लड़ाई गांव गणराज्य की: पत्‍थर खनन के खिलाफ आदिवासियों की उलगुलान

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Ranchi: झारखंड के कोल्हान (सिंहभूम) स्थित कई गांवो में आदिवासी समुदाय के लोग पत्थर खनन के खिलाफ आंदोलन की राह पर उतर आए हैं. विरोध प्रदर्शन के दौरान वे लाठियां खाने को मजबूर हैं.

हालात देखते हुए आदिवासी पंरपरागत हथियारों के साथ गांव- पठार में निकलने लगे हैं. पोटका के नाचोसाई गांव से निकली आवाज राजनगर प्रखंड के पाकुड़ डुंगरी तक जा पहुंची है. जगह- जगह बैठकों का सिलसिला जारी है.

पिछले 12 जनवरी को पोटका इलाके में कोवाली थाना क्षेत्र के नाचोसाई में लीज पर दिए गए पत्थर खनन के विरोध में बड़ी तादाद में ग्रामीण घरों से निकले थे. लेकिन प्रशासन और पुलिस ने नाचोसाई पहाड़ी में पत्थर खनन का काम शुरू करा दिया.

पीछे नहीं हटेंगे

कुमार चंद्र मार्डी कहते हैं, “गलत तरीके से ग्राम सभा करके नाचोसाई पहाड़ी को लीज पर दिया गया. ग्रामीण नहीं चाहते कि इस इलाके की पहाड़ियां तोड़ी जाए.  जल, जंगल और जमीन के लिए संघर्ष के बीच अब पत्थर खदान को बचाने की चुनौती हमारे सामने है. खनन कार्य से गांवों को नुकसान का सामना करना होगा. अलबत्ता यह लड़ाई गांव गणराज्य की है. और इस लड़ाई में हम जुल्म तथा दमन का सामना करते रहेंगे. लेकिन पीछे नहीं हटेंगे”.

क्या हुआ था

झारखंड जनतांत्रिक जनसभा के दीपक रणजीत बताते हैं कि नाचोसाई गांव के निकट एक पत्थर वाले बड़े भूखंड को सरकार ने एक कंस्ट्रक्शन कपनी को लीज पर दिया है. बड़ी तादाद में इसका विरोध करने के लिए महिलाएं निकली थी. महिलाओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उन्हें थाना ले जाया गया. विरोध में महिलाओं पर लाठियां चलाई गई. कई महिलाएं घायल हुई. ग्रामीण फर्जी ग्रामसभा के विरोध में खड़े हुए हैं. पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में फर्जी ढंग से ग्राम सभा कर झारखंडी जनमानस के विपरीत फैसले लिए जा रहे हैं.

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हालांकि ग्राम प्रधान पुरेन सरदार कहते हैं कि ग्रामसभा में इसकी अनुमति ली गई थी. जबकि गांव का एक पक्ष ग्रामसभा को गलत बता रहा है. उसी दिन धालभूम के एसडीएम चंदन कुमार ने मीडिया को बताया था कि नियम के तहत लीज दिए गए हैं. सड़क निर्माण योजना के लिए इन पत्थरों का इस्तेमाल किया जाना है.

विरोध मार्च

इस घटना के विरोध में 17 जनवरी को नाचोसाई, तेतला से सैकड़ों लोग जुलूस की शक्ल में जिला मुख्यालय पहुंचे थे.
बबिता सरदार बताती हैं कि 12 जनवरी को बड़ी तादाद में महिलाएं खनन कार्य रोकने के लिए निकली थीं, लेकिन उन्हें पुलिस ज्यादती का सामना करना पड़ा. महिलाओं के कपड़े तक फाड़े गए. पुलिस वाले महिलाओं को घसीट कर थाना ले गई. बबिता सरदार, ग्राम प्रधान और प्रशासन को चुनौती देती हैं कि पूरे गांव से रायशुमारी कर ली जाए, हकीकत पता चल जाएगा.

फूलमनी सरदार कहती हैं, “दुनिया वालों सुन लो हमारे राज्य में हमारा गणराज्य” इसी नारे के साथ आंदोलन छेड़ दिया गया है. इसका असर भी होकर रहेगा. सरकार की नजर आदिवासियों की जमीन और गांव पर है. नाचोसाई की लीज को खत्म करना होगा. बंदूक और लाठी से आदिवासियों की आवाज बहुत दिनों तक नहीं दबाई जा सकती.

अनीश्वर सरदार कहते हैं कि पांचवीं अनुसूचि क्षेत्र में किसी किस्म का खनन कार्य से पहले ग्रामसभा की रायशुमारी जरूरी है. झारखंड के जनजातीय इलाकों में पेसा कानून ( द प्रोवीजंस ऑफ पंचायत एक्सटेंशन टू शिड्यूल एरिया 1996) को जानबूझ कर लागू नहीं किया गया है, ताकि आदिवासियों के अधिकारों का हनन किया जा सके. कोल्हान में वैसे भी जल, जंगल और जमीन पर दशकों से कंपनी वाले नजर लगाए हैं. इस काम में सरकारी तंत्र खुलकर उनकी मदद करता है.

पाकुड़ डुंगरी

इस बीच 19 जनवरी को पश्चिम सिंहभूम के राजनगर प्रखंड के पाकुड़ डुंगरी में ग्रामीणों ने खनन के विरोध में हथियारबंद प्रदर्शन किया. यहां की डुंगरी को लीज पर दिया गया है. ग्राम प्रधान सनातन महतो की अगुवाई में ग्रामीण सुरक्षा समति की बैठक कर निर्णय लिया गया है कि किसी भी सूरत में पत्थर खनन का काम नहीं होने दिया जाएगा.

डॉक्टर सोरेन इस बात पर जोर देते हैं कि डुंगरी से महज कुछ फर्लांग पर स्कूल और गांव है. लोगों के खेत- खलिहान हैं. इसके बाद भी डुंगरी को लीज पर दे दिया गया है. दुर्गा चरण सोरेन बताते हैं कि जब गांव के लोग सहमत नहीं है, तो किस आधार पर सरकार ने खनन कार्य के लिए लीज दिया गया है. टकराव केलिए हमें मजबूर किया जाता रहा है.

साभार: पीबी

 

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