दुमका के प्रफुल पतवा ने कहा- झारखंड आंदोलनकारियों को भूल गए हैं मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन

Ranchi: प्रफुल पतवा दुमका के जरमुंडी प्रखंड के रहने वाले हैं. उन्‍होंने बताया कि वह साल 1977 से झारखंड अलग राज्‍य के आंदोलन से जुटे हुए हैं. तब वह छात्र थे. आदिवासी कॉलेज में पढ़ते थे और आंदोलन भी करते थे.

प्रफुल पतवा ने खास बातचीत में बतया कि उनके क्षेत्र में महाजनी प्रथा जोरों पर था. इसमें वह भी फंसे हुए थे. पूरा खानदान बरबाद हो गया था. चाहते थे कि किसी तरह से शिबू सोरेन महाजनी प्रथा हटवा देते हैं तो नया जीवन हो जाएगा. आंदोलन की लड़ाई की पेंशन के लिए नहीं लड़ी गई थी. 1977 से साल 1996 तक कई सरकारें आईं, हमारे लड़ाई के दौरान उन्‍होंने हमें सिर्फ आश्‍वासन दिया. लालू यादव कहते थे झारखंड हमारी लाश पर अलग होगा. बावजूद इसके हमारा आंदोलन बंद नहीं हुआ, जारी रहा.

झारखंड राज्‍य 15 नवंबर साल 2000 को अलग हो गया. उसके बाद हमें एक नई उम्‍मीद जगी. हम बहुत खुश थे. उसी दौरान और दो राज्‍य भी अलग हुए थे छत्‍तीसगढ़ और उत्‍तराखंड. यहां आंदोलनकारियों को हक और सम्‍मान देने के लिए आज तीनों राज्‍य का तीन अलग-अलग नियमावली है. झारखंड में चार कैटेगरी में नियमवाली बना हुआ है. जबकि उत्‍तराखंड और छत्‍तीसगढ़ में एक ही केटेगरी बना हुआ है. वहां अलग राज्‍य के आंदोलनकारियों की पहचान जिला और पंचायत स्‍तर पर होता है. लेकिन झारखंड में जो जेल गये हैं उन्‍हीं लोगों की पहचान होगी.

धूल फांक रही है 56 हजार आंदोलनकारियों का आवेदन

उन्‍होंने कहा कि अभी झारखंड सरकार जेल जाने वाले 4000 आंदोलनकारियों को सिर्फ 4 हजार रुपये महीना पेंशन दे रही है. यहां सिर्फ 4000 अज्ञात आंदोलनकारियों का चिन्हितीकरण हुआ है. जबकि 65 हजार आवेदन जमा हुए हैं. सरकार के पास अभी भी 56 हजार आवेदन आंदोलनकारियों के हक और सम्‍मान के लिए धूल फांक रही है.

आज झारखंड के 20 साल के दौरान एक दर्जन से ज्‍यादा मुख्‍यमंत्री बने. एक भी मुख्‍यमंत्री को शर्म नहीं आया कि झारखंड के आंदोलनकारियों के हक और सम्‍मान की बातें पूरी करें.

भिखारी के बराबर भी पेंशन नहीं

इसी झारखंड में आईएएस, आईपीएस, सांसद, विधायक, मंत्री को 50 हजार रुपये से ज्‍यादा पेंशन दिया जाता है. वहीं दूसरी ओर झारखंड अलग राज्‍य की लड़ाई लड़ने वाले आंदोलनकारियों को सिर्फ 4000 रुपये दिया जाता है. पेंशन की ये राशि एक भिखारी के कमाई के बराबर है.

उन्‍होंने कहा कि मौजूदा मुख्‍मंत्री हेमंत सोरेन को झारखंड आंदोलन जरूर याद होगा. उनके पिता शिबू सोरेन भी राज्‍य के मुख्‍यमंत्री रह चुके हैं. झारखंड आंदोलन के अगुआ थे. ऐसे में मौजूदा सीएम को ये बातें याद होना चाहिए. हमने ही उन्‍हें चुनाव जीताकर मुख्‍यमंत्री बनाया है. अगर वो सबके बारे में सोचते हैं तो सभी आंदोलनकारियों को एक कैटगरी में रखते हुए हक और सम्‍मान देने का काम करें.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.