युवाओं ने माटी के लिए अपना बलिदान दिया है. ऐसे ही एक महान योद्धा थे शहीद निर्मल महतो(Shahid Nirmal Mahto), जिन्होंने अलग राज्य की लड़ाई अलग तरीके से लड़ने का मास्‍टरप्लान बनाया और उसमें सफल भी हुए.

निर्मल महतो जेएमएम (JMM Leader Nirmal Mahto) के मशहूर नेता और जुझारू इंसान थे. ‘झारखंड आंदोलन’ की लड़ाई तेज करने के लिए उन्होंने क्रांतिरथ बनवाने का काम शुरू किया था. उस दौर में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनकी शव यात्रा में लगभग एक लाख लोग शरीक हुए थे. छोटानागपुर में ऐतिहासिक बंद और जमशेदपुर में भी तीन दिनों तक चक्का जाम था.

निर्मल महतो का जीवन परिचय

झारखंड अलग राज्य के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले और अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान देने वाले झारखंड के सच्चे और वीर सपूत निर्मल महतो का जन्म बिहार प्रदेश (तत्कालीन झारखखंड) के पूर्वी सिंहभूम जिले के जमशेदपुर स्थित उलियान गांव में 25 दिसंबर 1950 को हुआ था.

इनके पिता का नाम श्री जगबंधु महतो और माता का नाम श्रीमती प्रिया महतो था. जगबंधु महतो के आठ बेटे और एक बेटी थी. निर्मल महतो भईयों में दूसरे नंबर पर थे, जो बचपन में बहुत ही नटखट माने जाते थे.

आजीवन रहे अविवाहित

निर्मल महतो ने जमशेदपुर टाटा वर्कर्स यूनियन हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की थी तथा जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की थी. पिता के टिस्को की नौकरी से अवकाश प्राप्त कर लेने से, निर्मल महतो पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते थे और घर की आमदनी में योगदान देते थे. वे रंगोली बनाने में निपुण थे, इतने निपुण कि आस-पास की लड़कियां उनसे रंगोली बनाना सीखने के लिए आती थीं.

निर्मल महतो अंत तक बुरी आदतों के शिकार नहीं बने, जैसे, न बीड़ी-सिगरेट, न खैनी-गुड़ाखू, न दारू पीने का और ना ही किसी और तरह की कोई भी कुसंगती का. सदा हंसमुख चेहरा वाले कर्मठ निर्मल, कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी नहीं घबड़ाते थे. शांति पूर्वक तत्काल निर्णय लेना उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी. उनमें बचपन से नेतृत्वकारी गुण थे, वे आजीवन अविवाहित रहे उनमें कुछ कर गुजरने की ललक हमेशा रहती थी.

आजसू के संस्थापक थे निर्मल दा

निर्मल महतो छात्र जीवन से ही राजनीति में रूचि लेने लगे थे. 1975 में कुछ असामाजिक तत्वों से उन्हें मुठभेड़ भी करनी पड़ी और अपनी पढ़ाई उन्हें अधूरी छोड़नी पड़ी. इसके बाद छात्र आंदोलन का नेतृत्व करते हुए वे झारखण्ड आंदोलन में कूद पड़े.

अपना राजनीतिक जीवन उन्होंने झारखंड पार्टी से शुरू किया और एक जुझारू नेता के रूप में अपने आप को स्थापित किया. वे 1980 का बिहार विधानसभा चुनाव भी लड़े, लेकिन विजयी नहीं हुए. इसके बाद वे झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल हुए और क्षेत्र के साथ-साथ पूरे झारखंड में सूदखोरी और महाजनी प्रथा के खिलाफ लोगों को जागरूक करना शुरू किया.

उन्होंने लोगों को सामाजिक कुरितियों से दूर करने के लिए जनजागरण अभियान भी चलाया. इस दौरान उन्हें महसूस हुआ कि इसके लिए युवा शक्ति को अपने साथ जोड़ना होगा और इसी सोच के साथ उन्होंने जेएमएम के युवा विंग के रूप में साल 1986 में आजसू की स्थापना (Foundation of AJSU) की थी. जो आज की तारीख में आजसू पार्टी (AJSU Party) बन चुकी है और उसके नेतृत्वकर्ता सुदेश महतो (Sudesh Mahto) हैं.

8 अगस्त 1987 को टिस्को गेट हाउस के बाहर अनेक लोगों की मौजूदगी में दिनदहाड़े उनकी हत्या कर दी गयी.

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