एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम (एसीएस) महिलाओं में नोटिस नहीं होता और जटिलाएं बढ़ाता है विश्व हृदय दिवस पर, महिलाओं में हृदय रोगों और उनके लक्षणों की व्यापकता को लेकर जागरूकता बढ़ाना आवश्यक

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इंदौर। हाल के अध्ययनों के अनुसार, डिस्लिपिडेमिया (असामान्य कोलेस्ट्रॉल का स्तर) युवाभारतीय महिलाओं में तीव्र कोरोनरी सिंड्रोम (एसीएस) के विकास के लिए एक प्रमुख जोखिम कारक है।इस स्थिति के लिए कुछ अन्य जोखिम कारकों में डायबिटिज और हायपरटेंशन शामिल है। विश्व हृदय दिवस पर, इस तथ्य पर जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है कि एसी एस एक मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति है जिसमें शीघ्र निदान और देखभाल की आवश्यकता होती है।
एसी एस उन स्थितियों को बताता है, जो हृदय के रक्त प्रवाह को कम करती हैं जैसे दिल का दौरा।रक्त प्रवाह में कमी हार्ट फंक्शनिंग को बदल सकती है।इसके उपचार लक्ष्यों में ब्लड फ्लो में सुधार, काॅम्प्लीकेशंस का ईलाज और भविष्य में होने वाली समस्याओं को रोकना शामिल है।
इस बारे में बात करते हुए अपोलो हाॅस्पिटल इंदौर की कन्सल्टेंट इन्टरवेशनल कार्डियो लाॅजिस्ट डाॅ. सरिता राव ने बताया कि तीव्र कोरोनरी सिंड्रोम तब होता है जब कोरोनरी आर्टरिज की दीवारों पर एक प्लेक बन जाता है। यह प्लेक यानी पट्टिका जब फट जाती है या टुकड़ों में बंटती है, तो यह एक थक्का बनाती है, जो हार्ट मसल्स में रक्त प्रवाह को अवरुद्ध करता है। यही आगे चलकर हार्ट मसल्स के सेल्स बना देता है, जिससे दिल का दौरा पड़ता है।हालांकि हार्मोन एस्ट्रोजन युवा महिलाओं की रक्षा करता है।लेकिन, इसके प्रभाव को पारिवारिक इतिहास में कोरोनरी आर्टरी रोग एवं अस्वास्थ्य कर जीवन शैली जैसे कारकों से काउंटर किया जा सकता है। इसलिए नियमित और समय पर स्वास्थ्य जांच कराना और किसी भी संभावित जोखिम कारकों को समझना अनिवार्य है।
एसीएस के लक्षणों में छाती, कंधों, बांह, कमर के उपरी हिस्से, गर्दन, जबड़ों और बेक में दर्द या बैचेनी होना शामिलहै, इसके अलावा सांस लेने में समस्या, अचानक और अधिक पसीना, बेहोशी, जी घबराना भी इसके लक्षण हैं।
डाॅ. राव ने कहा कि एसी एस सहित दिल की बीमारियों को अक्सर महिलाओं में प्रचलित नहीं माना जाता है।इससे निदान, प्रबंधन और उपचार में देरी होती है।महिलाओं में एसी एस के साथ मृत्यु दर को कम करने की दिशा में रोकथाम पहला कदम है।इस हेतु स्वस्थ जीवन शैली औरवेट मैनेजमेंट को लेकर भी जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।
एसी एस के कुछ मरीजों को दवाओं के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। अन्य में कार्डियेक इन्टरवेंशन जैसे स्टेंटिंग या कोरोनरी आर्टरी बाई पास सर्जरी (सीएबीजी) के साथ एंजियोप्लास्टी की आवश्यकता हो सकती है। एन्जियो प्लास्टि का उपयोग रक्त प्रवाह को पुनः बनाने में होता है।इस प्रक्रिया में एक लंबी, पतली ट्यूब (कैथेटर) आर्टरी के सिकुड़े हुए हिस्से में डाली जातीहै। एक पतले तार की जाली (स्टंट) को एक गुब्बारे पर रखकर कैथेटर से सिकुड़ी हुई आर्टरी में डालकर गुब्बारे को फुलाया जाता है, यह संकुचित आर्टरी की दिवारों पर स्टंट को संकुचित आर्टरी में छोड़ देता है।ड्रग मिले हुए स्टंट दवाई छोड़ते हैं और संकुचित आर्टरी कोठीक करने की प्रक्रिया में मदद करते हैं। आजकल ड्रग लगे स्टंट भी उपलब्ध हैं, इनमें मेडिसिन की कोटिंग होती है। यह मेडिसिन भी आर्टरी को बंद होने से रोकने में मदद करती है।कुछ स्टंट य ूएस एफ डी ए से प्रमाणित होते हैं और डायबिटिज, उच्च रक्तचाप या अन्य जोखिमों वाले तथा एन्जियोप्लास्टि के एक माह के भीतर दवाई लेना रोकना पड़ता है, ऐसे मरीजों के लिए सुरक्षित उपयोग हेतु इन पर अध्ययन किया जाता है।सी एबी जी में सर्जन एक ब्लॉक्ड कारेनरी आर्टरी को शरीर के दूसरे हिस्से से वेसल का उपयोग कर ग्राफ्ट कर बायपास कर देते हैं। इससे ब्लॉक्ड या संकुचित आर्टरी में रक्त प्रवाह होने लगता है।
दिल को स्वस्थ रखने हेतु कुछ सुझाव
-वनज का प्रबंधन-मोटापा या बढ़ी हुई कमर वाले लोग कार्डियो वेस्क्यूलर बीमारियों के अधिक जोखिम में रहते हैं।
-शारीरिक गतिविधि, प्रतिदिन 45 मिनिट व्यायाम, कम से कम सप्ताह में पांच दिन तो आवश्यक रूप से।इससे अतिरिक्त वजन घटेगा और लंबे समय तक दिल की बीमारियों के खतरे से बचा जा सकेगा।
-धुम्रपान त्यागें, स्मोकिंग आर्टरिज का संकुचन कर एक समय में काॅरेनरी हार्ट डिसिज के खतरे को बढ़ा देती है।
-नियमित जांच, अपने विटल्सजैसे ब्लड प्रेशर, शुगर की जांच करें और इन्हें नियंत्रित रखें। यदि कोई बदलाव दिखता है तो चिकित्सक से परामर्श लें।
उक्त आलेख में प्रस्तुत विचार अपोलो हाॅस्पिटल इंदौर की कन्सल्टेंट इन्टरवेशनल कार्डियो लाॅजिस्ट डाॅ. सरिता राव ने सामान्य जानकारी एवं जागरूकता मात्र के उद्देश्य से व्यक्त किए हैं।

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