साईं बाबा: जानिये शिर्डी वाले बाबा के चमत्‍कार

साईं बाबा कौन थे और उनका जन्म कहां हुआ था यह प्रश्न ऐसे हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है. साईं ने कभी इन बातों का जिक्र नहीं किया. इनके माता-पिता कौन थे इसकी भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. आज शिरडी के साईंबाबा की 100वीं पुण्‍यतिथि है. साईंबाबा के महासमाधि शताब्दी के अवसर पर देश ही नहीं दुनियाभर में उनके भक्त तरह-तरह के कार्यक्रमों का आयोजन कर भक्ति में जुटे हैं. साईंबाबा का जन्म 27 सितंबर 1830 के आसपास हुआ था. अपने पूरे जीवन को फकीर की तरह जीने वाले साईंबाबा की मृत्यु 15 अक्टूबर 1918 में हुई थी. साईंबाबा ने अपना संपूर्ण जीवन दूसरों की भलाई और उनकी मदद करने में ही बिताया है लोग उन्हें शिरडी के साईंबाबा के नाम से भी जानते हैं. इसके अलावा उन्हें एक भारतीय गुरु, योगी और फकीर भी कहा जाता है लेकिन उनके भक्त उन्हें संत कहकर पुकारते हैं.

साईं बाबा का असली नाम अभी भी अज्ञात बना हुआ है साईंबाबा की समाधि शिरडी में बनी है और आज वहां बहुत बड़ा और विशाल मंदिर निर्माण भी हो गया है देशभर में शिरडी साईं मंदिर में रोजाना लाखों करोड़ों लोगों का आना जाना होता है और भक्त साईंबाबा के सिद्ध क्षेत्र शिरडी में उनकी समाधि के दर्शन करने आते हैं.

साईं बाबा के शिष्यों और भक्तों का दावा है कि उन्होंने कई चमत्कार किए जैसे कि इच्छा से समाधि की स्थिति में प्रवेश करना, पानी के साथ दीपक को प्रकाश देना, अपने अंगों या आंतों को हटा देना और उन्हें अपने शरीर में वापस चिपकाना, बीमारियों को ठीक करने, एक मस्जिद को लोगों पर गिरने से रोकना, और अपने भक्तों को अन्य चमत्कारी तरीकों से मदद करना. उन्होंने भक्तों के विश्वास के आधार पर श्री राम, कृष्ण, विठोबा, शिव और कई अन्य देवताओं के रूप में भी लोगों को दर्शन दिये हैं आज भी शिरडी में साईंबाबा का अंश मौजूद है जो लोगों की किसी न किसी तरह से मदद करता ही है.

साईं की जाति क्या थी?

साईं बाबा ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा एक पुराने मस्जिद में बिताया जिसे वह द्वारका माई कहा करते थे. सिर पर सफेद कपड़ा बांधे हुए फकीर के रूप में साईं शिरडी में धूनी रमाए रहते थे. इनके इस रूप के कारण कुछ लोग इन्हें मुस्लिम मानते हैं. जबकि द्वारिका के प्रति श्रद्घा और प्रेम के कारण कुछ लोग इन्हें हिन्दू मानते है. लेकिन साईं ने कबीर की तरह कभी भी अपने को जाति बंधन में नहीं बांधा. हिन्दू हो या मुसलमान साई ने सभी के प्रति समान भाव रखा और कभी इस बात का उल्लेख नहीं किया कि वह किस जाति के हैं. साईं ने हमेशा मानवता, प्रेम और दयालुता को अपना धर्म माना.
जो भी इनके पास आता उसके प्रति बिना भेद भाव के उसके प्रति कृपा करते. साई के इसी व्यवहार ने उन्हें शिरडी का साई बाबा और भक्तों का भगवान बना दिया. हलांकि साईं बाबा का साईं नाम कैसे पड़ा इसकी एक रोचक कथा है.

फकीर से साई बाबा बनने की कहानी

कहा जाता है कि सन् 1854 ई. में पहली बार साई बाबा शिरडी में दिखाई दिए. उस समय बाबा की उम्र लगभग सोलह वर्ष  थी. शिरडी के लोगों ने बाबा को पहली बार एक नीम के वृक्ष के नीचे समाधि में लीन देखा. कम उम्र में सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास की जरा भी चिंता किए बगैर बालयोगी को कठिन तपस्या करते देखकर लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ. त्याग और वैराग्य की मूर्ति बने साईं ने धीरे-धीरे गांव वालों का मनमोह लिया. कुछ समय शिरडी में रहकर साईं एक दिन किसी से कुछ कहे बिना अचानक वहां से चले गए. कुछ सालों के बाद चांद पाटिल नाम के एक व्यक्ति की बारात के साथ साई फिर शिरडी में पहुंचे. खंडोबा मंदिर के पुजारी म्हालसापति ने साईं को देखते ही कहा ‘आओ साईं’ इस स्वागत संबोधने के बाद से ही शिरडी का फकीर ‘साईं बाबा’ कहलाने लगा.

साई के जीने का तरीका

शिरडी के लोग शुरू में साईं बाबा को पागल समझते थे लेकिन धीरे-धीरे उनकी शक्ति और गुणों को जानने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ती गयी. साईं बाबा शिरडी के केवल पांच परिवारों से रोज दिन में दो बार भिक्षा मांगते थे. वे टीन के बर्तन में तरल पदार्थ और कंधे पर टंगे हुए कपड़े की झोली में रोटी और ठोस पदार्थ इकट्ठा किया करते थे. सभी सामग्रियों को वे द्वारका माई लाकर मिट्टी के बड़े बर्तन में मिलाकर रख देते थे. कुत्ते, बिल्लियां, चिड़िया निःसंकोच आकर खाने का कुछ अंश खा लेते थे, बची हुए भिक्षा को साईं बाबा भक्तों के साथ मिल बांट कर खाते थे.

शिरडी साई बाबा के चमत्कार

साईं ने अपने जीवनकाल में कई ऐसे चमत्कार दिखाए जिससे लोगों ने इनमें ईश्वर का अंश महसूस किया. इन्हीं चमत्कारों ने साईं को भगवान और ईश्वर का अवतार बना दिया. लक्ष्मी नामक एक स्त्री संतान सुख के लिए तड़प रही थी. एक दिन साईं बाबा के पास अपनी विनती लेकर पहुंच गई. साईं ने उसे उदी यानी भभूत दिया और कहा आधा तुम खा लेना और आधा अपने पति को दे देना. लक्ष्मी ने ऐसा ही किया. निश्चित समय पर लक्ष्मी गर्भवती हुई. साईं के इस चमत्कार से वह साईं की भक्त बन गयी और जहां भी जाती साईं बाबा के गुणगाती. साईं के किसी विरोधी ने लक्ष्मी के गर्भ को नष्ट करने के लिए धोखे से गर्भ नष्ट करने की दवाई दे दी. इससे लक्ष्मी को पेट में दर्द एवं रक्तस्राव होने लगा. लक्ष्मी साईं के पास पहुंचकर साईं से विनती करने लगी.साईं बाबा ने लक्ष्मी को उदी खाने के लिए दिया. उदी खाते ही लक्ष्मी का रक्तस्राव रूक गया और लक्ष्मी को सही समय पर संतान सुख प्राप्त हुआ.

शिर्डी में वापसी

1858 में साईबाबा शिर्डी वापिस आए थे. इस समय वे अलग ही तरह के कपडे पहने हुए थे, उपर उन्होंने घुटनों तक कफनी पोशाक और कपड़ो की ही एक टोपी पहन रखी थी. उनके एक अनुयायी रामगिर बुआ ने ध्यान से देखने पर पाया की साईबाबा ने एक व्यायामी की तरह कपडे पहने हुए है, कपड़ो के साथ-साथ उनके बाल भी काफी घने और लम्बे थे. जब लम्बे समय के बाद वे शिर्डी लौटकर आए थे तो लोगो को उनका एक नया रूप देखने मिला था. उनकी पोषाक के अनुसार वे एक मुस्लिम फ़क़ीर लग रहे थे और लोग उन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों का गुरु मानते थे.

वापस आने के बाद तक़रीबन 4 से 5 साल तक साईबाबा एक नीम के पेड़ के निचे रहते थे और अक्सर कभी-कभी लम्बे समय के लिए शिर्डी के जंगलो में भी चले जाते थे. लंबे समय तक ध्यान में लगे रहने की वजह से वे कयी दिनों तक लोगो से बात भी नही करते थे. लेकिन बाद में कुछ समय बाद लोगो ने उन्हें एक पुरानी मस्जिद रहने के लिए दी, वहाँ वे लोगो से भिक्षा मांगकर रहते थे और वहाँ उनसे मिलने रोज़ बहुत से हिन्दू और मुस्लिम भक्त आया करते थे. मस्जिद में पवित्र धार्मिक आग भी जलाते थे जिसे उन्होंने धुनी का नाम दिया था, लोगो के अनुसार उस धुनी में एक अद्भुत चमत्कारिक शक्तियाँ थी, उस धुनी से ही साईबाबा अपने भक्तो को जाने से पहले उधि देते थे.

साईं बाबा के भक्त और मन्दिर

शिरडी साईं बाबा आंदोलन 19वींं सदी में शुरू हुआ जब वो शिरडी रहते थे. एक स्थानीय खंडोबा पुँजारी म्हाल्सप्ति उनका पहला भक्त था. 19 वींं सदी तक साईं बाबा के अनुयायी केवल शिरडी और आस पास के गाँवों तक ही सिमित थे. Shirdi Sai Baba साईं बाबा का पहला मन्दिर भिवपुरी में स्तिथ है. शिरडी साईं बाबा के मंदिर में प्रतिदिन 20000 श्रुधालु  आते है और त्योहारों के दिनों में ये संख्या एक लाख तक पहुच जाती है. Shirdi Sai Baba शिरडी साईं बाबा को विशेषत: महराष्ट्र, उडीसा, आंध्रप्रदेश , कर्नाटक , तमिलनाडु और गुजरात में पूजा जाता है. 2012 में एक अज्ञात श्रुधालु ने पहली बार 11.8 करोड़ के दो कीमती शिरडी मन्दिर में चढाये जिसको बाद में साईं बाबा ट्रस्ट के लोगो ने सबको बताया. शिरडी साईं बाबा के भक्त पुरे विश्व में फैले हुए है.

अंतिम दिन मंगलवार 15 अक्‍टूबर 1918 विजयदशमी का दिन था साईं बाबा बहूत कमजोर हो गये थे . रोज की तरह भक्त उनके दर्शन के लिए आ रहे थे. साईं बाबा उन्हें प्रसाद और उड़ी दे रहे थे भक्त बाबा से ज्ञान भी प्राप्त कर रहे थे पर किसी भक्त ने नही सोचा की आज बाबा के शरीर का अंतिम दिन है. सुबह की ११ बज गयी थी.

दोपहर की आरती का समय हो गया था और उसकी त्यारिया चल रही थी कोई देविक प्रकाश बाबा के शरीर में समां गया. आरती  शुुरू गयी और बाबा साईं का चेहरा हर बार बदलता हुआ प्रतीत हुआ . बाबा ने पल पल में सभी देवी देवताओ के रूप के दर्शन अपने भक्तोंं को कराये वे राम, शिव, कृष्णा, वितल, मारुती, मक्का, मदीना, जीसस क्राइस्ट के रूप दिखे आरती पूर्ण हुई.

बाबा साईं ने अपने भक्तो को कहा की अब आप मुझे अकेला छोड़ दे . सभी वहा से चले गये साईं बाबा के तब एक जानलेवा खांसी चली और खून की उलटी हुई . तात्या बाबा का एक भक्त तो मरण के करीब था वो अब ठीक हो गया उसे पता भी न चला की वो किस चमत्कार से ठीक हुआ है वह बाबा को धन्यवाद देने बाबा के निवास आने लगा पर बाबा का सांसारिक शरीर तो येही रह गया था

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