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झारखंड में पहले चरण की वोटिंग आज शुरू, 13 सीटों पर कांटे की टक्कर

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189 उम्मीदवार मैदान में, 38 लाख लोग करेंगे इनकी तकदीर का फैसला

Ranchi: झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए पहले चरण की 13 सीटों पर 30 नवंबर को मतदान है. इसमें 189 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. 37 लाख, 83 हजार, 55 वोटर अपने मतदान का इस्तेमाल कर अपना विधायक चुनने के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं. यहा भाजपा और विपक्षी गठबंधन में सीधी टक्कर है तो कुछ पर त्रिकोणीय तो कहीं चतुष्कोणीय मुकाबला भी है. प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का अलग-अलग समीकरण है. मुद्दे भी अलग तरह के हैं और प्रचार के हथकंडे भी. भाजपा ने जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, मनोज तिवारी और रवि किशन सहित स्टार प्रचारकों की फौज उतार दी, कांग्रेस, झामुमो, झाविमो के खेवनहार एक-दो ही दिख रहे हैं. अब 23 दिसंबर को स्पष्ट होगा कि इन 13 सीटों पर जनता ने अपने-अपने क्षेत्र में किस-किस पर भरोसा जताया है.

डालटेनगंज में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है. यहां दोनों दलों ने अपना-अपना कार्ड खेला है. यहां के भाजपा उम्मीदवार आलोक चौरसिया ने पिछला चुनाव झाविमो के टिकट पर जीता था लेकिन इसबार कमल खिला रहे हैं. उनके पक्ष में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई स्टार प्रचारक अपना जलवा बिखेर चुके हैं. इससे उनकी स्थिति सुधरी भी है. साथ ही पिछड़ों के वोटों के ध्रुवीकरण का भरपूर प्रयास हुआ है. इसके बावजूद झाविमो के डॉ. राहुल अग्रवाल इसमें सेंध लगाते नजर आ रहे हैं और वो इसमें कुछ हद तक सफल ही होते दिख रहे हैं, लेकिन इसका प्रतिशत आंकना मुश्किल है. कांग्रेस के केएन त्रिपाठी को इस सभी परिस्थितियों का सामना करते हुए भाजपा के चक्रव्यूह को भेदना है. इसके साथ ही भाजपा के संजय सिंह भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं. अब देखना है कि ऊंट किस करवट बैठता है.   

विश्रामपुर विधानसभा सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला है. यहां से स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी भाजपा के उम्मीदवार हैं. कांग्रेस से दिग्गज चंद्रशेखर दूबे उर्फ ददई दूबे हैं लेकिन उनके बेटे अजय दूबे की मौत के बाद मिल रही सहानुभूति को झाविमो, बसपा और ओवैसी की पार्टी निष्क्रिय करने में लगी है. भाजपा उम्मीदवार रामचंद्र चंद्रवंशी इन्हीं दलों की सेंधमारी करने के चक्कर में है. झाविमो की अंजू सिंह पिछले विधानसभा चुनाव में भी दूसरे नंबर पर थी लेकिन उन्हीं के परिवार के नरेश सिंह भी चुनाव मैदान में हैं. ऐसी स्थिति में अगड़ी जातियों के वोट इन दोनों के साथ ही कांग्रेस में बंटते दिख रहे हैं. उस स्थिति में भाजपा के रामचंद्र चंद्रवंशी को फायदा पहुंच सकता है. इसके अलवा ओबीसी के ब्रह्मदेव प्रसाद (बीडी प्रसाद) जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन बीडी प्रसाद पर पिछड़े वर्ग के लोग कितना विश्वास जताते हैं यह समय के गर्भ में है.   

हुसैनाबाद में बहुकोणीय मुकाबले के कारण वोटों के विभाजन से नतीजा निकलेगा. जो प्रत्याशी अपने आधार मतों को बटोरने में कामयाब होगा, सफलता उसी के हाथ लगने की उम्मीद है. हुसैनाबाद में राजपूत जाति से दो मुख्य उम्मीदवार हैं, एनसीपी के कमलेश कुमार सिंह और निर्दलीय विनोद कुमार सिंह. भाजपा का समर्थन मिलने के बाद निर्दलीय विनोद की स्थिति में तेजी सुधारी है. अब वे फाइट में हैं. इसके अलावा वहां बसपा से शेर अली हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 30 हजार है. साथ ही बसपा के पारंपरिक वोटर भी हैं. ऐसी स्थिति में शेर अली भी कमजोर नहीं दिख रहे हैं. इसके साथ ही हुसैनाबाद विधानसभा क्षेत्र में कुशवाहा समाज के वोटर भी निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन इस समाज से भी दो उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं. एक वर्तमान विधायक शिवपूजन मेहता जो आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और दूसरे झाविमो से वीरेंद्र कुशवाहा. इस सबसे अलग विपक्षी गठबंधन से राजद उम्मीदवार संजय सिंह भी पूर्व विधायक हैं. क्षेत्र में इनकी पकड़ मजबूत है. खासकर ओबीसी में. अब वोटों का विभाजन तय करेगा कि इन सभी में मजबूती के साथ कौन उभरता है.

भवनाथपुर में कांग्रेस, भाजपा, बसपा के त्रिकोण का चौथा कोण निर्दलीय अनंत प्रताप देव हैं. देव नगर उंटारी स्टेट के हैं और विधायक भी रह चुके हैं. भवनाथपुर में भाजपा का अब तक कभी खाता नहीं खुला है, भानुप्रताप शाही के लिए यह बड़ी चुनौती है. लेकिन इन सभी बातों से इतर भाजपा से टिकट कटने के बाद अनंत प्रताप देव के साथ क्षेत्र के लोगों की सहानुभूति हो गई है. उनके ऩामांकन में भी भीड़ हुई थी लेकिन भाजपा ने स्टार प्रचारकों की फौज उतारकर क्षेत्र की फिजां बदलने का प्रयास किया है. लोगों का मानना है कि भाजपा के भानु की स्थिति अच्छी है लेकिन अब 30 नवंबर को भी अपनी मुहर लगाकर मतदाता बतायेंगे कि उनका नंबर वन चहेता कौन है. वैसे कांग्रेस के केपी यादव और झाविमो के विजय केसरी भी चुनाव मैदान में हैं. जनता उन्हें कितना आंकती है यह तो समय बताएगा.

गढ़वा में भाजपा और झामुमो की सीधी लड़ाई है, लेकिन ओवैसी की पार्टी जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. भाजपा के सत्येंद्र सिंह के पक्ष में चुनाव प्रचार करने आये अमित शाह ने सभा में संतोषजनक भीड़ नहीं देखकर खुले मंच से कहा कि इतनी भीड़ से आप लोग सत्येंद्र तिवारी को कैसे विधायक बनायेंगे. आपलोग अपने स्तर से फोन करके लोगों को वोट करने के लिए कहें. भाजपा अध्यक्ष की यह लाइन वहां की स्थिति बताने के लिए काफी है. इसके साथ ही भाजपा के एक नेता अपने जातीय वोट को झामुमो के पक्ष में शिफ्ट करने के लिए प्रयासरत हैं, ऐसा वहां के लोगों का कहना है. ऐसी स्थिति में झामुमो का पलड़ा भारी हो जाये तो कोई बड़ी बात नहीं. इसके अलावा झाविमो के सूरज गुप्ता और जदयू के डॉ. पतंजलि केशरी किसका समीकरण बिगाड़ते और बनाते हैं, यह 23 दिसंबर को मतगणना के दिन ही पता चलेगा.

पाटन-छतरपुर विधानसभा क्षेत्र में बहुकोणीय मुकाबला है. यहां पुराने चेहरे ही मैदान में हैं. बस पार्टियां बदल ली हैं. जो अपनों के साथ किसी दूसरे को जोड़ लेगा, जीत उसी की होगी क्योंकि यहां जातीय समीकरण बिखर गया है. यहां भाजपा की पुष्पा देवी चुनाव मैदान में हैं. उनके पति मनोज भुइयां राजद के सांसद रह चुके हैं. पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने के मामले के वे आरोपी रह चुके हैं. दूसरी तरफ पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर विधायक राधाकृष्ण किशोर भी ताल ठोंक रहे हैं. उन्हें इसबार भाजपा ने टिकट नहीं दिया. नतीजा हुआ कि वे आजसू की शरण में चले गये और टिकट लेकर चुनाव में मैदान में कूद पड़े. उनकी स्थिति में तेजी से सुधार भी हुआ है. लेकिन पूर्व मंत्री व जदयू उम्मीदवार सुधा चौधरी और झाविमो के धर्मेंद्र बादल भी कुछ कम नजर नहीं आ रहे हैं.

पांकी विधानसभा सीट पर भाजपा और कांग्रेस में सीधी मुकाबला है. देवेंद्र सिंह उर्फ बिट्टू सिंह पांकी से कांग्रेस उम्मीदवार हैं. वर्तमान में विधायक हैं. टक्कर भाजपा के डॉ. शशिभूषण मेहता से ही है. मेहता लगातार चार बार से विधानसभा चुनाव हारते रहे हैं, लेकिन इस बार भाजपा से बेड़ा पार लगाने की जुगत में हैं. इसके अलावा झाविमो से रूद्र शुक्ला भी भाग्य आजमा रहे हैं, लेकिन वोटों के गणित में सामाजिक केमेस्ट्री कुछ बदलती दिख रही है. निर्दलीय मुमताज खान अगर मुस्लिम समाज का वोट लेने में सफल होते हैं तो कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब होगा और भाजपा के लिए प्लस प्वाइंट. दूसरी तरह दलीय आधार से ऊपर उठकर पिछड़ों की एकजुटता भी भाजपा को फायदा पहुंचाते दिख रही है. ऐसी स्थिति में डॉ. शशिभूषण कांग्रेस के देवेंद्र सिंह पर भार पड़ सकते हैं.

मनिका में भाजपा ने नया चेहरा रघुपाल सिंह को उतारा है तो पुराने उम्मीदवार रामचंद्र सिंह ने नया सिंबल थामा है. वे कांग्रेस के उम्मीदवार हैं. दोनों के बीच कांटे का संघर्ष है. यहां गठबंधन के वोट ट्रांसफर की परख होगी. जदयू से बुद्धेश्वर उरांव और माले से राजेंद्र सिंह भी ताल ठोंक रहे हैं लेकिन सीधी टक्कर भाजपा और कांग्रेस में ही है.

लातेहार में भी प्रत्याशियों के झंडा बदलने से चुनाव दिलचस्प हो गया है. झाविमो से कुछ दिनों पहले ही भाजपा में आये प्रकाश राम को पार्टी ने टिकट दिया है. वहीं झामुमो ने पुराने भाजपाई बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है. 2009 में भी प्रकाश राम और बैजनाथ राम आमने-सामने थे. बड़े ही कम अंतर से फैसला हुआ था. कमोबेश वैसी ही स्थिति इसबार भी है. दोनों के बीच कांटे की लड़ाई है. वैसे अमन कुमार भोक्ता झाविमो और फूलचंद गंझू जदयू के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे हैं.

चतरा में 9 उम्मीदवार मैदान में हैं. भाजपा से जनार्दन पासवान चुनाव लड़ रहे हैं. विपक्षी गठबंधन के तहत राजद को यह सीट मिली है और राजद ने सत्यानंद भोक्ता को टिकट दिया है. मजेदार बात है कि जनार्दन पहले राजद में थे और सत्यानंद भोक्ता भाजपा में. टक्कर भी इन्हीं दोनों में है. यहां देखना दिलचस्प होगा कि लोकसभा की लाख पार वाली मार्जिन भाजपा इसे कितना मेंटेन कर पाती है.

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोहरदगा विधानसभा सीट पर उम्मीदवारों का दलबदल, भाजपा-आजसू गठजोड़ में दिखने वाली दरार और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामेश्वर उरांव की मैदान में मौजूदगी ने त्रिकोणीय संघर्ष बना दिया है. कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत इसबार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा के साथ ही पारंपरिक सरना वोटर उनकी जान हैं, लेकिन कांग्रेस और आजसू की भी उसपर नजर है. उप चुनाव को छोड़कर यहां जीत-हार का अंतर काफी कम रहने का इतिहास है. इसकी पुनरावृत्ति की उम्मीद है. इस सीट से झाविमो के पवन तिग्गा चुनाव लड़ रहे हैं.

गुमला विधानसभा सीट भी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. यहां गजब संयोग रहा है. लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस को बढ़त मिलती है पर विधानसभा चुनाव में भाजपा बाजी मार लेती है. गुमला से इसबार भाजपा ने अपना उम्मीदवार बदल दिया है. वर्तमान विधायक शिवशंकर उरांव का टिकट काटकर पार्टी ने युवा मिसिर कुजूर को उम्मीदवार बनाया है. यहां झामुमो के भूषण तिर्की से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बैकग्राउंड वाले भाजपा उम्मीदवार मिसिर कुजूर की सीधी टक्कर है. हालांकि झाविमो से राजनीति तिग्गा और भाकपा के विश्वनाथ उरांव भी भाग्य आजमा रहे हैं. 

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित बिशुनपुर में झामुमो के चमरा लिंडा हैट्रिक बनाने के लिए चुनाव मैदान में हैं. भाजपा ने अशोक उरांव को अपना उम्मीदवार बनाया है. झारखंड विकास मोर्चा से महात्मा उरांव चुनवा लड़ रहे हैं. इस विधानसभा सीट पर लड़ाई त्रिकोणीय है.

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