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टुसू मेला में इनामी चौडल, मुर्गा लड़ाई और फुटबॉल खेल की रौनक

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Ranchi: जंगल-पहाड़, नदी-नाला और टुसू के रंग. छोटानागपुर से लेकर सिंहभूम तक मकर और टुसू की सतरंगी छटा बिखरी है. गांवों-कस्बों में मेले लग रहे हैं.

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सजे- धजे चौड़ल के साथ बारह मासे तेरह परब के गीत गूंज रहे हैं. नगाड़े-ढोल और बासुंरी के स्वर से पठारी नदियां हौले- हौले हिलोरें लेती नजर आती हैं.

झारखंडी पर्व-त्योहार, प्रकृति और मानव जीवन के बीच सामंजस्य जो स्थापित करते हैं. तभी तो इन अवसरों पर लोग सात रंग में रच-बस जाते हैं.

विविधताओं से भरे भारत देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से संक्रांति का पर्व मनाया जाता है. इसी मौके पर झारखंड का टुसू भी कई खासियत के साथ आया है. पंचपरगना, सिंहभूम से लेकर उत्तरी छोटानागपुर में उत्साह और उमंग के बीच टुसू मनाया जा रहा है.

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वैसे टुसू, बंगाल के कई ईलाके में भी धूमधाम से मनाया जा रहा है. झारखंड से लगने वाले बंगाल के पुरूलिया, बांकुड़ा, मेदिनीरपुर के इलाके में भी टुसू के गूंज सुनाई पड़ रहे हैं.

टुसू के गीतों के जरिए नारी जीवन की आशा-आकांक्षा, सुख-दुख की अभिव्यक्ति बड़ी आत्मीयता से की जाती है. जबकि टुसू की स्थापना कुंवारी लड़किया करती हैं और नदियों में इसका विसर्जन करने भी कुंआरी लड़कियां ही जाती हैं. विसर्जन के गीत मार्मिक और कारूण भाव से ओत- प्रोत होते हैं.

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इसके साथ ही रिश्ते-नाते के डोर बांधे जा रहे हैं. यह झारखंडी जीवन का उत्सव है. किसान जीवन के हर्षोल्लास का यही मौका है.

अगहन संक्रांति के दिन से शुरू होते इस पर्व को चौउड़ी, पूस परब, मकर परब, पीठा खावा परब के नाम से भी जाना जाता है.

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इस अवसर पर बनने वाले गुड़ पीठा का विशिष्ट स्थान है. पीठा की खुशबू कई दिनों से हवाओं में तैर रही है.

मकर संक्रांति के अवसर पर गांव-कस्बों में मेले का रंग अलग ही खूसबरत हैं. अलग-अलग जगहों पर कई खास आयोजन किए जा रहे हैं.

मुर्गा लड़ाई का चौसर भी जमता जा रहा है. आम से लेकर खास तक इसमें भागीदार बन रहे हैं. कई जगहों पर तीरंदाजी प्रतियोगिता की धूम है. इन आयोजनों में जीतने वालों को उपहार भी बड़े अनूठे ढंग से दिए जाते हैं.

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