पर्यावरण को बचाकर हम विश्व गुरू बन सकते हैं : जल पुरुष डॉ राजेन्द्र सिंह

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#RANCHI : मैगसेसे पुरस्कार के विजेता और जल पुरुष के नाम से प्रसिद्ध डॉ राजेन्द्र सिंह ने कहा कि पर्यावरण का साहित्य लालची होकर नहीं लिखा जा सकता. वह शुभ और लाभ यानी सर्वसमाज की चिंता करके ही लिखा जा सकता है. हमारी विकास की अवधारणा विस्थापन, प्रदूषण, बाढ़ और सूखा पैदा करती है.

राजेन्द्र सिंह शुक्रवार को आड्रे हाउस में चल रहे पर्यावरण मेला के चौथे दिन बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि आजादी के समय भारत की कितनी जमीन पर बाढ़ व सूखा था. आज उस से 10 गुना ज्यादा जमीन बाढ़ और सूखा से प्रभावित है. इसका मतलब है कि हम जीडीपी ग्रोथ के जरिए विश्व गुरु नहीं बन सकते, बल्कि हम अपने पर्यावरण को बचाकर और लोगों की खुशियां बढ़ाकर ही विश्व गुरु बन सकते हैं.

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उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन पर्यावरण और प्रकृति से भरा है. झारखंड के लोग भगवान के सबसे लाडले बेटे और बेटियां हैं. क्योंकि यहां अभी भी जंगल,बारिश और पानी है. यहां की मिट्टी अच्छी है, लेकिन आने वाले समय में यह बिगड़ने वाली है.

विकास के नाम पर शहरों की ओर पलायन लोगों को धरती से तोड़ता है. वर्ष 2017 में 13 राज्यों के 327 जिलों में सूखा पड़ा था. आजादी के बाद पहली योजना के समय देश के 232 गांव नो सोर्स विलेज थे. वहां पानी नहीं था.

2017 में दो लाख 65 हजार गांवों में पीने लायक पानी नहीं था. उन्होंने कहा कि हमें आदिवासियों की जीवन शैली से सीखना होगा, जो प्रकृति से कम से कम लेते हैं और उसे बनाए रखने का व्यवहार करते हैं. आज भी आदिवासियों की जमीन इतनी बीमार नहीं है,जितनी तथाकथित विकसित इलाकों की जमीन है.

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उन्होंने सतयुग से लेकर कलयुग तक के उदाहरणों के माध्यम से साहित्य प्रकृति और पर्यावरण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की यही जीवन शैली है और इसी रास्ते से भारत विश्व गुरु का ताज धारण कर सकता है.

मौके पर अपर मुख्य सचिव डॉ डीके तिवारी ने कहा कि जो साहित्य है, वही प्रकृति है. जो सुख एक अच्छा लेख या कविता पढ़ने में मिलता है, वही प्रकृति के सानिध्य में मिलता है. आज विज्ञान भी नेचुरल साइंस की ओर बढ़ रहा है. साहित्यकार डॉ अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि साहित्य क्रांति नहीं करता, अपितु लोगों को जागरूक करने का काम करता है.

साहित्य प्रकृति का वर्णन करके यह सचेत करता रहा है कि प्रकृति के पास हमारे जीवन और जरूरत के लिए सब कुछ है, मगर लालच के लिए नहीं. विषय प्रवेश कराते हुए नरेंद्र कुमार ने कहा कि प्रकृति और पर्यावरण भारतीय जीवन में वेदों के समय से है. उन्होंने लोक साहित्य और छायावाद से लेकर आधुनिक साहित्य तक में पर्यावरण की प्रमुखता का उल्लेख किया.

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इस अवसर पर विधान सभा अध्यक्ष दिनेश उरांव, डॉ गिरिधारी राम गंझू, महादेव टोप्पो, डॉ रामप्रसाद, डॉ शैलेश कुमार मिश्र, डॉ जिंदर सिंह मुंडा, डॉ प्रज्ञा गुप्ता, डॉ अवध पुराण और डॉ सरस्वती गागराई ने झारखंड की लोक भाषाओं में पर्यावरण पर अपने लेख प्रस्तुत किये.

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