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2019 चुनाव के पहले बिहार में एनडीए की मुश्किलें

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2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में बीजेपी की मुश्किलें और बढ़ती जा रही हैं. एनडीए के ज्यादातर घटक दल नाराज चल रहे हैं. ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए के कुनबे को संभालना बीजेपी के लिए मुश्किल हो गया है. बिहार की राजनीति बीजेपी के लिए कभी आसान नहीं रही है. बीजेपी अगर साल 2005 के बाद बिहार की सत्ता में आई थी, तब भी वह ‘छोटे भाई’ की भूमिका में रही थी. अगले लोकसभा चुनाव के पूर्व बिहार में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से जिस तरह पार्टियों का बाहर जाना जारी है, उससे यह तय माना जा रहा है कि बीजेपी की ‘गांठ’ जरूर कमजोर हुई.

बिहार विधानसभा चुनाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा बीजेपी का साथ छोड़कर चली गई.उसके बाद नीतीश कुमार की जेडीयू, बीजेपी के साथ तो जरूर आई, लेकिन राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी की नाराजगी बढ़ गई और अंत में आरएलएसपी ने एनडीए से ही किनारा कर लिया.

ऐसे में कमजोर पड़ रही बीजेपी को अब बिहार एनडीए के लिए मजबूत घटक दल माने जाने वाले एलजेपी ने भी परोक्ष रूप से एनडीए छोड़ने की धमकी दे दी है. ऐसे में देखा जाए तो आने वाला समय बीजेपी के लिए आसान नहीं है. राजनीति के जानकार भी मानते हैं कि बीजेपी की ‘गांठ’ बिहार में ढीली पड़ी है.

बिहार की राजनीति पर गहरी नजर रखने वाले और वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि बीजेपी ने इतिहास से भी सीख नहीं ली है. उन्होंने कहा, “बीजेपी एक बार फिर साल 2004 की तरह गड़बड़ा रही है. अपने सहयोगियों से सीट बंटवारे को लेकर बात करने में बीजेपी की मजबूरी नहीं थी, पर वह इस ओर ध्यान नहीं दे रही.”

उनका कहना है कि परिवार से एक भाई के जाने से परिवार कमजोर हो जाता है, इसे नकारा नहीं जा सकता. ऐसे में एडीए से आरएलएसपी का जाने का अगले चुनाव में तो प्रभाव पड़ेगा, लेकिन कितना पड़ेगा, उसका अभी आकलन नहीं किया जा सकता. उन्होंने बीजेपी द्वारा गठबंधन के नेताओं से बात नहीं करने पर बड़े स्पष्ट तरीके से कहा, “दूध का जला, मट्ठा भी फूंककर पीता है, मगर बीजेपी अपने इतिहास से भी सीख नहीं ले रही है.”

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद दत्त इसे ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ ने कहा कि हाल ही में बीजेपी की तीन राज्यों में हार हुई है, ऐसे में आरएलएसपी के नेता बीजेपी पर दबाव बनाकर लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें चाहते हैं. उन्होंने हालांकि दावे के साथ कहा, “एलजेपी अभी एनडीए को छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली है, क्योंकि महागठबंधन में जितनी पार्टियों की संख्या हो गई है, उसमें एलजेपी को वहां 6-7 सीटें नहीं मिलेंगी.”

दत्त हालांकि यह भी कहते हैं कि एनजीए के साथ बिहार में जेडीयू जैसी बड़ी पार्टी आ गई है, ऐसे में बीजेपी छोटे दलों को तरजीह नहीं दे रही, जिस कारण आरएलएसपी ने किनारा करना उचित समझा.

बीजेपी और जेडीयू के नेता हालांकि एनडीए में किसी प्रकार के मतभेद से इनकार कर रहे हैं. बीजेपी के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बातें कहने का हक है. सभी पार्टियां अपनी दावेदारी रखती हैं और रख रही हैं, जिसे मतभेद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

बहरहाल, लोकसभा चुनाव तो अगले साल होना है, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर पार्टियों के बीच अभी से शह-मात का खेल शुरू हो गया है. अब देखना यही है कि आनेवाले चुनाव में कौन दोस्त दुश्मन और कौन दुश्मन दोस्त नजर आते हैं.

साभार: नवजीवन

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