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ग्लोबल फूड समिट से नहीं बदलते किसानों के दिन

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Ranchi: मोमेंटम झारखंड के बाद ग्लोबल फूड समिट की सार्थकता पर सवाल उठने लगे हैं. आजसू के केंद्रीय अध्यक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश कुमार महतो ने कहा है कि राजधानी के खेलगांव में ग्लोबल फूड समिट करने से कोल्हान या संताल में दूरदराज के गांवों के सपने साकार नहीं होते. किसानों की जरूरत, प्राथमिकता और परेशानी जानने के लिए खेत-टांड़ में बैठकर साझा संवााद करना होगा. उनकी रोजमर्रे की जिंदगी से रू ब रू होना पड़ेगा.

मंगलवार को उन्होंने कोल्हान के मंझगाव में स्वराज स्वाभिमान किसान सभा की. किसानों के बीच उन्होंने कहा कि देश-दुनिया से बड़ी कंपनियों और पूंजी निवेशकों की झारखंड में लगातार दिलचस्पी के मतलब समझे जा सकते हैं. ये कंपनी वाले और उनके अधिकारी, प्रतिनिधि पठारों- जंगलों नदी- नालों की दूरिया नापें, तो पता चलेगा कि झारखंड में किसान और नौजवान चाहते क्या हैं. अलबत्ता सरकारें इसे समझने के लिए तैयारनहीं है कि कारखाने के बूते झारखंड की सूरत नहीं बदली जा सकती.

सरकार की प्राथमिकताएं झारखंडी विचारधारा नहीं

उन्होंने कहा कि कई किस्म के समिट के नाम पर झारखंड की प्राथमिकताएं बदली जा रही हैं और गांव- पंचायत को सत्ता में भागीदारी से दूर किया जा रहा है. क्या किसानों,रैयतों और खेतिहर मजदूरों ने कभी सरकार के सामने ये इच्छा जताई थी कि फूड और एग्रीकल्चर समिट किए जाने चाहिए. सरकार की ये प्राथमिकता झारखंडी विचारधारा से मेल नहीं खाती. यहां योजनाएं थोपी जाती रही है.

झारखंड में किसानों के सपने क्या हैं. मौलिक जरूरतें क्या है इसे सरकार और सिस्टम समझने के लिए तैयार नहीं है. जबकि दूसरे राज्यों और देश को आधार मानकर झारखंड की बेबसी दूर नहीं की जा सकती. सरकार और सिस्टम झारखंड को झारखंड ही रहने दे, तो ज्यादा अच्छा.

सरकार को समझना होगा कि किसानों के बड़े सपने यही होते हैं कि साल भर का अनाज पैदा हो, जमीन सुरक्षित रहे. बाजार उपलब्ध हो और संकट के समय तत्काल मदद मिल जाए. घर- परिवार को लेकर उनके सपने होते हैं कि बच्चे पढ़ जाएं बेटियों की खुशी से हाथ पीले हो जाएं. आर्थिक परिस्थियां ठीक हो जाएं. तो क्या ग्लोबल समिट इन सपनों को पूरा करने की गारंटी ले सकता है.

पलायन कर रहे खेतीहर मजदूर

इस साल सूखे से राज्य का बड़ा हिस्सा परेशान है. किसानों को तत्काल मदद मिले इसके लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं. राज्य के अलग-अलग इलाके में किसानों की अलग-अलग परेशानी है. कहीं कर्ज चुकाने का दबाव है, तो कहीं बीज खाद का टोटा है. इन्ही परेशानियों के बीच किसान और खेतिहर मजदूर पलायन करने को विवश होता है.

उन्होंने कहा कि झारखंड की धरती के नीचे अपार खनिज संपदा है. देश- दुनिया की यहां नजरें लगी हैं. सैकड़ो मील दूर बैठे बड़ी कंपनियों के मालिक, अधिकारी को पता चल जाता है कि सांरडा की धरती के नीचे लौह अयस्क और तमाड़ के परासी में सोना है. लेकिन उन्हें यह नहीं पता रहता कि मंझगांव और तांतनगर के किसानों की क्या दशा है. उनके सपने क्या हैं.

इसलिए किसान और रैयत अपनी जमीन बचायें और आवाज बड़ी करें. इससे भी ज्यादा जरूरी है कि राजनीति करने वालों के बीच सिर्फ अपने और जमीनी विषय पर बात करें. नौकरशाही के सामने याचक बनने के बजाय अधिकार और हक की बात करें. किसान, नौजवान जब बोलेगा, तो राजधानी और सचिवालय भी डोलेगा.

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