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विश्‍लेषण : अविश्‍वास प्रस्‍ताव के बाद किसका क्‍या हुआ फायदा और किसका नुकसान

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#New Delhi : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राजग सरकार के खिलाफ तेदेपा और कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा लोकसभा में पेश किया गया अविश्वास प्रस्ताव शुक्रवार को 126 के मुकाबले 325 मतों से गिर गया. अविश्वास प्रस्ताव पर शुक्रवार करीब 12 घंटे की चर्चा के बाद हुए मत-विभाजन में 451 सदस्यों
ने हिस्सा लिया, जिसमें अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 126 वोट पड़े जबकि विरोध में 325 मत पड़े.

तेलुगूदेशम पार्टी ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर राजग सरकार से अलग होने के बाद उसके खिलाफ यह अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. तेदेपा के श्रीनिवास केसीनेनी द्वारा पेश अविश्वास प्रस्ताव को गत बुधवार को सदन ने स्वीकार किया था. लोकसभा चुनाव 2019 से पहले मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की अहमियत है. इस विश्लेषण के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि अविश्वास प्रस्ताव से किस पार्टी को क्या फायदा और क्या नुकसान हुआ.

कांग्रेस- अविश्वास प्रस्ताव के पीछे कांग्रेस का मकसद सरकार पर हमला करना और राहुल गांधी को एक मजबूत नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करना था. लोकसभा में कांग्रेस का मनोबल काफी ऊंचा दिखाई दिया. सदन में राहुल गांधी भी काफी आत्मविश्वास से लबरेज और आक्रामक शैली में नजर आए. इसके साथ ही उन्होंने भाषण खत्म करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाकर लाइमलाइट भी चुरा ली. लेकिन पार्टी के पास अब चुनौती है कि इस माहौल को कैसे चुनावी जीत में तब्दील किया जाए.

भारतीय जनता पार्टी- भाजपा शुक्रवार को अविश्वास प्रस्ताव को गिराने में कामयाब रही. सरकार के पक्ष में 325 और इसके विरोध में 126 वोट पड़े. दोपहर में जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में अपना भाषण शुरु तो पार्टी का मनोबल डगमगाता हुआ दिख रहा था. राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी पर व्यक्तिगत और आक्रामक तौर पर निशाना साधा था. लेकिन पीएम मोदी के भाषण के बाद पार्टी ने महसूस किया कि उन्होंने राहुल गांधी की हर एक बात को जवाब दिया.

पार्टी प्रमुख अमित शाह ने अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद ट्वीट किया, ‘जनता के विश्वास में अविश्वास जताने वालों के अहंकार की आज लोकसभा में जो हार हुई है वह 2019 लोकसभा चुनावों के नतीजों की एक झलक मात्र है.’ पार्टी इसे लोकसभा चुनाव में भुना सकती है.

शिवसेना- शिवसेना अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा की कार्यवाही में शामिल नहीं हुई. गुरुवार को पहले शिवसेना ने तय किया कि वे सरकार का समर्थन करेंगे, लेकिन उसी शाम को उन्होंने अपना फैसला वापस ले लिया और उसके बाद उन्होंने फैसला किया कि वे अविश्वास प्रस्ताव और वोटिंग का बहिष्कार करेंगे. इससे साफ जाहिर होता है कि शिवसेना के भारतीय जनता पार्टी से संबंध सही नहीं चल रहे हैं. एनडीए में शामिल शिवसेना महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी का सहयोगी दल है. शिवसेना का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी उसके दबदबे वाले क्षेत्रों पर कब्जा कर रही है.

एआईएडीएमके- तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी एआईएडीएमके ने सरकार के पक्ष में वोट किया. पार्टी की भाजपा के साथ करीबी जयललिता की मौत के बाद देखने को मिली. इस पार्टी ने कई राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दों पर एनडीए का सीधे और परोक्ष रूप से समर्थन किया है.

पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि एआईएडीएमके लोकसभा की कार्यवाही से दूर रहेगी. लेकिन खुले तौर पर सरकार का समर्थन करना तमिलनाडु में पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है. पार्टी को कई उलझनों का सामना करना पड़ सकता है. पार्टी में पहले ही दरार पड़ी हुई है और वह कई चुनौतियों को सामना कर रही है.

टीडीपी- टीडीपी लोकसभा में केंद्र सरकार के खिलाफ प्रस्ताव लेकर आई थी. आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा ना देने पर टीडीपी एनडीए सरकार से अलग हुई थी. लेकिन इस मुद्दे पर अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान बात कम हुई. लेकिन पार्टी को इससे काफी फायदा हो सकता है. केंद्र सरकार को राज्य के हितों के लिए ललकारने का फायदा टीडीपी को हो सकता है.

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