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Exit Poll और Post Poll Survey कैसे होते हैं, क्या है सैंपल लेने की प्रक्रिया

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Exit Poll Live और Post Poll Survey अक्‍सर हम टीवी या अखबारों में बहुत ही आराम से देखते हैं. लेकिन इस एग्जिट पोल के पीछे कड़ी मेहनत होती है. एग्जिट पोल या सर्वे में सैंपल (Exit Poll Survey Sampling Process) लेने की प्रक्रिया काफी बोझिल होती है. सैंपलिंग को समझने से पहले हम एग्जिट पोल, पोस्ट पोल सर्वे और ओपिनियन पोल (Opinion Polls India) को जानना चाहिए.

क्या होते हैं एग्जिट पोल? (What is Exit Poll)

एग्जिट पोल के नतीजे (Exit Polls Results Live) हमेशा मतदान के आखिरी दिन ही जारी किए जाते हैं. हालांकि डेटा कलेक्शन जिस दिन वोटिंग होती है उस दिन भी किया जाता है. आखिरी फेस के वोटिंग के दिन जब मतदाता वोट डालकर निकल रहा होता है तब उससे पूछा जाता है कि उसने किसे वोट दिया. इस आधार पर किए गए सर्वेक्षण से जो व्यापक नतीजे निकाले जाते हैं. इसे ही एग्जिट पोल कहते हैं. आमतौर पर टीवी चैनल वोटिंग के आखिरी दिन एग्जिट पोल ही दिखाते हैं.

क्या होते हैं पोस्ट पोल? (What are Post Polls)

पोस्ट पोल एग्जिट के परिणाम ज्यादा सटीक होते हैं. एग्जिट पोल (Exit Polls) में सर्वे एजेंसी मतदान के तुरंत बाद मतदाता से राय जानकर मोटा-मोटा हिसाब लगा लेती हैं. जबकि पोस्ट पोल (Post Polls) हमेशा मतदान के अगले दिन या फिर एक-दो दिन बाद होते हैं.

Exit Poll क्या होते हैं, कैसे निकालते हैं आंकड़े

जैसे मान लीजिए 6वें चरण की वोटिंग 12 मई को हुई थी. तो सर्वे करने वाली एजेंसी मतदाताओं से 13, 14, या 15 मई तक इस चरण में वोट देने वाले मतदाताओं से उनकी राय जानने की कोशिश करें, तो इसे पोस्ट पोल कहा जाता है.

पोस्ट पोल क्यों होते हैं ज्यादा सटीक?

एग्जिट पोल में मतदाताओं के वोट देने के तुरंत बाद उनकी राय जानने की कोशिश की जाती है. सर्वे करने वाले लोग पोलिंग बूथ के बाहर ही ऐसा सर्वे करने करते हैं. इसलिए मतदाता अपनी पहचान छुपाते हुए हड़बड़ी में राय बता देते हैं जोकि जरूरी नहीं कि सही ही हो.

जबकि पोस्ट पोल में एक दिन बाद वोटर से बातचीत करके उसके मन को टटोलने की कोशिश की जाती है कि आखिर उसने किस प्रत्याशी को मत दिया है. इस दौरान वह किसी कंफ्यूजन में नहीं होता है और लगभग सही-सही राय बता देता है.

ओपिनियन पोल (About Opinion Poll)

ओपिनियन पोल एग्जिट पोल से अलग होते हैं (Opinion Poll and Exit Poll Difference). ओपिनियन पोल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पत्रकार, चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसियां करती हैं. इसके जरिए पत्रकार विभिन्न मसलों, मुद्दों और चुनावों में जनता की नब्ज टटोलने के लिए किया करते थे. श्रेय जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन सबसे पहले इसका इस्तेमाल किया था.

जानिए कैसे होती है पोल के लिए सैंपलिंग?

ओपियन पोल (Opinion Poll) तैयार करने में सबसे बड़ा काम फील्ड वर्क का होता है. इसकी सैंपलिंग के लिए चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसी कर्मचारी आम लोगों से मिलते हैं और कुछ सवाल पूछते हैं. कैंडिडेट अच्छा है या बुरा. इस आधार पर भी एक मोटा-मोटी राय जान ली जाती है.

वहीं इस प्रक्रिया में जिन लोगों को शामिल किया जाता है उन्हें एक फॉर्म भी भरने को दिया जाता है. फॉर्म को भरवाने की भी एक लंबी प्रक्रिया होती है. मतदाताओं की पहचान गुप्त रहे और वो बेझिझक आपनी राय दे दें. ऐसे में उनके लिए सीलबंद डिब्बा रखा जाता है. ताकि वे अपने पसंद के उम्मीदवार के बारे में भरा पर्चा उसमें डाल दें.

Exit Poll या Opinion Poll या Pre Poll या Post Poll, सबसे सटीक और भरोसेमंद क्‍या

ओपिनियन पोल में सबसे महत्वपूर्ण चीज सैंपलिंग होती है. सैंपलिंग का मतलब है कि किन लोगों से राय जानने की कोशिश की गई है या की जाएगी.

कैसे होती है सैंपलिंग, क्या है प्रक्रिया?

ओपिनियन पोल में सिर्फ कुछ लोगों की राय पर नतीजे नहीं निकाले जा सकते हैं. अलग-अलग राज्यों, विधान-सभाओं और क्षेत्र विशेष की सैंपलिंग के लिए मेथडोलॉजी अलग-अलग होगी. जैसे मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में सैंपलिंग का आधार अलग-अलग होगा. क्योंकि यूपी और बिहार में जिस व्यक्ति से उसकी राय जानने की कोशिश की जाएगी उस व्यक्ति के सामाजिक पृष्ठभूमि, जाति और धर्म का भी ध्यान रखना होगा.

अगर सोशल बैकग्राउंड, कास्ट और रिलिजन को ध्यान में रखकर सर्वे किया जाए तो 5000 के सैंपल साइज से भी सटीक निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है. जबकि मध्यप्रदेश में जातिगत वोटर्स की सैंपलिंग इससे इतर होगी. वहीं यूपी-बिहार में मुस्लिम और दलित बाहुल्य आबादी वाले क्षेत्रों में उनकी आबादी के प्रतिशत के हिसाब से रैंडम सैंपल लिया जाएगा.

क्या होती है रैंडम सैंपलिंग?

देश की बड़ी सर्वे एजेंसियां रैंडम सैंपलिंग का सहारा लेती हैं. इसमें सीट, बूथ स्तर पर और मतदाता स्तर पर रैंडम सैंपलिंग होती है. मान लीजिए किसी बूथ पर 2000 वोटर्स हैं. उसमें से 100 लोगों का इंटरव्यू करना है. तो ये 100 लोग रैंडम तरीके से शामिल किए जाएंगे. इसके लिए दो हजार का 100 से भाग दिया तो 20 बचा. इसके बाद वोटर लिस्ट में से कोई एक ऐसा नंबर रैंडम आधार पर लेंगे जो 20 से कम हो.

जैसे मान लीजिए आपने 12 लिया. तो वोटर लिस्ट में 12वें नंबर पर जो मतदाता होगा वो पहला सैंपलिंग कैंडिडेट होगा जिसका इंटरव्यू सर्वे एजेंसी करेगी. फिर उस संख्या 12 में 20, 20 ,20 जोड़ते जाते हैं और मतदाता का इंटरव्यू किया जाता है. ये होती रैंडम सैंपलिंग.

किन-किन माध्यमों से होती है सैंपलिंग?

ओपिनियन पोल जानने के लिए फील्ड के साथ ही अखबारों में भी एक फॉर्म दिया जाता था. जिसे भरकर लोग पते पर भेज देते थे. वक्त बदलने के साथ ही टेक्नोलॉजी बदलती गई और सैंपलिंग का तरीका भी थोड़ा-थोड़ा बदलते गया. कई सर्वे एजेंसियां अब फोन कॉल्स, एसएमएस ऑनलाइन भी सैंपलिंग करने लगी हैं.

हालांकि, भारत के संदर्भ में फोन कॉल सैंपलिंग बेहद कारगर नहीं क्योंकि इसके जरिए सही जानकारी मिले यह जरूरी नहीं. इसीलिए इंटरव्यू के आधार पर की गई सैंपलिंग कमोबेश सटीक परिणाम देती है.

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