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इंटरनेशनल मेंस डे: कौन कहता है कि मर्द को दर्द नहीं होता

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एक फिल्म का डायलॉग है कि मर्द को दर्द नहीं होता! लेकिन ये सच नहीं है, अगर किसी के भी शरीर में जान है तो उसे दर्द होना लाजमी है, बस फर्क इतना है कि कोई उस दर्द को जाहिर कर देता है तो कोई अपने अंदर ही समेट लेता है.

दरअसल आज हम इन बातों पर गौर इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज 19 नवम्बर है और हर साल इस तारीख को इंटरनेशनल मेंस डे यानि अंर्तराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है. इसलिए आज हम बात कर हैं पुरुषों की भावनाओ की! कई मायनों में पुरुष, महिलाओं से ज्यादा भावुक होते हैं. अपने अहम के कारण ही कई बार जिंदगी भर दर्द झेलते हैं और ऐसे ही किसी दर्द को गले लगा कर अपनी जिंदगी तक खत्म कर लेते हैं.

महिलाओं से ज्यादा पुरुष करते हैं आत्महत्या

अगर आपको पुरुषों का यह दर्द देखना है तो नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा 2014 की रिपोर्ट पर जाएं, जहां आंकड़े कहानी को साफ बयां कर रहे हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2014 में 30 साल तक के 27343 और 45 साल तक के 30659 पुरुषों ने सुसाइड किया. जबकि 30 साल की उम्र में महिलाओं के सुसाइड का आंकड़ा 17527 और 45 साल की उम्र की महिलाओं का आंकड़ा 11723 है.

‘इंटरनेशनल मेंस डे’ पर हमने आंकड़े देखे तो पाया कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष अधिक सुसाइड करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार देश में 30 से 45 साल के पुरुष सबसे ज्यादा सुसाइड करते हैं.

दर्द के बाद भी जल्दी रोते नहीं हैं पुरुष

आमतौर पर बचपन से ही पुरुषों को ताकतवर और निडर बनना सिखाया जाता है. इसलिए पुरुष अपनी फीलिंग किसी से कहने में हमेशा झिझक महसूस करते हैं. यही बड़ी वजह है कि पुरुष जल्दी रोते नहीं हैं. इन परिस्थितियों में अधिकतर पुरुष किसी बात को जब दिल से लगा लेते हैं, तब वे या तो एग्रेसिव होकर दूसरे को नुकसान पहुंचाते हैं या फिर मान सम्मान, प्रेम, प्रतिष्ठा और इमोशनल फीलिंग के चलते सुसाइड कर बैठते हैं.

महिला आयोग के तर्ज़ पर पुरुष आयोग बनाने की होती रही है मांग

हमारे समाज में पुरुष हिंसा की कल्पना बेमानी है. अक्सर हम घरेलू हिंसा और महिला सशक्तिकरण की बात तो करते ही रहते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि पुरुषों के साथ हिंसा नहीं होती. पुरुष भी कई प्रकार की हिंसा के शिकार होते हैं. कई बार पत्नी उन्हें कानून का डर दिखाकर उनका शोषण करती हैं. पिछले कई सालों से भारत में पुरुष अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार से महिला आयोग की तर्ज पर पुरुष आयोग और पुरुष विकास मंत्रालय बनाए जाने की मांग जोर पकड़ रही है.

पुरुषों के एक बड़ा तबका महिलाओं के फंडामेंटल राइट्स के तर्ज़ पर पुरुषों के अधिकारों के लिए पुरुष आयोग की मांग करता आया है. इन लोगों का मानना है कि पुरुष गलती करें तो उसे सजा दी जाए, लेकिन महिलाओं के लिए बनने वाले कानूनों का दुरुपयोग तत्काल प्रभाव से रोकना होगा, नहीं तो आने वाले समय में मेल एक्सप्लाइटेशन का रेट काफी हाई हो जाएगा. यदि हम आंकड़ों की बात करें तो महिलाओं से ज्यादा पुरुषों का सुसाइड रेट ज्यादा है. इस बात की पुष्टि नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो भी करता है.

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