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लोकतंत्र के एनकाउंटर का संविधान

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  • नाम-गुरमित , उम्र – 25 बरस , केस – 7, एनकाउंटर की तारीख-31 मार्च
    2017, एनकाउंटर की जगह-बलिया.
  • नाम -नौशाद उर्फ डैनी , उम्र 30 बरस , केस -19 , एनकाउंटर की तारीख-29
    जुलाई 2017, जगह-शामली.
  • नाम -सरवर , उम्र -28 बरस , केस -8,एनकाउंटर की तारीख-29 जुलाई 2017 ,
    एनकाउंटर की जगह-शामली.
  • नाम – इकरम उर्फ तोला, उम्र-40 बरस , केस-11, एनकाउंटर की तारीख-10 अग्सत
    2017, जगह-शामली.
  • नाम – नदीम , उम्र -33 बरस , केस-12, एनकाउंटर की तारीख- 8 सितबंर 2017,
    एनकाउंटर की जगह-मुज्जफरनगर.
  • नाम – शमशाद , उम्र-37 बरस, केस-36, एनकाउंटर की तारीख- 11 सितबंर 2017,
    एनकाउंटर की जगह-सहारनपुर.
  • नाम-जान मोहम्मद , उम्र -35 बरस. केस -10 , एनकाउंटर की तारीख -17
    सितंबर 2017, एनकाउंटर की जगह-खतौली.
  • नाम – फुरकान, उम्र -36 बरस , केस-38 , एनकाउंटर की तारीख -22 सितंबर
    2017 , एनकाउंटर की जगह -मुज्जफरनगर.
  • नाम-मंसूर , उम्र 35 बरस , केस-25,एनकाउंटर की की तारीख – 27 सितंबर
    2017, एनकाउंटर की जगह – मेरठ.
  • नाम- वसीम काला , उम्र 20 बरस , केस-6, एनकाउंटर की तारीख -28 सितंबर
    2017, एनकाउंटर की जगह – मेरठ.
  • नाम-विकास उर्फ खुजली , उम्र-22 बरस , केस 11, एनकाउंटर की तारीख-28
    सितंबर 2017, जगह-अलीगढ.
  • नाम- सुमित गुर्जर, उम्र – 27 बरस , केस-0, एनकाउंटर की तारीख-3 अक्टूबर
    2017, एनकाउंटर की जगह-ग्रेटर नोएडा.
  • नाम-रमजानी,उम्र-18 बरस, केस-18,एनकाउंटर की तारीख-8 दिसबंर 2017,
    एनकाउंटर की जगह-अलीगढ.
  • नाम-नीर मोहम्मद, उम्र-28बरस , केस-18, एनकाउंटर की तारीख-30 दिसबंर
    2017, एनकाउंटर की जगह-मेरठ.
  • नाम-शमीम, उम्र-27 बरस , केस-27, एनकाउंटर की तारीख-30 दिसबंर 2017,
    एनकाउंटर की जगह-मुज्जफरनगर.
  • नाम-शब्बीर, उम्र-3 बरस2, केस – 20, एनकाउंटर की तारीख-2 जनवरी 2018,
    एनकाउंटर की जगह-शामली.
  • नाम-बग्गा सिंह, उम्र-40 बरस, केस-17, एनकाउंटर की तारीख–17 जनवरी 2018,
    एनकाउंटर की जगह-लखीमपुर खीरी.
  • नाम-मुकेश राजभर, उम्र-32 बरस, केस – 8, एनकाउंटर की तारीख-26 जनवरी
    2018, एनकाउंटर की जगह-आजमगढ.
  • नाम-अकबर, उम्र-27बरस , केस-10, एनकाउंटर की तारीख-3 फरवरी 2018,
    एनकाउंटर की जगह-शामली.
  • नाम-विकास, उम्र-36 बरस ,केस-6 , एनकाउंटर की तारीख-6 फरवरी 2018 ,
    एनकाउंटर की जगह-मुज्जफरनगर.
  • नाम-रेहान , उम्र 18 बरस , केस-13, एनकाउंटर की तारीख-3 मई 2018,
    एनकाउंटर की जगह – मुज्जफरनगर.

ये यूपी की योगी सरकार में पुलिस एनकाउंटर में मारे गये 21 अपराधियों का कच्चा चिट्टा है. सीएम ने निर्देश दिया और पुलिस ने खोज खोज कर उन अपराधियों को निशाने पर लिया जिन्हें ना लिया जाता तो शायद अपराध और बढ़ जाते. क्योंकि हर एनकाउंटर के बाद सीनियर पुलिस अधिकारियों ने पुलिसकर्मियों की पीठ थपथपायी. और सीएम ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की.

हालांकि इस पूरी फेहरिस्त में सिर्फ एक अपराधी सुमित गुर्जर ऐसा नाम है, जिसके खिलाफ एक भी एफआईआर पुलिस थाने में दर्ज नहीं है यानी कोई केस पहले से चल भी नहीं रहा था. लेकिन एनकाउंटर के बाद वोटर आई कार्ड से नाम की जानकारी मिली और फिर पुलिस ने सुमित गुर्जर को पोंटी चड्डा के दो कर्मचारियों की हत्या में संलग्न करार दे दिया. पर इसके अलावा हर मारे गये अपराधी पर 6 से 27 केस तक दर्ज थे.

तो जाहिर है पुलिस ने अपना काम किया. पर अगला सवाल योगी सरकार में शामिल मंत्रियों का है. जिनमें किसपर कितने अपराधिक केस चल रहे हैं, ये देखना -समझना जरुरी है. क्योंकि एनकाउंटर उन्ही का हुआ जिनपर मुकदमे दर्ज हैं और पुलिस का तर्क भी यही रहा कि नामजद अपराधियो को वह पकड़ने गई तो उन्होंने भागने की कोशिश की. किसी ने फायरिंग भर कर दी तो एनकाउंटर हो गया. तो योगी सरकार की मंत्रियों का हाल देखते है. चुनाव लड़ते वक्त चुनाव आयोग को सौपे गये हलफनामे में जिन मुकदमों का जिक्र इन मंत्रियों ने किया उसे ही एशोसियशन फार डेमोक्रेटिक राइट यानी एडीआर ने संकलित किया है.

इसी तरह उत्तर प्रदेश इलेक्शन वाच ने भी रिपोर्ट तैयार की. और इन्ही की रिपोर्ट जो साफ तौर पर बताती है कि कि दागी मंत्रियों की कमी नहीं है. जरा नामो पर गौर करें.

  • केशव प्रसाद मोर्य- उपमुख्यमंत्री , कुल केस-11, आईपीसी की गंभीर 15 धारायें.
  • नंद गोपाल गुप्ता नंदी–कैबिनेट मंत्री, कुल केस -7, आईपीसी की 10 गंभीर धारायें
  • सत्यपाल सिंह बघेल, कैबिनेट मंत्री , कुल केस -7, आईपीसी की 10 गंभीर धाराएं
  • दारा सिंह चौहान, कैबिनेट मंत्री , कुल केस -2, आईपीसी की 7 गंभीर धाराये.
  • सूर्यप्रताप शाही , कैबिनेट मंत्री, कुल केस-3, आईपीसी की 5 गंभीर धाराएं.
  • ओमप्रकाश राजभर, कैबिनेट मंत्री, कुल केस 1, आईपीसी की गंभीर 2 धाराएं.
  • स्वामी प्रसाद मोर्य, कैबिनेट मंत्री , कुल केस-1 , आईपीसी की गंभीर 2 धारायें.
  • रीता जोशी , कैबिनेट मंत्री, कुल केस 2, आईपीसी की गंभाीर एक धारा
  • आशुतोष टंडन, कैबिनेट मंत्री , कुल केस-1,आईपीसी की एक गंभीर घारा.
  • ब्रजेश पाठक, कैबिनेट मंत्री, कुल केस 1, आईपीसी की 3 गंभीर धारायें.
  • उपेन्द्र तिवारी , राज्य मंत्री , कुल केस-6 , आईपीसी की गंभीर 6 धारायें.
  • सुरेश कुमार राणा , राज्य मंत्री, कुल केस-4, आईपीसी की गंभीर 6 धारायें.
  • भूपेन्द्र चौधरी , राज्य मंत्री , कुल केस – 2,आईपीसी की गंभीर 2 धारायें.
  • गिरिश चन्द्र यादव , राज्यमंत्री , कुल केस- 1, आईपीसी की 4 गंभीर धारायें.
  • मनोहर लाल, राज्यमंत्री, कुल केस-1, आईपीसी की 3 गंभीर धारायें.
  • अनिल राजभर, राज्यमंत्री , कुल केस – 2, आईपीसी की एक गंभीर धारा.

वैसे सीएम बनने से पहले तक सांसद योगी आदित्यनाथ पर भी तीन मुकदमे थे. उन पर भी आईपीसी ती 7 घारायें थीं. पर सीएम बनने के बाद कैबिनेट निर्णय से सारे मामले खत्म हो गये. उसके बाद बहुतेरे मामलो में भी सरकार ने राजनीतिक मामले करार देते हुये अदालतों को काम से बचा लिया.

लेकिन चुनाव लडते वक्त दिये गये हलफनामे में जिन अपराधों का जिक्र चुने हुये नुमाइन्दों ने किया उसमें दागी मंत्रियों की फेरहिस्त साफ बताती है कि दस कैबिनेट स्तर के मंत्री तो छह राज्यस्तर के मंत्री जो दागदार है उनपर आईपीसी की वह धाराये लगी हुई है जिन्हे गंभीर अपराध के तौर पर माना जाता है. और गंभीर अपराध का मतलब है. सजा मिलेगी तो कम से कम 5 बरस जेल में गुजारना होगा. और जिन अपराधो की फेरहिस्त में हत्या , अपहरण , बलात्कार , से लेकर राज्य को राजस्व का चुना लगाना और करप्शन एक्ट से लेकर पीपुल्स रिपजेन्टेशन एक्ट तक के खिलाफ कार्रवाई दर्ज है और ज्यादातर गैर जमानती है.

यानी इलेक्शन वाच की रिपोर्ट के मुताबिक योगी के मंत्रिमंडल में 45 फीसदी मंत्री दागदार है. जिनपर आपराधिक मामले दर्ज है. यानी जिस वक्त राज्य के अपराधियो पर नकेल कसने की बैठक हुई होगी तो कैबिनेट ने ही इसे पास किया और उसमें भी कई चुने हुए नुमाइन्दे खुद कई आपराधिक मामलों में फंसे हुये है. अगर मंत्रियों से इतर यूपी में चुने गये कुल 403 नुमाइन्दों पर नजर डाले तो 140 विधायक ऐसे है जो दागी है या कहे जिनपर आपराधिक मामले
चल रहे है.

तो क्या योगी सरकार ने सही निर्णय लिया कि राज्य में वैसे अपराधी जिनपर आईपीसी की गंभीर धाराये दर्ज हैं, उनके खिलाफ एनकाउंटर का आदेश दे दिया गया.जिससे आने वाले वक्त में वह राजनीति में ना आ जाये. यानी राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिये अपराधियो का चुनाव लडने से पहले ही एनकाउंटर जरुरी है. या फिर जो दागी या कहे आपराधिक मामलो के दाग लेकर जनता के नुमाइन्दे बन गये उन्हे विशेषाधिकार मिल गया कि वह पुलिस प्रशासन को इस काम में लगा दे कि कोई आपराधी राजनीतिक तौर पर मजबूत ना हो.

यानी जिस तरह यूपी में एनकाउंटर को लेकर मायावती और अखिलेश यादव ने आरोप लगाये कि कि राजनीतिक प्रतिद्वन्दी को खत्म करने के लिये इनकाउटर कराये जा रहे है तो उसका अगला सच तो यह भी है कि देश में ना तो कोई ऐसा राज्य है ना कि किसी राज्य में कोई मंत्रिमंडल जहा के विधायक मंत्री दागी ना हो. या कहे गंभीर आपराधिक मामलो के केस जिनपर दर्ज ना हो.

एडीआर और नेशनल अलेक्शन वाच की रिपोर्ट की माने तो जिस संसद को देश का कानून बनाने का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट को भी आखिर में किसी निर्णय के मद्देनजर संसद की तरफ ही देखना पड़ता है, उसी ससंद के भीतर लोकसभा में 543 में से 185 सासंद दागी है. यानी करप्शन या आपराधिक मामले उनके खिलाफ दर्ज है.

इसी तरह राज्यसभा के भी 40 सांसद ऐसे है जो दागी है. तो ये सवाल हो सकता है कि आखिर कैसे वह सांसद देश में भ्रष्टाचार या राजनीति में अपराध को लेकर चिंतन मनन भी कर सकते है जो खुद दागदार है. क्योकि याद किजिये प्रधानमंत्री बनने के ठीक बाद दागी सांसदो को लेकर खुद प्रधनमंत्री मोदी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पहले भाषण में ही दागी सांसदों को लेकर जैसे ही यह सवाल छेड़ा कि फास्ट ट्रैक अदालतो के जरीये साल भर में दागी सांसदों के मामले निपटाये जायें.

वैसे ही पहला सवाल यही उठा कि कही मोदी ने बर्रे के छत्ते में हाथ तो नहीं डाल दिया. क्योकि जो सवाल बीते दो दशक से संसद अपनी ही लाल-हरे कारपेट तले दबाता रहा उसे खुले तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ने एक ऐसे सिक्के की तरह उछाल दिया जिसमें अब चित यापट होनी ही है. क्योंकि मौजूदा लोकसभा में 185 सांसद दागदार हैं. और यह तादाद बीते दस बरस में सबसे ज्यादा है.

याद कीजिये तो 2004 में यानी १४वी लोकसभा में 150 सांसद दागी थे. तो १५ वी लोकसभा यानी 2009 में 158 सांसद दागी थे. लेकिन बीते दस बरस में यानी मनमोहन सिंह सरकार के वक्त दागी सांसदों का मामला उठा जरुर लेकिन सरकार गिरे नहीं इसलिये चैक एंड बैलेसं तले हर बार दागी सांसदो की बात संसद में ही आयी गयी हो गयी.

और तो और आपराधी राजनेता आसानी से चुनाव जीत सकते है इसलिये खुले तौर पर टिकट बांटने में किसी भी राजनीतिक दल ने कोताही नहीं बरती और चुनाव आयोग के बार बार यह कहने को भी नजर्अंदाज कर दिया गया कि आपराधिक मामलों में फंसे राजनेताओ को टिकट ही ना दें.

यहा तक की मनमोहन सिंह के 10 बरस के कार्यकाल में लोकसभा में तीन बार और राज्यसभा में 5 बार दागी सांसदों को लेकर मामला उठा. लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. वजह यही मानी गई कि सरकार गठबंधन की है तो कार्वाई करने पर सरकार ही ना गिर जाये. यानी सवाल तीन स्तर पर है.

पहला , यूपी में अपराधियो का एनकाउंटर राजनीतिक मंशा के साथ भविष्य की राजनीति साधने के लिये आपराधिक मामलो में फंसे सत्ताधारी ही तो नहीं उठा रहे है.

दूसरा , तमाम राज्यो में सत्ता तक पहुंचने के लिये पहले अपराधी का इस्तेमाल होता था अब अपराधी ही चुनाव लडकर विधायकी का विषेशाधिकार पा भी लेते है और फिर खुले तौर पर अपराध भी करते है. मसलन यूपी में उन्नाव रेप कांड में बीजेपी विधायक सेंगर पर राज्य सरकार हाथ डाल नहीं पाती. तो मामला सीबीआई के पास जाता है. पर पुलिस मुख्य गवाह युसुफ को भी बचा नहीं पाती उसकी हत्या हो जाती है.

इसी तरह बिहार में मुज्जफरपुर बालिकागृह कांड भी सीबीआई के पास जाता है क्योंकि सत्ताधारी विधायक-मंत्री इसमें फंसते है. और फिर मुज्जफरपुर कांड से जुडी खबरो तक को छाापने पर रोक राज्य सरकार लगा देती है. और तीसरा सवाल सीधे मोदी सरकार से जुडा है. क्योकि एक तरफ दागी सांसदो को लेकर वह बैचेनी दिखाते है दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के पांच बार कहने पर भी बीते चार बरस में खुद के उपर निगरानी रखने के लिये लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाते है.

यानी सवाल यह नहीं है कि अपराधियो की धरपकड की जाये. फास्ट ट्रेक कौर्ट में मामले को लाया जाये. या फिर इनकाउटर कर दिया जाये. सवाल ये है कि जब सत्ता चलाने वालो में ही अपराधियो की भरमार हो. यानी दर्ज आपराधिक मामले ही अपराधी होने का पैमाना है तो फिर सत्ताधारी को कैसे कानून बनाने का अधिकार दिया जा सकता है अगर उसके खिलाफ भी मामले दर्ज है. तो या फिर अपराधियों के लिये चुनाव लडकर सत्ता में आने की प्रक्रिया ही लोकतंत्र हो चुका है. या अपराध से बचकर अपने राजनीतिक आपराधिक दुशमनो को ठिकाने लगाना ही सिस्टम है.

तो फिर चुनावी प्रकिया का मतलब है क्या. और कानून बनाने वाली संसद हो या विधानसभा इसके मतलब मायने बचेगें कब तक. और उपरी तौर पर जब ये सब नजर आ रहा है तो देश में जिले या पंचायत स्तर पर क्या हाल होगा इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है. इसी बरस मद्यप्रदेश में म्यूनिसिपल इलेक्शन हुये.

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 16 फिसदी उम्मीदवारो ने हलफनामें में लिखा में उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप दर्ज है. यानी एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था ही बनती जा रही है जहांं आपराधिक होना चुनावी लोकतंत्र का राग सबसे मजबूती से गाना सरीखा हो गया है. और आपराधियो की जगह लोकतंत्र का ही एनकाउंटर आपराधिक तंत्र कर रहा है जो खुद को जनता का नुमाइन्दा बताता है.

लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद या विधानसभा में बैठकर कानून बनाता है. एडीआऱ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सासंद और विधायकों की एक लंबी फेरहिस्त है जिनपर अपहरण का आरोप दर्ज है. इसमें बीजेपी के 16 सासंद/विधायक है. तो कांग्रेस के छह सासंद विधायक हैं, जिनपर अपरहण का केस दर्ज है. और देश भर में अलग अलग पार्टियो के कुल 64 से ज्यादा सांसद/विधायक है जिनपर अपहरण सरीखे मामले दर्ज है.

महिलाओ के हक के सवाल या उनके उत्पीडन को लेकर सांसदो और विधायको का आलम ये है कि 48 सांसद/विधायक ऐसे है जिनके खिलाफ महिला उत्पीडन का मामला दर्ज है. और इस अपराध में बलात्कार से लेकर लडकी बेचने तक के आरोप है. यानी ये कल्पना के परे है कि अपराध मुक्त की जगह कैसे अपराधयुक्त लोकतंत्र बनाया जा रहा है. समाज को उसी अनसार ढाला जा रहा है. क्योकि जब लोकतंत्र या संविधान भी चुनी हुई सत्ता के सामने बेमानी हो चला है तो फिर चुने हुये नुमाइन्दो पर लगे दाग कैसा समाज या देश गढ पायेगें ये सोचना तो होगा. क्योकि मौजूदा वक्त में चौखंम्भा राज के तहत परखे तो लोकसभा-राज्यसभा में 786 सांसद. तमाम विधानसभाओं में 4120 विधायक. देश में 633 जिला पंचायतो में 15 ,581 सदस्य. ढाई लाख ग्रामसभा में 26 लाख सदस्य यानी सवा सौ करोड़ के देश में 26,20,487 लोग ही राजनीति सत्ता की होड गांव से लुटियन्स की दिल्ली तक छाये हुये है. और इसमें से 50 फिसदी दागी है. 36 फीसदी गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी है.

सिर्फ संसद और देश की विधानसभाओं में बैठ कर देश चलाने वाले कुल 4896 में से 1580 ने तो अपने हलफनामे में लिखकर दिया है कि उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज है. यानी सवाल बढते अपराधों का नहीं बल्कि लोकतंत्र के नाम पर अपराध को आश्रय देने का है.

टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से साभार

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