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BBC की ग्राउंड रिपोर्ट: प्रयागराज में सुंदरीकरण के नाम पर ढहा दिए गए सैकड़ों मंदिर, मस्जिद और मज़ार

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“रात को बारह बजे के बाद अचानक पीएसी की कई गाड़ियां आईं, अधिकारी आए, पुलिस वाले थे ही. एक पुलिसवाला हमारे पास आया और बोला कि माताजी चाबी हमें दे दीजिए. उन्होंने ये भी कहा कि हमें क्षमा कीजिएगा. तभी हम समझ गए कि कुछ गड़बड़ होने वाला है. हम लोग भी मंदिर की ओर जाने लगे, लेकिन पुलिसवाले ज़बर्दस्ती रोक दिए. बुलडोज़र लगा कर सैकड़ों साल पुराना मंदिर प्रशासन ने गिरा दिया.”

कुस्मावती साहू छह महीने पहले की इस घटना को बताते-बताते रो पड़ती हैं. प्रयागराज के बैरहना मोहल्ले में अपनी छोटी सी किराने की दुकान के बाहर कुछ लोगों के साथ बैठी थीं.

कहने लगीं, “सालों से हम उस मंदिर की साफ़-सफ़ाई से लेकर पूजा-अर्चना, कीर्तन, जागरण, भंडारा कराते आ रहे हैं. मोहल्ले के सभी लोग और बाहर से भी तमाम लोग यहां दर्शन करने आते थे. हम लोगों ने अधिकारियों और पुलिसवालों से कितनी विनती की, लेकिन वो लोग ज़रा भी रहम नहीं खाए.”

बैरहना चौराहा प्रयागराज शहर के काफ़ी पुराने और व्यस्त चौराहों में से एक है. चौराहे से एक सड़क मेला क्षेत्र की ओर जाती है और बाक़ी तीन सड़कें शहर के अलग-अलग हिस्सों की ओर. इसी चौराहे के एक कोने पर काली देवी का एक प्राचीन मंदिर था जिसे इसी साल जून महीने में प्रशासन ने गिरा दिया.

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अब वहां मंदिर की निशानी के नाम पर सिर्फ़ पीपल का पेड़ बचा है, वो भी कब तक रहेगा, पता नहीं. मंदिर को तोड़कर वो जगह सड़क के हवाले कर दी गई. सड़क भी चौड़ी हो गई, पूरा चौराहा भी चौड़ा हो गया, चौराहे के सुंदरीकरण का काम तेज़ी से चल रहा है लेकिन मोहल्ले वालों के मुताबिक़, उनके मोहल्ले की पहचान चली गई.

बुज़ुर्गों का दर्द

बैरहना के ही रहने वाले सत्तर साल के बुज़ुर्ग राम कुमार कहते हैं, “हमारे दादा जी के बचपन से ये मंदिर था. आप समझ सकते हैं कि कितना पुराना रहा होगा. चालीस साल तो हमारे दादा जी को दिवंगत हुए ही हो गए. बैरहना ही नहीं, बल्कि शहर के प्राचीन और सिद्ध मंदिरों में से एक था ये.”

प्रयागराज में स्मार्ट सिटी योजना और अगले साल जनवरी से शुरू होने वाले कुंभ मेले की वजह से पूरे शहर में सुंदरीकरण का काम हो रहा है. इसके लिए सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है और उसी क्रम में सड़कों के किनारे आने वाले पेड़ों और मकानों के अलावा मंदिर, मस्जिद और मज़ार भी तोड़े जा रहे हैं. तेलियरगंज, बैरहना, दारागंज, सिविल लाइंस, हिम्मतगंज, ख़ुल्दाबाद समेत मुख्य मार्गों पर स्थित शायद ही कोई मोहल्ला हो जहां धर्म स्थल न ढहाए गए हों.

इनकी संख्या क्या है? प्रशासन और इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के पास कोई पुख़्ता आंकड़ा नहीं है, लेकिन शहर के लोगों की मानें तो इनकी संख्या सैकड़ों में है और ज़िले के अधिकारी भी अनाधिकारिक रूप से इस संख्या को ढाई सौ के आस-पास बताते हैं.

इन मंदिरों में कई काफी प्राचीन और लोगों के बीच अगाध धार्मिक मान्यता वाले मंदिर भी शामिल थे. बैरहना का काली मंदिर और राजरूपपुर का शिव मंदिर भी उसमें शामिल है. ये सभी निर्माण सरकारी ज़मीन पर थे और इस बात से स्थानीय लोग भी इनकार नहीं करते हैं, लेकिन लोगों का कहना है कि उसे सही तरीक़े से हटाया जाता, लोगों को विश्वास में लेकर हटाया जाता और उसके लिए कहीं वैकल्पिक जगह दे दी जाती तो ठीक था.

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दारागंज स्थित एक संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉक्टर बाबूलाल मिश्र कहते हैं कि जिस तरह से मंदिर की स्थापना का शास्त्रीय विधान है, उसी प्रकार मंदिर को हटाने या विसर्जित करने का भी विधान है. उनके मुताबिक, “जिस तरह से प्राण प्रतिष्ठा करके मूर्तियां मंदिर में रखी जाती हैं, उसी प्रकार उन्हें विसर्जित करने का भी विधान है. सरकार को कम से कम लोगों की आस्था का सम्मान करते हुए, विद्वानों से परामर्श करके शास्त्रीय विधान के तहत इन्हें हटाया गया होता तो अच्छा रहता.”

डॉक्टर बाबूलाल का कहना है कि इससे तो साफ़ संकेत गया कि ऐसा करने वालों की न तो मंदिर-मस्जिद में आस्था है और न ही इनके प्रति आस्था रखने वालों के साथ उनकी कोई हमदर्दी है.

इन इलाक़ों से जब ये मंदिर हटाए गए थे तो उनका जमकर विरोध हुआ था लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी इसके विरोध में ही हैं. हीवेट रोड पर रहने वाले रोशन कुमार कहते हैं, “भाई देखिए, जब शहर को सुंदर बनाना है, तो सड़क चौड़ी होगी ही और उसके लिए मंदिर हो या मस्जिद, तोड़-फोड़ भी होगी. आख़िर मस्जिदें भी तो तोड़ी गई हैं, सिर्फ़ मंदिर ही थोड़े न टूटे हैं.”

हालांकि इस बात को लेकर लोगों में कुछ आक्रोश ज़रूर है कि जिस तादाद में मंदिर तोड़े गए, उस हिसाब से मस्जिद या मज़ार में तोड़-फोड़ नहीं की गई. सिविल लाइंस में दूर संचार के डीजीएम दफ़्तर के बगल में सड़क पर स्थित मस्जिद और कानपुर रोड पर ऐसी ही एक मस्जिद को लोग नज़ीर के तौर पर दिखाते हैं. लेकिन शहर की तमाम प्रमुख सड़कों पर आने वाली कई मज़ारें ज़रूर अब इतिहास का हिस्सा हो चुकी हैं.

क्या कहता है प्रशासन

इलाहाबाद विकास प्राधिकरण यानी एडीए के उपाध्यक्ष बीसी गोस्वामी मंदिरों की तोड़-फोड़ पर किसी भी सवाल का जवाब देने से बचते हैं. उनसे इस बारे में जो भी सवाल हमने पूछा, जवाब लगभग एक था, “हमने जो भी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की है, नियमों के मुताबिक की है और लोगों की सहमति से की है. लोगों ने विरोध ज़रूर किया लेकिन फिर स्थानीय लोग सहमत हो गए.”

जहां तक स्थानीय लोगों का सवाल है तो बातचीत से साफ़ पता चलता है कि जो ग़ुस्सा उनके भीतर मंदिर ध्वस्त किए जाने के वक़्त था, वो आज भी बरक़रार है. दारागंज के रहने वाले सुनील तिवारी कहते हैं, “यहां निराला गली में एक ही रात में कम से कम दस मंदिर गिराए गए. यही नहीं, मंदिरों को गिराने की ज़्यादातर कार्रवाई रात में ही हुई ताकि विरोध न हो लेकिन लोगों ने फिर भी जमकर विरोध किया.”

सुनील तिवारी की बात का समर्थन आस-पास जुटे सभी लोग करते हैं. लोगों का कहना है कि प्रशासन की इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ लोगों ने लंबे समय तक घेराव, प्रदर्शन और नारेबाज़ी की बकौल राम कुमार, “प्रशासन की सख़्ती के आगे सब दब गया. प्रशासन तय कर चुका था कि उसे मंदिर गिराने हैं, इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े. तो आप ही बताइए, जान किसे प्यारी नहीं है ?”

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सिविल लाइंस बस अड्डे के पास स्थित एक मस्जिद के बाहर की मज़ार को ढहाने में भी प्रशासन को नाकों चने चबाने पड़े लेकिन जब वहां मौजूद कुछ लोगों से हमने बात की तो शहर के सुंदरीकरण के नाम पर ऐसा होने पर उन्हें ऐतराज़ नहीं था. वहां मौजूद आसिफ़ हुसैन का कहना था कि जब मंदिर और मस्जिद दोनों टूट रहे हैं तो किसी को क्यों आपत्ति होगी ?

बैरहना स्थित काली मंदिर की पुजारी कुस्मावती साहू का कहना है कि प्रशासन और इलाहाबाद की मेयर ने उन्हें मंदिर के लिए पास की जगह देने का आश्वासन ज़रूर दिया है लेकिन उन्हें इसकी उम्मीद कम ही है. फ़िलहाल मंदिर की जगह पर पुलिस चौकी बना दी गई है और मंदिर की मूर्तियां कहां गईं, किसी को पता नहीं.

इलाहाबाद के बीजेपी सांसद यूं तो शहर भर में चल रही तोड़-फोड़ की कार्रवाई और प्रशासन के रवैये की आलोचना करते हैं लेकिन मंदिरों के तोड़े जाने पर उन्हें न तो कोई आपत्ति है और न ही विरोध करने वालों से कोई हमदर्दी. उनका कहना है कि ज़्यादातर मंदिर सड़कों के किनारे ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने के इरादे से बनाए गए थे.

गिराने से पहले लोगों से राय ली गई या नहीं ली गई, इस बारे में उनकी टिप्पणी भी कम दिलचस्प नहीं है. वो कहते हैं, “जब मंदिर को बनाने से पहले बनाने वालों ने नहीं पूछा तो गिराने से पहले गिराने वाले भला क्यों पूछेंगे?”

साभार: बीबीसी

 

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