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झारखंड में मानव तस्करी मामले में पांच साल में 395 एफआईआर, 226 तस्कर गिरफ्तार

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#RANCHI : झारखंड में मानव तस्करी मामले में पांच साल में 395 एफआईआर दर्ज किया गया है. सूत्रों के अनुसार पांच वर्ष में सिर्फ 1505 बच्चों को ही बरामद किया गया है. जबकि इन पांच वर्ष में 2789 बच्चे लापता हुए है.आज भी 1284 बच्चों का कोई अता पता नही है. 395 मामलों में केस दर्ज किया गया है. 154 पुरुष और 74 महिला मिलाकर 226 लोगों को तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. जबकि पांच- छह लोगों को ही अबतक सजा मिल पाई है. अन्य आरोपी को जमानत मिल गयी है. जिसमें कई लोग फिर से तस्करी का धंधा कर रहे है.

मानव तस्करी की काली दुनिया में पन्ना लाल, बाबा बामदेव, रोहित मुनी, प्रभा मुनि, सुरेश साहू, गायत्री साहू, पवन साहू व लता लकड़ा जैसे कई नाम कुख्यात हैं. इन बड़े तस्करों पर कानून की सख्ती जरूरी है. पशुओं की तरह इंसानों की खरीद-फरोख्त दिल्ली जैसे कई अन्य महानगरों में काम दिलाने की आड़ में सौदेबाजी करने वाली अनगिनत प्लेसमेंट एजेंसियों की मंडी सजी हुई है. जहां कानून को धत्ता बता कर इंसान को खुलेआम बेच दिया जाता हैं. झारखंड की सैकड़ों भोली-भाली मासूम आदिवासी बेटियां इस बाजार में नीलाम हो चुकी हैं.

कुछ बेटियां खुशनसीब निकलीं, जिन्हें पुलिस और एनजीओ की मदद से वापस सकुशल लाया जा सका है. वह आज खुली हवा में सांस लेकर अपने परिवार के साथ हैं, लेकिन मानव तस्करों के चंगुल में फंसी सैंकड़ों बेटियां आज भी लापता हैं.जिनका कोई सुराग नहीं. आज भी पुलिस-प्रशासन के सामने उन्हें मानव तस्करी के दलदल से सकुशल वापस लाने की चुनौती बरकरार है. मानव तस्करी के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बैद्यनाथ कुमार के अनुसार तस्करो के खिलाफ साक्ष्य नही होने के कारण आरोपी को जमानत मिल जाती है.

पीड़िता को पुलिस सुरक्षा नही दे पाती है. गरीब होने के कारण अच्छे वकील भी नही रख पाते है. कई बार पीड़िता कोर्ट में बयान देने में ही टूट जाती है. तस्करों की कमर तोड़ने के लिए कड़ी सजा पर जोर देना होगा, तभी इनका मनोबल गिरेगा.

मानव तस्करी पर नकेल कसने के लिए वर्ष 2011 में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) का गठन किया गया था. इसके तहत राज्य के आठ जिले गुमला नगर थाना, सिमडेगा नगर थाना, खूंटी नगर थाना, दुमका नगर थाना, रांची कोतवाली थाना, पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा सदर थाना, लोहरदगा सदर थाना व पलामू सदर थाने में एएचटीयू का गठन हुआ था. इसके गठित होने के बाद भी मानव तस्करी का धंधा फल-फूल रहा है. थाना में पुलिस काफी मशक्कत के बाद सिर्फ सनहा दर्ज कर खानापूर्ति करती है.कई मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती.

इस कारण पुलिस उनकी खोजबीन को लेकर गंभीरता नहीं दिखाती.हकीकत यह है कि राज्यभर से सैंकड़ों बच्चे-बच्चियां लापता हैं. घरवाले थाना के चक्कर लगा-लगाकर थक चुके हैं. उनकी आंखें इंतजार में पथरा गयी हैं, लेकिन अबतक उनका कोई सुराग नहीं है. राज्य में मानव तस्करी का मुख्य कारण गांवों में काफी बेरोजगारी और गरीबी है.

अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं है. अवसर सीमित हैं. ऐसे में परिवार के पेट की आग बुझाने के लिए काम तो चाहिए. मजबूरन अच्छे काम के झांसे में आकर बच्चे , युवा मानव तस्कर के चंगुल में फंस जाते हैं.

जानकार बताते हैं कि मानव तस्करी से बचने के लिए सरकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू हो और ग्रामीणों का कौशल विकास किया जाये तो हुनरमंद बनने के बाद बाहर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. सरकार कौशल विकास को लेकर सुदूर ग्रामीण इलाके में व्यापक अभियान चला रही है. अधिक से अधिक लोगों को हुनरमंद बनाकर सरकार की संवेदनशीलता, ग्रामीणों की जागरूकता, शासन-प्रशासन की गंभीरता और स्वयं सेवी संस्थाओं की सहभागिता तथा सामूहिक प्रयास से इस पर रोक संभव है.

एडीजी सीआईडी प्रशांत कुमार सिंह से शुक्रवार को संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि मानव तस्करी के शिकार बच्चों बच्चियों के सकुशल बरामदगी के लिए लगातार छापेमारी की जाती है. इस छापेमारी में कई बच्चों को सकुशल बरामद भी किया गया है.

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