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बिहार में प्राइवेट स्‍कूलों की फीस माफ हुई तो झारखंड में फैसला क्‍यों नहीं

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पिछले कुछ महीनों से COVID-19 के मद्देनजर झारखंड के शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो का प्राइवेट स्कूलों के 3 महीना फीस माफी मुद्दे पर प्रेस-मीडिया और सोशल मीडिया में काफी हो हल्ला चल रहा है, लेकिन आज तक कोई ठोस उपाय नहीं निकला और ना ही फीस माफ हुआ.

बेबसी और कमजोरी जैसे शब्दों से सरकार-प्रशासन नहीं चलते हैं, क्योंकि पड़ोसी राज्य बिहार में 2 महीने का स्कूल फीस पूर्ण रूप से माफ कर दिया है.

अब जरूरत है पहल करने की

झारखंड राज्य में जितने भी अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं जिनको सरकारी वेतन और भत्ता प्राप्त होता है, उनके बच्चों को राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे सरकारी स्कूल में भेजने की जरूरत है, जिससे सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में सुधार आएगी और प्राइवेट स्कूलों में भीड़ कम होगी.

सरकारी स्कूल में तो फीस और अन्य खर्चे भी नगण्य हैं.

मेरा झारखंड सरकार के शिक्षा मंत्री जी से आग्रह है कि प्राइवेट स्कूलों की फीस माफी का मामला अब छोड़िए और आदेश निकालने की कृपा करें कि तमाम राज्य के अधिकारियों और कर्मियों के लिए कि वे अपने बच्चों को झारखंड सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं विद्यालयों में नामांकन कराएं और शिक्षा उपलब्ध कराएं.

आखिर क्यों करोड़ों-करोड़ रुपए प्रति वर्ष शिक्षा के मद में खर्च होता है इन सरकारी स्कूलों के लिए?

सरकार की मंशा क्लियर होनी चाहिए अपने सभी नागरिकों के लिए ग्रामीण क्षेत्र और गरीबों के लिए अलग शिक्षा की व्यवस्था और अमीरों के लिए अलग शिक्षा की व्यवस्था से सामान शिक्षा स्तर बुरी तरह प्रभावित हुई है. सभी सरकारी स्कूल बंद कर दीजिए और शिक्षा मध्य में जितना खर्च होता है डायरेक्ट गरीबों को ट्रांसफर कर दीजिए उनके अकाउंट में ताकि हुए भी प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ा सकें

बहुत से प्राइवेट स्कूल अभी ऐसे हैं जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और केवल आत्मनिर्भरता और स्वालंबन के कारण वह लोग मोहल्ले में और किराए के मकानों में स्कूल चला रहे हैं उनकी फीस बहुत कम है. लेकिन मैंने भी सरकारी स्कूल और बड़े प्राइवेट स्कूलों के बीच पीसना पड़ता है

बहुत से प्राइवेट स्कूल अभी ऐसे हैं जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और केवल आत्मनिर्भरता और स्वालंबन के कारण वह लोग मोहल्ले में और किराए के मकानों में स्कूल चला रहे हैं उनकी फीस बहुत कम है लेकिन फिर भी इन्हें सरकारी स्कूल और बड़े प्राइवेट स्कूलों के बीच में पीसना पड़ता है.

(लेखक दीपेश कुमार निराला अधिवक्‍ता हैं और यह उनके स्‍वतंत्र विचार हैं)

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