खरसावां गोलीकांड का काला दिवस को भी जानिए नये साल में

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Ranchi: (खरसावां गोलीकांड का काला दिवस) पूरी दुनिया 1 जनवरी को न्यू ईयर सेलिब्रेट करती है. 31 दिसंबर की देर शाम जश्न में रंगीन होती है. वहीं एक ऐसी जगह भी है, जहां के लोग पहली जनवरी का विरोध करते हैं. इस दिन को वे काला दिवस के रूप में मनाते हैं. शोक और मातम करते हैं. हम बात कर रहे हैं झारखंड के खरसावां की.  नये साल की पहली तारीख इनके लिए बहुत सारी पुरानी घाव ताजा हो जाती हैं. इस दर्दनाक घटना को खरसावां गोलीकांड (Kharsawan Golikand) के रूप में याद किया जाता है.

खरसावां गोलीकांड की दास्तान

25 दिसम्बर 1947 को चंद्रपुर जोजोडीह में नदी किनारे एक सभा आयोजित की गयी थी, जिसमें तय किया गया कि सिंहभूम को उड़ीसा राज्य में न रखा जाय. बल्कि यह अलग झारखण्ड राज्य के रूप में रहे. दूसरी ओर सरायकेला खरसावां के राजाओं ने उड़ीसा राज्य में शामिल करने की सहमति दे दी थी. झारखंडी जनमानस खुद को स्वतंत्र राज्य के रूप में अपनी पहचान कायम रहे, इसके लिए गोलबंद होने लगे और तय किया गया कि एक जनवरी को खरसवां के बाजार ताड़ में सभा का आयोजन किया जायेगा. जिसमें जयपाल सिंह मुंडा भी शमिल होंगे.

इसी जगह गोलीकांड हुआ था,अब इसे पार्क का रुप दे दिया गया है
इसी जगह गोलीकांड हुआ था,अब इसे पार्क का रुप दे दिया गया है

विधायक बहादुर उरांव बताते हैं कि इस रैली में जयपाल सिंह मुंडा ने आने की सहमती दी थी. वहीं जयपाल सिंह को सुनने के लिए तीन दिन पहले से ही चक्रधरपुर, चाईबासा, जमशेदपुर, खरसवां, सराकेला के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के लोग सभास्थल की ओर निकल पड़े. अपने साथ सिर पर लकड़ी की गठरी, चावल, खाना बनाने का सामान, डेगची-बर्तन भी साथ में लेकर आये थे. उस दौरान ग्रामीणों के मन में अलग झारखंड राज्य बने, इसके लिए गोलबंद होना शुरू हो गये थे.

बहादुर उरांव ने बताया कि एक जनवरी 1948 के दिन गुरूवार को हाट-बाजार का भी दिन था. आस-पास की महिलायें बाजार करने के लिए आई थीं और दूर-दूर से आये बच्चों एवं पुरूषों के हाथों में पारंपरिक हथियार और तीर धनुष से लैस थे. वहीं रास्ते में सारे लोग नारे लगाते जा रहे थे और आजादी के गीत भी गाये जा रहे थे. एक ओर राजा के निर्णय के खिलाफ पूरा कोल्हान सुलग रहा था, दूसरी ओर सिंहभूम को उड़ीसा राज्य में मिलाने के लिए, उड़ीसा के मुख्यमंत्री विजय पाणी भी अपना षडयंत्र रच चुके थे. उड़ीसा राज्य प्रशासन ने पुलिस को खरसावां भेज दिया, जो चुपचाप मुख्य सड़कों से न होकर अंधेरे में 18 दिसम्बर 1947 को ही शस्त्रबलों की तीन कंपनियां खरसावां मिडिल स्कूल पहुंची हुई थी. आजादी के मतवाले इन बातों से बेखबर अपनी तैयारी में लगे थे. सभी ‘जय झारखंढ ‘ का नारा लगाते हुए जा रहे थे और साथ ही उड़ीसा के मुख्यंमत्री के खिलाफ भी नारा लगा रहे थे.

एक जनवरी 1948 की सुबह, राज्य के मुख्य सड़कों से जुलूस निकला गया था. इसके बाद कुछ नेतागण खरसावां राजा के महल में जाकर उनसे मिले और सिंहभूम के जनता की इच्छा को बताया. इस पर राजा ने कहा इस विषय पर भारत सरकार से बातचीत करेंगे. सभा दो बजे दिन से चार बजे तक किया गया. सभा के बाद आदिवासी महासभा के नेताओं ने सभी को अपने-अपने घर जाने को कहा. सभी अपने-अपने घर की ओर चल दिये. उसी के आधे घंटे बाद बिना किसी चेतावनी के शुरू हुई, नृशंस गोलीकांड.

आधे घंटे तक गोली चलती रही और गोली चलाने के लिए आधुनिक हथियारों का प्रयोग किया गया. इस गोलीकांड में आदिवासी और मूलवासी कटे पेड़ की तरह गिरने लगे. साथ ही घर लौटते लोगों पर भी उड़ीसा सरकार के सैनिकों ने गोलियों की बौछार कर दी. इस गोलीकांड से बचने के लिए बहुत से लोग सीधे जमीन पर लेट गए. वहीं लोगों के भाग जाने के बाद भी सैनिकों की ओर से बेरहमी से गोलियां चलायी जाती रहीं. कई लोग जान बचाने के लिए पास के कुआं में भी कूद गये, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गयी.

पीठ पर दागी गयी थी गोलियां

महिला, पुरूषों के अलावा बच्चों की पीठ पर भी गोलियां दागी गयीं. यहां तक कि घोड़े, बकरी और गाय भी इस खूनी घटना के शिकार हुये. गोलियां चलने के बाद पूरे बाजार मैदान में मरे हुए लोगों के शव बिछ गये थे और साथ ही वहां कई घायल भी गिरे पड़े थे और घायलों को उड़ीसा सरकार के सैनिक ने चारों ओर से घेर रखा था. सैनिकों ने किसी भी घायल को वहां से बाहर जाने नहीं दिया और ना ही घायलों की मदद के लिए किसी को अंदर आने की अनुमति नहीं ही दी गई. घटना के बाद शाम होते ही उड़ीसा सरकार के सैनिकों की ओर से बड़ी ही निर्ममता पूर्वक इस नरसंहार के सबूत को मिटाना शुरू कर दिया गया था. सैनिकों ने शव को एकत्रित किया और उसे लगभग 10 ट्रकों में लादकर ले गये और सारंडा के बिहड़ों में फेंक दिया.

वहीं इस घटना में महिला, पुरुष एवं बच्चों का बेरहमी से नरसंहार किया गया. घायलों को सर्दियों की रात में पूरी रात खुले में छोड़ दिया गया और उन्हें पानी तक नहीं दिया गया. इसके बाद उड़ीसा सरकार ने बाहरी दुनिया से इस घटना को छुपाने की भरपूर भी कोशिश की, बहादुर उरांव के अनुसार उड़ीसा सरकार नहीं चाहती थी कि इस नरसंहार की खबर को बाहर जाने दें और इसे रोकने की पूरी कोशिश की गई. यहां तक कि बिहार सरकार ने घायलों के उपचार के लिये चिकित्सा दल और सेवा दल भी भेजा, जिसे वापस कर दिया गया. साथ ही पत्रकारों को भी इस जगह पर जाने की अनुमति नहीं थी.

एक जनवरी को काला दिवस

बहादुर उरावं बताते हैं कि एक ओर जहां देश और दुनिया में लोग नववर्ष के आगमन पर जश्न मनाया जाता है तो दूसरी ओर खरसावां और कोल्हान के लोग आज भी अपने पूर्वजों की याद में एक जनवरी को काला दिवस और शोक दिवस के रूप में मनाते हैं. इस दिन को याद करते हुए बहादुर उरांव कहते हैं कि झारखंड की लड़ाई बहुत पुरानी थी, अलग झारखंड की लड़ाई में मैंने अपने दोनो पुत्रों को भी खोया. लेकिन जिस तरीके से राज्य में विधि व्यवस्था चल रहा है और झारखंडियों का शोषण हो रहा है, यह काफी पीड़ादायक है.

अपनी बात को कहते हुए बहादुर उरांव रो पड़े और कहा कि इस तरह के राज्य के लिए हमने संघर्ष नहीं किया था, जहां जनता की इच्छा और आकांक्षा को दरकिनार किया जा रहा है. साथ ही उन्होंने कहा कि खरसावां गोलीकांड आजाद भारत के इतिहास में सबसे निंदनीय एवं दूसरा जलियांवाला बाग कांड था और आजाद भारत में पहली बार स्वाधीनता दिवस के 133 दिन बाद इस लोकतांत्रिक देश के खरसांवा में कपर्यू लगाया गया था.

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