शिव संगीत में ताण्‍डव तो कल्‍याण के लिए नीलकंठ का सावन में महत्‍व

by
Dr Om Prakash

फिल्म मिलन का वह गाना ‘श्रावण का महीना पवन करे शोर… जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर…’ आज भी हम सभी में एक ताजगी प्रदान करता है. श्रावण का महीना ही है वर्ष भर के विष ताप को शांत करने का. शिव में संगीत का ताण्डव भी है तो कल्याण के लिए नीलकंठ भी. वैद्यनाथ की पूजा मात्र से ही मंगल होने लगता है. 

अभी 25  जुलाई से श्रावण मास प्रारंभ हो गया है और 26 जुलाई को पहली सोमवारी के साथ चारों ओर बम भोले की गूंज सुनाई पड़ने लगी है, यानी शिव शंकर की उपासना का महीना है यह.

शिव का अर्थ ही है कल्याणकारी होना. शिव आशुतोष हैं जो शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं. भोलेनाथ हैं शिव जो पूजा अर्चना से प्रसन्न होकर ऐसे लोगों को भी वरदान दे देते हैं जो उन्हीं की जान के दुश्मन बन जाते हैं. भस्मासुर की ऐसी ही कथा लोक प्रचलित है, जब शिव से ही वरदान लेकर उन्हीं के प्राणों के पीछे पड़े भस्मासुर को मोहिनी का रूप लेकर विष्णु संहारते हैं वह शंकर जी को आफत से बचाते हैं.

शिव के इसी लोक कल्याणकारी रूप का कैसा अद्भुत गायन किया है लोक कवियों ने,

धन धन भोलेनाथ तुम्हारे कौड़ी नहीं खजाने में,

सारी वसुधा जग को सौंपी आप बसे वीराने में.

शिव महिमा अनंत है, वह भले ही सृष्टि के संहारक माने गए हैं लेकिन लोक कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहने वाले हैं. इसीलिए उन्हें महादेव कहा गया है. सावन के महीने की महिमा भी शिव के इसी लोक कल्याणकारी स्वरूप से जुड़ी है. श्री भागवत पुराण में कथा है कि देवासुर संग्राम के दौरान जब लगातार देवताओं की हार होती गई और राक्षस और सूरज विजई होते चले जा रहे थे तब चिंतातुर देवराज इंद्र को पराजय से उबरने का उपाय भगवान विष्णु ने समझाया. तदनुसार शेषनाथ की मथनी बना कर सुमेरु पर्वत से समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त होगा जिसे पीकर देवता अमर और विजयी होंगे. लेकिन समस्या थी कि समुद्र मंथन तो देवता और असुर दोनों करेंगे. मथनी को एक तरफ देवता घुमाएंगे और दूसरी तरफ राक्षस. जब अमृत निकलेगा तो अकेले ही देवताओं को वह कैसे मिलेगा, असुर भी मांगेंगे. परंतु विष्णु ने सोच रखा था कि वह अमृत केवल देवताओं को ही कैसे मिलेगा, यह कथा अलग, लेकिन जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमें से एक एक कर एरावत हाथी, लक्ष्मी, कल्पवृक्ष, उच्चैश्रवा घोड़ा ऐसे अमृत सहित 14 रत्न निकले. उसी में से निकला हलाहल विष. हलाहल विष के निकलते ही उसके अत्यधिक जहरीले प्रभाव से चारों ओर हाहाकार मच गया कि यदि भविष्य और थोड़ी देर यूं ही रखा रहा तो सृष्टि का विनाश हो जाएगा. प्रकृति, वनस्पति, जल, जीव सब मानो विनाश के कगार पर पहुंच गये.

एक बड़ी समस्या थी कि इस विष का पान कौन करें?

उसके विनाशकारी दुष्प्रभाव को झेल सके ऐसा कौन है?

तब शिव आगे आए और उस हलाहल गरल का पान किया लेकिन माता पार्वती ने उसे उनके कंठ यानी गले में रोक दिया. शिव नीलकंठ हो गए इसके प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया, लेकिन शिव ने स्वयं विष पीकर प्रकृति और जीव जगत को बचा लिया यही है शिव का लोक कल्याणकारी स्वरूप की स्वयं को संकट में डाल कर भी दूसरों की रक्षा करना भलाई करना यही शिव तत्व है.

शिव ने हलाहल तो पी लिया वह भले ही उनके कंठ में ठहरा हुआ था लेकिन उसके जहरीले असर से शिव बेचैन हो गए उनकी छटपटाहट बढ़ गयी बेसुध होने लगे तब विष्णु आदि समस्त देवों ने लगातार उन पर जल की धार छोड़ी, इस जलाभिषेक से शिव चैतन्य हुए और प्रकृति व सृष्टि पूर्ववत चलने लगीं. श्रावण मास शिव के उसी विस्ता को शांत करने का महीना है इसलिए चारों और शिव का पूजा का नाद गूंजता है और भक्तगण जल, दूध, शहद गन्ने के रस व गंगाजल आदि से शिव जी का अभिषेक करते हैं. इस उल्लास से खूब नाचते गाते हैं.

सावन के महीने में प्रकृति में भी यह उल्लास खूब छलकता देखा जा सकता है मानो हरियाली चुनर ओढ़ कर पूरी प्रकृति नाच उठी हो. शिव के विष-ताप को शांत करने के लिए मेघ भी सावन में खूब बरसते हैं. सावन जीवन की उमंग जगाने वाला महीना है चारों ओर सावन की बाहर है मेघों की फुहार है मानसून ने धरती धरती की तापी को शांत करना शुरू कर दिया है. श्रावण के हर सोमवार को तो मंदिरों में शिव के अभिषेक के लिए भक्तों की लंबी कतारें लग जाती है. श्रावण के सोमवार को शिव पूजा का विशेष महत्व है पूरा श्रावणमास ही शिव पूजा का पर्व है.

सावन में रिमझिम फुहारों के बीच खिलखिलाती हरियाली देखकर हर एक मन में मानो आनंद फूट पड़ता है. प्रकृति का यह मनोहारी और मंगलमय रूप ही शिव का स्वरूप है. इस समय शिव की पूजा कर उन्हें प्रसन्न करने और अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की चाह तो सबकी रहती है, लेकिन शिव की लोक कल्याणकारी भावनाओं को हम आत्मसात करें. इसके बिना पूजा अधूरी है प्रकृति तो शिव की अर्धांगिनी है. अपनी लालसा और सुविधाओं के लिए हम उसके अंग नोचने में भी संकोच नहीं करते. हमारी अभिलाषी लिप्साओं के शिकार होकर पहाड़ खिसक रहे, जंगल कट रहे हैं, नदियां सूख रही है, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, तो शिव प्रसन्न कैसे हो. इससे तो हम उनका क्रोध भड़का रहे हैं. जिसका हल्का सा रौद्र रूप हमने केदार घाटी की त्रासदी के रूप में देखा. अब तो धरती भी चाहे वह कंपीत होकर रोने लगती है. लोगों की सांसे अटक जाती है. हर बार कितने ही लोग अकाल मौत के शिकार होकर भूकंप की भेंट चढ़ जाते हैं. कोविड-19 महामारी भी शायद हम सभी के प्रकृति के प्रति अनादर भाव का ही एक रूप है.

शिव ने  जिस प्रकृति और जीव जगत की रक्षा के लिए विष पी लिया, हम जाने-अनजाने अपनी करतूतों से उसी को बर्बाद कर रहे हैं,तो शिव पूजा निरर्थक है. वह मात्र ढोंग है, इससे शिव प्रसन्न कैसे होंगे? चुने दूसरों की भलाई के लिए विष पी लिया लेकिन हम अपनी भलाई के लिए रोज ना जाने कितने को विष के घूंट पीने को मजबूर कर देते हैं.

हमारा मन और बुद्धि यदि दूसरों के प्रति कल्याणकारी और मंगलमय भावनाओं और कृत्यों से ओत-प्रोत ना हो तो हम खुद शिव की कृपा के पात्र कभी नहीं बन सकते. हम अपने स्वार्थ सुविधाओं और सेवाओं के वशीभूत प्रकृति इंसान और अन्य जीवो के दुश्मन बने रहेंगे, तो हम भी सुखी कभी नहीं होंगे और ना ही शिव हमारा कल्याण करेंगे. ऐसी शिव पूजा बेमानी है जिसमें हम शिवभक्त बनकर शंकर जी की पिंडी का तो अभिषेक करें लेकिन हमारे अंदर दूसरों के सुख चैन के प्रति ईर्ष्या द्वेष पलता रहे. शिव और प्रकृति दोनों जगत के कल्याण के लिए हैं और श्रावण मास उनका प्रतिरूप है या भाव जीवन में साकार हो तभी सावन में शिव पूजा की सार्थकता है.

(लेखक डॉ.ओम प्रकाश, रांची वीमेंस कॉलेज के बीएड विभाग में सहायक प्राध्‍यापक है)

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