Take a fresh look at your lifestyle.

झारखंड: पिछड़ा आरक्षण मुद्दे पर आजसू ने साधा जेएमएम पर निशाना

0

Ranchi: झारखंड राज्य में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का दायरा 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के लिए सबसे ज्यादा और संजीदगी से आजसू पार्टी ने आवाज उठाई है. पार्टी ने सड़कों पर आंदोलन किया है और विभिन्न मंचों से आवाज उठाने के साथ इस मुद्दे पर बहस को आगे बढ़ाया है. पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में ये शामिल है. इसके साथ ही आजसू पार्टी अनूसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के आरक्षण बढ़ाने की भी हिमायती रही है. यह बातें शुक्रवार को आजसू पार्टी के प्रधान महासचिव रामचंद्र सहिस ने मीडिया को संबोधित करते हुए कही.

बड़ी बातें

  • रामचंद्र सहिस बोले-आरक्षण बढ़ाने पर सबसे ज्यादा आजसू पार्टी मुखर रही
  • 73 प्रतिशत आरक्षण से ही सामाजिक न्याय की परिकल्पना साकार होगी
  • सामाजिक न्याय की लड़ाई पार्टी की विचारधारा है चुनावी नारा नहीं

हेमंत सोरेन बतायें चुनाव के पहले पिछड़ा आरक्षण की याद क्‍यों आई

रामचंद्र सहिस ने कहा कि पार्टी का मानना है कि राज्य में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन को यह बताना चाहिए कि ठीक चुनाव के वक्त इस मुद्दे की याद उन्हें कैसे आई. जबकि इससे पहले कभी उन्होंने पिछड़ा वर्ग की चिंता नहीं की और न ही किसी मंच से जेएमएम ने ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की वकालत की. झारखंड मुक्ति मोर्चा के इस शिगुफा से झारखंड की जनमानस वाकिफ है. इसलिए जेएमएम नेता को सार्वजनिक तौर पर यह भी बताना चाहिए कि पांच सालों से उन्होंने इसे कभी कोई मुद्दा क्यों नहीं समझा. कई बार झामुमो के नेता मुख्यमंत्री रहें है उस समय उन्हें जनता के मुद्दे याद नहीं रहते हैं. गलती से फाईल भी साईन कर देते हैं. जल जंगल जमीन की बात करने वाले को बताना चाहिए कि सीएनटी एसपीटी में छेड़-छाड का शुरूआत उनके द्वारा किया गया या नहीं. जनता अब उनके झांसे में आने वाली नहीं है.

आजसू के पास तर्क और तथ्य

उन्‍होंने मीडिया को बताया कि हमारी पार्टी ने तर्क और तथ्य के साथ इस मुद्दे पर सरकार का कई दफा ध्यान भी खींचा है. झारखंड में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है. एकीकृत बिहार में भी पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण हासिल था. अलग राज्य में उन्हें 14 फीसदी का भागीदार बना दिया गया है.

झारखंड सरकार द्वारा प्रकाशित असाधारण अंक संख्या 296, 29 नवम्बर 2001 को देखने पर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी. जिसमें झारखंड में पदों एवं सेवाओं में रिक्तियों में आरक्षण के विषय में संकल्प लिया गया है. आरक्षण के मसले पर साल 2001 में अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में मंत्रिमंडलीय उपसमिति का गठन किया गया था. इस उपसमिति में पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो भी शामिल थे.

सुदेश कुमार महतो की विशेष पहल पर मंत्रिमंडलीय उपसमिति ने राज्य में अनुसूचित जनजाति को 32, पिछड़ा वर्ग को 27 तथा अनुसूचित जाति को 14 फीसदी यानि कुल 73 फीसदी आरक्षण देने की अनुशंसा की थी. साल 2002 में झारखंड में 73 फीसदी आरक्षण को लेकर एक संकल्प जारी किया गया था. बाद में उसे झारखंड हाइकोर्ट में चुनौती दी गई. कोर्ट के आदेश के आलोक में सरकार ने सेवाओं की नियुक्तियों में 50 फीसदी आरक्षण सीमित रखने का निर्णय लिया. जबकि सरकार को शासनिक और न्यायिक स्तर पर इस मामले में पहल करनी चाहिए थी.

दूसरे कई राज्यों में मिल रहे हैं आरक्षण

तामिलनाड़ु, केरल, हरियाणा हिमाचलप्रदेश, आंधप्रदेश, बिहार समेत कई राज्यों में पिछड़ों को 30 से 50 प्रतिशत तक आरक्षण हासिल है. राज्य की सरकारें आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा सकती है.

हाल ही में छत्तीसगढ़ की सरकार ने आरक्षण का दायरा बढ़ाकर 82 प्रतिशत कर दिया है. अब छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति को 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 13 प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया है. आजसू पार्टी झारखंड में पिछड़ा वर्ग के लिए इसी पैर्टन पर आरक्षण बढ़ाने की मांग करती रही है.

आरक्षण के प्रतिशत के संदर्भ में इंदिरा साहनी बनाम युनियन ऑफ इंडिया में माननीय उच्चतम न्यायालय में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की गई थी. उसी निर्णय में यह भी कहा गया है कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक हो सकती है.

फिर वर्ष 2011 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाड़ु में आरक्षण के संबंध में कहा है कि यदि राज्य सरकार 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा से अधिक आरक्षण व्यवस्था लागू करना चाहती है तो राज्य सरकार का निर्णय परिमाणात्मक आंकड़ों पर आधारित होगा. झारखण्ड में उपरोक्त सारी प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद भी राज्य में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया गया.  

पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसा

झारखण्ड में पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा 2014 में ही पिछडों का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ा कर 27 प्रतिशत करने की अनुशंसा की जा चुकी है. पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी अनुशंसा में स्पष्ट रूप से कहा है कि झारखण्ड राज्य में पिछड़े वर्गों की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणीक स्थिति दयनीय है तथा सरकारी नौकरी में इनका प्रतिनिधित्व कम है.

मेधा सूची व निजी क्षेत्रों में भी न्याय हो

हमारी पार्टी इस बात की पक्षधर रही है कि मेधा सूची में पिछड़ा वर्ग के जो युवा आते हैं उन्हें कोटा में सीमित नहीं किया जाए. मेधा सूची में उपर रहने वालों को सामान्य श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए. इससे पिछड़ों का हक और उन्हें अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का मौका भी मिलेगा. साथ ही पार्टी ने पहले ही निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण लागू करने की वकालत की है.

गौरतलब है कि इसी साल 17 फरवरी को रांची में अखिल भारत पिछड़ा वर्ग सभा और आजसू पार्टी की इकाई अखिल झारखंड पिछड़ा वर्ग महासभा के बैनर तले राष्ट्रीय अधिवेशन सह प्रतिनिधि सम्मेलन का आयोजन किया गया था. 

उस सभा में देश भर से पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधि शामिल हुए थे. आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो ने मुख्य अतिथि के तौर पर भाग लेते हुए इस सम्मेलन में जोर दिया था कि आरक्षण सिर्फ आर्थिक नहीं प्रतिनिधित्व और भागीदारी का सवाल है. महज आर्थिक तानाबाना से जोड़कर इसे देखा जाना बड़ी आबादी के संवैधानिक हितों की अनदेखी है.

केंद्रीय सभा में पारित प्रस्ताव

इससे पहले फरवरी 2016 में कोडरमा में आयोजित पार्टी की केंद्रीय सभा की बैठक में झारखंड में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया गया है. पार्टी का पक्ष है कि राज्य में पिछड़ी जातियों की बादी लगभग 51 फीसदी है. जबकि अभी उन्हें 14 फीसदी आरक्षण प्राप्त है.

इसके बाद 17 दिसंबर को पार्टी के सहयोगी संगठन अखिल झारखंड पिछड़ा वर्ग के महासम्मेलन में भी पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग दोहराई गई.

इस महासम्मेलन में राज्य भर से पिछड़े प्रतिनिधि जुटे थे. पार्टी का मानना है कि यह समानता की लड़ाई से जुड़ा मसला है. आबादी के हिसाब से हिस्सेदारी मिलनी ही चाहिए. सामाजिक न्याय की लड़ाई पार्टी की विचारधारा है. जबकि झामुमो के लिए ये चुनावी नारा है.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More