सरहुल कब मनाया जाता है, आदिवासियों के इस पारंपरिक त्‍योहार की पूरी जानकारी

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सरहुल दो शब्दों से बना है. सर और हूल. सर मतलब सरई या सखुआ फूल. हूल यानी क्रांति. इस तरह सखुआ फूलों की क्रांति को सरहुल कहा गया. मुंडारी, संथाली और हो-भाषा में सरहुल को ‘बा’ या ‘बाहा पोरोब’, खड़िया में ‘जांकोर’, कुड़ुख में ‘खद्दी’ या ‘खेखेल बेंजा’, नागपुरी, पंचपरगनिया, खोरठा और कुरमाली भाषा में इस पर्व को ‘सरहुल’ कहा जाता है.

सरहुल त्योहार धरती माता को समर्पित है.  इस त्योहार के दौरान प्रकृति की पूजा की जाती है. आदिवासियों का मानना ​​है कि इस त्योहार को मनाए जाने के बाद ही नई फसल का उपयोग शुरू किया जा सकता है. चूंकि यह पर्व रबी (Rabi) की फसल कटने के साथ ही शुरू हो जाता है, इसलिए इसे नए वर्ष के आगमन के रूप में भी मनाया जाता है.

सरहुल पूजा शुरू होने से पहले पाहन या पुजारी को उपवास करना होता है. वो सुबह की पूजा करते हैं. इसके बाद पाहन घर-घर जाकर जल और फूल वितरित करते हैं. घरों में फूल देकर पाहन ये संदेश देते हैं कि फूल खिल गए हैं, इसलिए फल की प्राप्ति निश्चित है. खुशी और उल्लास के इस त्योहार में गांव के सभी आदिवासी इकट्ठा होकर मांदर की थाप पर जमकर नृत्य करते हैं.

सरहुल में लाल पाड़ साड़ी का महत्‍व

सरहुल में प्रचलित है- नाची से बांची. यानी जो नाचेगा वही बचेगा. क्योंकि, मान्यता है कि नृत्य ही संस्कृति है. इसमें पूरे झारखंड में जगह-जगह नृत्य उत्सव होता है. महिलाएं लाल पाढ़ साड़ी पहनती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि सफेद पवित्रता और शालीनता का प्रतीक है. वहीं, लाल संघर्ष का. सफेद सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल बुरुबोंगा का प्रतीक है. इसलिए सरना झंडा भी लाल और सफेद ही होता है. 

सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग…यानी जहां चलना नृत्य और बोलना गीत-संगीत है. यही झारखंड का जीवन है. हाड़तोड़ मेहनत के बाद रात में पूरा गांव अखड़ा में साथ-साथ नाचता-गाता है. ऐसे में बसंत में सरहुल को खुशियां का पैगाम माना जाता है. क्योंकि, इस समय प्रकृति यौवन पर होती है. फसल से घर और फल-फूल से जंगल भरा रहता है. मानते हैं प्रकृति किसी को भूखा नहीं रहने देगी.

सरहुल कब और कैसे मनाया जाता है (Sarhul Date)

सरहुल चैत महीने के पांचवे दिन मनाया जाता है. इसकी तैयारी सप्ताह भर पहले ही शुरू हो जाती है. प्रत्येक परिवार से हंडिया बनाने के लिए चावल जमा किए जाते हैं. पर्व के पूर्व संध्या से पर्व के अंत तक पहान उपवास करता है. एक सप्ताह पूर्वसूचना के अनुसार पूर्व संध्या गाँव की ‘डाड़ी’ साफ की जाती है. उसमें ताजा डालियों डाल की जाती है. उसमें ताजा डालियाँ डाल दी जाती हैं जिससे पक्षियाँ और जानवर भी वहाँ से जल न पी सकें.

पर्व के प्रात: मुर्गा बांगने के पहले ही पूजार दो नये घड़ों में ‘डाड़ी’ का विशुद्ध जल भर कर चुपचाप सबकी नजरों से बचाकर गाँव की रक्षक आत्मा, सरना बुढ़िया, के चरणों में रखता है. उस सुबह गाँव के नवयुवक चूजे पकड़ने जाते हैं. चेंगनों के रंग आत्माओं के अनुसार अलग-अलग होते है. किसी–किसी गाँव में पहान और पूजार ही पूजा के इन चूजों को जमा करने के लिए प्रत्येक परिवार जाते हैं.

दोपहर के समय पहान और पूजार गाँव की डाड़ी झरिया अथवा निकट के नदी में स्नान करते हैं. किसी– किसी गाँव में पहान और उसकी नदी में स्नान करते हैं. किसी–किसी गाँव में पहान और उसकी पत्नी को एक साथ बैठाया जाता है. गाँव का मुखिया अथवा सरपंच उनपर सिंदुर लगाता है. उसके बाद उन पर कई घड़ों डाला जाता है. उस समय सब लोग “ बरसों,बरसों” कहकर चिल्लाते हैं. यह धरती और आकाश की बीच शादी का प्रतीक है.

उसके बाद गाँव से सरना तक जूलूस निकला जाता है. सरना पहूंचकर पूजा-स्थल की सफाई की जाती है. पूजार चेंगनों के पैर धोकर उन पर सिंदुर लगाता है और पहान को देता है. पहान सरना बुढ़िया के प्रतीक पत्थर के सामने बैठकर चेंगनो को डेन के ढेर से चुगाता है. उस समय गाँव के बुजुर्ग वर्ग अन्न के दाने उन पर फेंकते हुए आत्माओं के लिए प्रार्थनाएँ चढाते हैं कि वे गाँव की उचित रखवाली करें. उसके बाद पहान चेंगनों का सिर काट कर कुछ खून चावल के ढेर पर और कुछ सूप पर चुलता है. बाद में उन चेंगनो को पकाया जाता है. सिर को सिर्फ पहान खा सकता है. कलेजे यकृत आदि आत्माओं में नाम पर चढ़ाये जाते हैं. बाकी मांस चावल के साथ पकाकर उपस्थित सब लोगों के बीच प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है.

ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता ख्याल रख कर उनके नाम पर अलग सफेद बलि चढ़ायी जाती है जो पूर्णता और पवित्रता का प्रतिक है. अन्य आत्माओं के नाम पर अलग–अलग रंगों के चिंगने चढ़ाये जाते हैं. पहान पूर्व की पर देखते हुए ईश्वर है. हे पिता, आप ऊपर हैं, “यहाँ नीचे पंच है और ऊपर परमेश्वर है. हे पिता आप ऊपर हैं हम नीचे. आप की आंखे हैं, हम अज्ञानी हैं; चाहें अनजाने अथवा अज्ञानतावश हमने आत्माओं को नाराज किया है, तो उन्हें संभाल कर रखिए; हमारे गुनाहों को नजरंदाज कर दीजिए.” प्रसाद भोज समाप्त होने के बड पहान को समारोह पूर्वक गाँव के पंचगण ढोते हैं. इस समय पहान सखूआ गाछ को सिंदुर लगाता और अरवा धागा से तीन बार लपेटता है जो अभीष्ट देवात्मा को शादी के वस्त्र देने का प्रतीक है. कई जगहों में पहान सखूआ फूल, चावल और पवित्र जल प्रत्येक घर के एक प्रतिनिधि को वितरित करता है. उसके बाद सब घर लौटते हैं. पहान को एक भी व्यक्ति के कंधे पर बैठाकर हर्सोल्लास गाँव लाया जाता है. उसके पाँव जमीन पर पड़ने नहीं दिए जाते हैं, चूंकि वह अभी ईश्वर का प्रतिनिधि है. घर पहुँचने पर पहान की पत्नी उसका पैर धोती है और बदले में सखूआ फूल, चावल और सरना का आशीष जल प्राप्त करती है. वह फूलों को घर के अंदर, गोहार घर में और छत में चुन देती है. पहान के सिर पर कई घड़े पानी डालते वक्त लोग फिर चिल्लाते हुए कहते हैं, – ‘बरसों, बरसो’.

सरहुल पूजा में हंडिया का इस्‍तेमाल

दुसरे दिन पहान प्रत्येक परिवार में जाकर सखूआ फूल सूप से चावल और घड़े से सरना जल वितरित करता है. गाँव की महिलाएँ अपने-अपने आंगन में एक सूप लिए खड़ी रहती हैं. सूप में दो दोने होते हैं. एक सरना जल ग्रहण करने के लिए खाली होता है दूसरे में पाहन को देने के लिए हंडिया होता है. सरना जल को घर में और बीज के लिए रखे गए धन पर छिड़का जाता है. इस प्रकार पहान हरेक घर को आशीष देते हुए कहता है, “आपके कोठे और भंडार धन से भरपूर होन, जिससे पहान का नाम उजागर हो.” प्रत्येक परिवार में पहान को नहलाया जाता है. वह भी अपने हिस्से का हंडिया प्रत्येक परिवार में पीना नहीं भूलता है. नहलाया जाना और प्रचुर मात्रा में हंडिया पीना सूर्य और धरती को फलप्रद होने के लिए प्रवृत करने का प्रतीक है. सरहुल का यह त्यौहार कई दिनों तक खिंच सकता है चूंकि बड़ा मौजा होने से फूल, चावल और आशीषजल के वितरण में कई दिन लग सकते हैं.

सरहूल पर्व में सखूआ के फूलों का ही प्रयोग अपने में चिंतन का विषय है. आदिवासी जन जीवन में सखुए पेड़ की अति महत्ता है. सखुए की पत्ती, टहनी, डालियाँ, तने, छाल, फल आदि सब कुछ प्रयोग में लाये जाते हैं. पत्तियों का प्रयोग पत्तल दोना, पोटली आदि बनाने में होता है. दतवन, जलावन, छमड़ा बैठक, सगुन निकालने, भाग्य देखने आदि में सखुए की डाली, टहनी, लकड़ी का ही प्रयोग किया जाता है. सखुए की पत्ती, डाली लकड़ी आदि के बिना आदिवासी जन- जीवन की कल्पना करना असम्भव-सा है. जन्म से लेकर मृत्यु के बाद भी सखुए वृक्ष का विशेष स्थान है ऐसा ही सटीक विचार आदिवासी जनजीवन के पारखी मीकर रोशनार ने अपनी पुस्तक “द फ़्लाइंग हॉर्स ऑफ धर्मेस” में रखा है. इसी लिए सखुए का पेड़ आदिवसियों के लिए  सुरक्षा, शांति, खुशहाल जीवन का प्रतीक माना गया है, तो उचित ही है.

सरहुल पर्व में प्रयुक्त कुछ प्रतीकों पर गौर किया जाए तो आदिवासियों की प्रकृति प्रेमी अध्यात्मिकता, सर्वव्यापी ईश्वरीय उपस्थिति का एहसास, ईश्वरीय उपासना में सृष्टि की सब चीजों, जीव- जन्तुओं आदि का सामंजस्यपूर्ण सहअस्तित्वा का मनोभाव निखर उठता है. उदारहण के तौर पर प्रत्येक परिवार से चावल जमा किया जाना और प्रतिनिधियों की उपस्थिति उनकी सहभागिता एवं सामुदायिक आध्यात्मिकता के एकत्व भाव को दर्शाता है. डाड़ी की सफाई एवं पूजा के लिए जल ले जाने तक उसकी रक्षा करना ईश्वर के प्रति उनकी श्रद्धा और निष्ठा का परिचायक है.

सरहुल और परंपराएं

जीवन के श्रोत, पवित्र ईश्वर को वे विशुद्ध जल ही चढ़ा सकते हैं. नया घड़ा, सबकी नजरों से बचाकर सरना तक पहूँचाना, रास्ते में किसी से बातें नहीं करना, पहान द्वारा उपवास करना आदि उनकी पवित्रता के मनोभावों की ही दर्शाते हैं. कई चेंगनों की बलि गाँव के बच्चें-बच्चियों का प्रतीकात्मक चढ़ावा है जिसके द्वारा उनकी सुरक्षा और समृद्धि की कामना की जाती है. सर्वोच्च ईश्वर के लिए मात्र सफेद बलि भी पवित्रता और पूर्णता का बोध कराती है. पहान और उसकी पत्नी की प्रतीकात्मक शादी, जल उड़ेला जाना, हंडिया पिलाना आदि धरती और आकाश अथवा सूर्य की शादी, अच्छी वर्षा की कामना, उर्वरा और सम्पन्नता की कामना का प्रतिक है. फूल, चावल आर सरना जल खुशी, पूर्णता, जीवन और ईश्वर की बरकत का बोध कराते हैं जिसके लिए पहान प्रत्येक परिवार में प्रर्थना करता है. पहान को समारोह के साथ ढोकर सरना से गाँव तक लाना ईश्वर को ही आदर देना है जिसमें अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भक्ति और समर्पण दर्शाकर जाति की निष्ठा, भक्ति और समर्पण को दर्शाया जाता है. सरना जल से बीज के लिए सुरक्षित धान को आशीष देना भी ईश्वर में उनकी निष्ठा और उसकी बरकत में निर्भरता को दर्शाता है. इस प्रकार देखा जाए तो सरहुल मात्र फूलों, खुशियों और बहारों को पर्व नहीं है. यह आदिवासियों की संस्कृति एवं धर्म की मूल आध्यात्मिकता को ही व्यक्त करने का पर्व है. इस पर्व के बाद ही वे अन्य फूलों को घर में ला सकते हैं, बीज बोना शुरू कर सकते हैं, अन्य पत्तियों का प्रयोग कर सकते है.

मुंडारी : बहा पोरोब में पूर्वजों का होता है सम्मान

मुंडा समाज में बहा पोरोब का विशेष महत्व है. मुंडा प्रकृति के पुजारी हैं. सखुआ साल या सरजोम वृक्ष के नीचे मुंडारी खूंटकटी भूमि पर मुंडा समाज का पूजा स्थल सरना होता है. सभी धार्मिक नेग विधि इसी सरना स्थल पर पाहन द्वारा संपन्न किया जाता है. जब सखुआ की डालियों पर सखुआ फूल भर जाते हैं, तब गांव के लोग एक निर्धारित तिथि पर बहा पोरोब मनाते हैं. बहा पोरोब के पूर्व से पाहन (पहंड़) उपवास रखता है. यह पर्व विशेष तौर पर पूर्वजों के सम्मान में मनाते हैं. धार्मिक विधि के अनुसार सबसे पहले सिंगबोगा परम परमेश्वर को फिर पूर्वजों और ग्राम देवता की पूजा की जाती है. पूजा की समाप्ति पर पाहन को नाचते-गाते उसके घर तक लाया जाता है. सभी सरहुल गीत गाते हुए नाचते-गाते हैं. 

सरहुल में मौसम की भविष्‍यवाणी

रांची यूनिवर्सिटी जनजातीय विभाग के डॉ हरि उरांव बताते हैं कि सरहुल के दिन सृष्टि के दो महान स्वरूप शक्तिमान सूर्य एवं कन्या रूपी धरती का विवाह होता है. जिसकी कुड़ुख या उरांव में खेखेल बेंजा कहते हैं. इसका प्रतिनिधित्व क्रमश: उरांव पुरोहित पहान (नयगस) एवं उसकी धर्मपत्नी (नगयिनी) करते हैं. इनका स्वांग प्रतिवर्ष रचा जाता है. उरांव संस्कृति में सरहुल पूजा के पहले तक धरती कुंवारी कन्या की भांति देखी जाती है. धरती से उत्पन्न नए फल-फूलों का सेवन वर्जित है. इस नियम को कठोरता से पालन किया जाता है. पहान घड़े का पानी देखकर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं.

पहान सरना स्थल पर पूजा संपन्न करता है और तीन मुर्गों की बलि दी जाती है और खिचड़ी बनाकर प्रसाद के रूप में खाते हैं. फिर पहान प्रत्येक घर के बुजुर्ग या गृहिणी को चावल एवं सरना फूल देते हैं, ताकि किसी प्रकार का संकट घर में न आए. सरहुल के एक दिन पहले केकड़ा खोदने का रिवाज है. केकड़ा को पूर्वजों के रूप में बाहर लाकर सूर्य और धरती के विवाह का साक्षी बनाया जाता है. सरहुल के बाद ही खरीफ फसल की बोआई के लिए खाद और बीज डाला जाता है. 

वर्त्तमान में दूषित पर्यावरण, उजड़ते जंगलों के कुप्रभावों को देखते हुए समस्त मानवता के सामने स्थित चिंता हम सबों की भी चिंता है. भावी पीढ़ी के लिए स्वच्छ वातावरण, विशूद्ध पर्यावरण दे सकने के लिए आवश्यक है कि आदिवासियों की मौलिक मनोवृति अपनायी जाए. प्रकृति और पर्यावरण को विशूद्ध रखने का नैसर्गिक गुण ही उनकी विरासत है. उनकी संस्कृतिक पहचान है. उनके आस्तित्व का मूल अवयव है. इस सत्विकत्थ्य को समग्रमानवता की सार्थकता के लिए अनुपम उपहार बना सकें, तो ऋतु पर्वों का सिरोमणि – सरहुल, हम सबके लिए नवजीवन, आशा, खुशी, सम्पन्नता, पवित्रता और एकता का त्यौहार बनकर आएगा.

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